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Virat Kohli Bat : कितने साल में बनकर तैयार होता है विराट कोहली का बैट? जान लें पूरा प्रोसेस

Virat Kohli Bat : जिस बैट से विराट बड़े-बड़े शॉट लगाते हैं, उसे तैयार होने में सिर्फ कुछ दिन या महीने नहीं, बल्कि करीब कई साल लग जाते हैं एक क्रिकेट बैट सिर्फ लकड़ी का टुकड़ा नहीं होता है.

Virat Kohli Bat : क्रिकेट में जब भी दमदार शॉट्स और शानदार कवर ड्राइव की बात होती है, तो सबसे पहले विराट कोहली का नाम आता है. मैदान पर उनकी बल्लेबाजी जितनी खास होती है, उतना ही खास उनका बैट होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस बैट से विराट बड़े-बड़े शॉट लगाते हैं, उसे तैयार होने में सिर्फ कुछ दिन या महीने नहीं, बल्कि करीब कई साल लग जाते हैं एक क्रिकेट बैट सिर्फ लकड़ी का टुकड़ा नहीं होता है. इसके पीछे कई सालों की मेहनत, सही मौसम, खास पेड़, मशीनों की तकनीक और कारीगरों की कला छिपी होती है.तो आइए जानते हैं कि विराट कोहली का बैट कितने साल में बनकर तैयार होता है और इसका पूरा प्रोसेस क्या है. 

कहां बनाया जाता है विराट कोहली का बैट?

दुनिया के ज्यादातर प्रीमियम क्रिकेट बैट इंग्लैंड के इंग्लिश विलो पेड़ों से बनाए जाते हैं. इन पेड़ों की लकड़ी हल्की होने के साथ-साथ बहुत मजबूत भी होती है. यही वजह है कि बल्लेबाजों को इसमें शानदार पिंग यानी गेंद पर बेहतरीन रिएक्शन मिलता है. इंग्लैंड में उगने वाले ये पेड़ खास मिट्टी और मौसम की वजह से अलग क्वालिटी की लकड़ी तैयार करते हैं. हालांकि भारत के कश्मीर में भी विलो पेड़ उगते हैं, लेकिन इंग्लिश विलो की  क्वालिटी को सबसे बेहतर माना जाता है.

विराट कोहली का बैट कितने साल में बनकर तैयार होता है?

एक प्रीमियम क्रिकेट बैट बनने की प्रक्रिया लंबी होती है. एक छोटे पौधे से लेकर क्रिकेटर के हाथ तक पहुंचने में बैट को करीब 20 साल लग जाते हैं. बैट बनाने के लिए विलो पेड़ों को बहुत सावधानी से उगाया जाता है. इन पेड़ों की शाखाओं को जमीन में लगाकर नए पेड़ तैयार किए जाते हैं, वहीं शुरुआती 8 से 10 साल तक पेड़ों की साइड ब्रांचेज को लगातार काटना पड़ता है. अगर ऐसा न किया जाए तो लकड़ी कमजोर हो सकती है. पेड़ को पूरी तरह तैयार होने में करीब 15 से 20 साल लग जाते हैं. जब पेड़ का घेरा लगभग 1.4 मीटर हो जाता है, तब उसे काटा जाता है.

पेड़ से कितने बैट निकलते हैं?

पेड़ को काटने के बाद उसे बड़े-बड़े गोल लकड़ी के टुकड़ों में बांटा जाता है. इसके बाद इन टुकड़ों को क्लेफ्ट्स में बदला जाता है. यही क्लेफ्ट्स आगे चलकर क्रिकेट बैट बनते हैं, दिलचस्प बात यह है कि इन्हें आरी से नहीं काटा जाता है. लकड़ी को एक खास वेज से अलग किया जाता है.  ऐसा इसलिए क्योंकि आरी इस्तेमाल करने से लकड़ी के प्राकृतिक फाइबर कमजोर हो सकते हैं. एक पूरे इंग्लिश विलो पेड़ से सिर्फ लगभग 40 क्लेफ्ट्स निकलते हैं यानी एक पेड़ से केवल 40 बैट ही बन पाते हैं. क्लेफ्ट्स तैयार होने के बाद इन्हें तुरंत बैट नहीं बनाया जाता है,  सबसे पहले इन्हें करीब एक साल तक खुली हवा में सुखाया जाता है. इसके बाद लकड़ी को लगभग 10 हफ्तों तक लो-टेम्परेचर ड्राइंग चैंबर में रखा जाता है. इस प्रक्रिया का मकसद लकड़ी में नमी की मात्रा को 10 से 12 प्रतिशत तक लाना होता है. सही नमी होने से बैट ज्यादा मजबूत और टिकाऊ बनता है. 

लकड़ी तैयार होने के बाद क्या किया जाता है?

लकड़ी तैयार होने के बाद ये क्लेफ्ट्स करीब 11,000 किलोमीटर का सफर तय करके भारत के मेरठ शहर पहुंचते हैं. मेरठ को क्रिकेट बैट निर्माण का बड़ा केंद्र माना जाता है. यहां SG और SS जैसी कंपनियां दुनिया के बेहतरीन इंग्लिश विलो बैट बनाती हैं. मेरठ पहुंचने के बाद क्लेफ्ट्स को भारी मशीनों से प्रेस किया जाता है. लगभग 2 टन प्रति स्क्वायर इंच के दबाव से लकड़ी को दबाया जाता है जिससे वह मजबूत बन सके, लेकिन यह काम बेहद मुश्किल होता है. अगर ज्यादा दबाव दिया जाए तो बैट की पिंग खत्म हो सकती है. वहीं कम दबाव देने पर बैट कमजोर रह जाएगा और गेंद लगते ही उस पर निशान पड़ने लगेंगे. यही कारण है कि बैट प्रेसिंग को सबसे जरूरी प्रक्रिया मानी जाती है. प्रेसिंग के बाद मशीनों की मदद से बैट को शुरुआती आकार दिया जाता है, लेकिन असली काम इसके बाद शुरू होता है. जिसमें एक अनुभवी कारीगर करीब तीन घंटे तक हाथों से बैट को फाइनल शेप देता है. बैट का वजन, किनारों की मोटाई, बैलेंस और ग्रिप हर चीज को बहुत ध्यान से तैयार किया जाता है. 

बैट का हैंडल कैसे बनता है?

क्रिकेट बैट का हैंडल इंग्लिश विलो से नहीं बनाया जाता है. इसका हैंडल मलेशिया से आने वाले खास मनो केन से तैयार किया जाता है. यह लकड़ी लचीली होती है, जिससे बल्लेबाज को शॉट खेलते समय बेहतर कंट्रोल और कम झटका महसूस होता है. 

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बड़े क्रिकेटर अपने हिसाब से बनवाते हैं बैट

हर क्रिकेटर की खेलने का स्टाइल अलग होता है, इसलिए उनके बैट भी अलग तरीके से बनाए जाते हैं. Sachin Tendulkar लगभग 1.47 किलो वजन का भारी बैट इस्तेमाल करते थे. Hardik Pandya अपने बैट में ज्यादा कर्व पसंद करते हैं. Suryakumar Yadav के बैट में लाल रंग का खास शेड देखने को मिलता है. वहीं Virat Kohli संतुलित वजन और बेहतरीन पिंग वाले बैट पसंद करते हैं. 

आखिर में होता है हैमर टेस्ट

बैट तैयार होने के बाद उसका अंतिम टेस्ट किया जाता है. कारीगर बैट पर हल्के हथौड़े से चोट मारकर उसकी आवाज सुनते हैं. सिर्फ आवाज सुनकर ही अनुभवी कारीगर समझ जाते हैं कि बैट सही तरीके से बना है या नहीं, अगर आवाज सही न हो तो बैट को दोबारा सुधारना पड़ता है. 

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