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Budget 2026: क्या मुगलों के जमाने में भी पेश किया जाता था बजट, कौन था उनका सबसे बेहतरीन वित्त मंत्री?

Budget 2026: आज का बजट आधुनिक तरीके से पेश होता है, लेकिन उसकी जड़ें मुगलकाल तक जाती हैं. मुगलों के जमाने में भी बजट पेश किया जाता था, लेकिन उस वक्त स्थिति कुछ अलग थी.

Budget 2026: बीते दिन वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने जब संसद में बजट पेश किया, तो लगता है यह सब पूरी तरह आधुनिक दौर की परंपरा है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि सैकड़ों साल पहले, जब न संसद थी, न टीवी कैमरे और न ही बजट भाषण, तब राजाओं के दौर में खजाने का हिसाब कैसे बनता था? हैरानी की बात यह है कि मुगल शासन में भी आज के बजट जैसी ही सोच और व्यवस्था मौजूद थी. सवाल बस इतना है कि उस दौर का सबसे दिमागदार वित्त मंत्री कौन था? आइए समझ लेते हैं. 

क्या मुगलों के जमाने में भी बनता था बजट?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा पेश किया गया यूनियन बजट 2026 आज की व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन बजट की मूल भावना आय और खर्च का संतुलन बहुत पुरानी है. मुगलकाल में भले ही इसे बजट न कहा गया हो, लेकिन राज्य की आमदनी, खर्च, कर व्यवस्था और भविष्य की योजनाएं तय करने की पूरी प्रणाली मौजूद थी. जमीन से मिलने वाले राजस्व, व्यापार कर और अन्य शुल्कों के आधार पर शाही खजाने का हिसाब बनाया जाता था.

बाबर से अकबर तक अर्थव्यवस्था की नींव

1526 में बाबर ने पानीपत की पहली लड़ाई जीतकर मुगल शासन की नींव रखी. शुरुआती दौर में शासन ज्यादा स्थिर नहीं था, क्योंकि हुमायूं का समय संघर्षों में बीता. असली आर्थिक मजबूती अकबर के शासनकाल में आई. अकबर के समय मुगल साम्राज्य न सिर्फ राजनीतिक रूप से मजबूत हुआ, बल्कि आर्थिक तौर पर भी दुनिया की बड़ी ताकतों में शामिल हो गया. उस समय भारत दुनिया के कुल औद्योगिक उत्पादन का करीब 28 प्रतिशत हिस्सा पैदा करता था.

सबसे बेहतरीन वित्त मंत्री कौन? 

अगर मुगलकाल के सबसे सफल वित्त मंत्री की बात करें, तो राजा टोडरमल का नाम आता है. उन्होंने अकबर के शासन में कर व्यवस्था को वैज्ञानिक आधार दिया. ‘जब्त प्रणाली’ के तहत जमीन की पैमाइश, फसलों का आकलन और उसी के अनुसार कर तय किया जाता था. हर प्रांत और फसल के लिए अलग दरें थीं, जिससे किसानों पर मनमाना बोझ न पड़े और राज्य की आय भी स्थिर बनी रहे.

जमीन और फसल के हिसाब से टैक्स

मुगलकाल में कर वसूली की रीढ़ कृषि थी. अच्छी उपज देने वाली पोलज जमीन पर ज्यादा टैक्स लगता था, जबकि परती और बंजर भूमि पर कम लगाया जाता था. सूखा या अकाल पड़ने पर कर में राहत दी जाती थी. कुल वसूले गए कर का लगभग एक तिहाई हिस्सा शाही खजाने में जाता था, जिससे सेना, प्रशासन और निर्माण कार्य चलते थे.

सर्वे, रिकॉर्ड और प्रशासन

अकबर ने कर व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए पूरे साम्राज्य में भूमि सर्वे कराया. अबुल फजल ने ‘आइन-ए-अकबरी’ में इन आंकड़ों को दर्ज किया है. बाद में औरंगजेब के समय भी गांव-गांव किसानों और खेती का सालाना रिकॉर्ड रखने के आदेश दिए गए. यह व्यवस्था आज के सरकारी आंकड़ों की तरह ही थी.

नई फसलें और व्यापार से कमाई

मुगलकाल में मक्का, आलू, लाल मिर्च और तंबाकू जैसी नई फसलें भारत लाई गईं. इससे किसानों की आमदनी बढ़ी और शासन को ज्यादा कर मिला. खेती के अलावा व्यापार भी आय का बड़ा जरिया था. सूरत, कोचीन और मसूलीपट्टनम जैसे बंदरगाहों से यूरोप, अफ्रीका और एशिया के साथ व्यापार होता था. कपास, रेशम, मसाले और नमक जैसे सामान बड़े पैमाने पर निर्यात किए जाते थे.

जजिया कर

मुगल शासन में जजिया कर भी आय का स्रोत था. अकबर ने इसे खत्म कर दिया था, लेकिन औरंगजेब ने 1679 में फिर लागू किया. हालांकि आपदा के समय, महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों से यह कर नहीं लिया जाता था. इसके बावजूद शाहजहां के दौर में मुगल अर्थव्यवस्था अपने चरम पर पहुंच चुकी थी.

यह भी पढ़ें: Union budget 2026: रविवार के दिन देश का दूसरा बजट, जानें आजादी के बाद सोमवार से शनिवार तक किस दिन कितने बजट पेश?

About the author निधि पाल

निधि पाल एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. ये यहां पर जीके सेक्शन की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. पिछले 7 साल से पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत निधि पाल ने इससे पहले अमर उजाला डिजिटल, न्यूज 24, ईटीवी भारत हैदराबाद जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने आईआईएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन लखनऊ से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

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