केरोसीन ऑयल को क्यों कहते हैं मिट्टी का तेल, क्या यह सच में मिट्टी से तैयार होता है?
मिडिल ईस्ट युद्ध के कारण गैस किल्लत के बीच मिट्टी का तेल चर्चा में है. इसे घासलेट भी कहा जाता है, जो गैस लाइट शब्द का बिगड़ा हुआ रूप है. आज संकट के समय यह ईंधन फिर से रसोइयों का सहारा बन रहा है.

- पुराने समय में रोशनी और खाना पकाने में होता था इस्तेमाल.
मिडिल ईस्ट में जारी भीषण जंग ने दुनिया भर में ऊर्जा संकट पैदा कर दिया है, जिससे भारत में भी एलपीजी गैस की आपूर्ति पर असर पड़ा है. ऐसे में पुराने जमाने का साथी केरोसिन एक बार फिर भारतीय रसोइयों में दस्तक दे रहा है. इसे हम बचपन से मिट्टी का तेल कहते आए हैं, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसका यह नाम क्यों पड़ा? क्या यह वाकई मिट्टी से निकलता है या इसके पीछे कोई और वैज्ञानिक वजह है? आइए, इस नीले तेल की हकीकत और इसके दिलचस्प नामों के पीछे की कहानी को विस्तार से समझते हैं.
क्या वाकई मिट्टी से बनता है केरोसिन?
अक्सर लोगों को लगता है कि जिस तरह मूंगफली से मूंगफली का तेल और तिल से तिल का तेल निकलता है, ठीक वैसे ही मिट्टी का तेल भी मिट्टी को निचोड़कर बनाया जाता होगा. लेकिन विज्ञान की नजर में यह धारणा पूरी तरह गलत है. केरोसिन असल में एक पेट्रोलियम प्रोडक्ट है. यह उसी कच्चे तेल से रिफाइन करके निकाला जाता है, जिससे पेट्रोल और डीजल बनते हैं. इसे मिट्टी का तेल इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका स्रोत जमीन की गहराइयों में छिपा होता है. मिट्टी के नीचे से निकलने के कारण ही आम बोलचाल में इसका नाम मिट्टी का तेल पड़ गया.
जमीन की गहराइयों से रिफाइनरी तक का सफर
कच्चा तेल जमीन के अंदर हजारों फीट नीचे मौजूद होता है. जब इस कच्चे तेल को बाहर निकालकर रिफाइनरी में साफ़ किया जाता है, तो अलग-अलग तापमान पर पेट्रोल, डीजल और केरोसिन जैसी चीजें अलग होती हैं. तकनीकी रूप से इसे फ्रैक्शनल डिस्टिलेशन कहा जाता है. केरोसिन का निर्माण इस प्रक्रिया के एक खास चरण में होता है. चूंकि यह पूरी तरह से जमीन के अंदर मौजूद जीवाश्म ईंधन से जुड़ा है, इसलिए भारत के ग्रामीण और शहरी इलाकों में इसे जमीन या मिट्टी से जोड़ने वाला नाम दे दिया गया.
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मिट्टी के तेल को क्यों कहते हैं घासलेट?
भारत के कई हिस्सों, खासकर महाराष्ट्र और उत्तर भारत के कुछ इलाकों में केरोसिन को घासलेट भी कहा जाता है. यह नाम सुनने में जितना देसी लगता है, इसकी जड़ें उतनी ही विदेशी हैं. दरअसल, पुराने समय में जब विदेशों से गैस से चलने वाली लाइटें भारत आईं, तो ग्रामीण भारतीयों के लिए गैस लाइट शब्द बोलना थोड़ा कठिन था. धीरे-धीरे लोगों ने अपनी सुविधा के अनुसार इसे बिगाड़कर घासलेट कहना शुरू कर दिया. आज भी बुजुर्गों की जुबान पर केरोसिन के लिए यही नाम सबसे ज्यादा चढ़ा हुआ है.
रसोई से लेकर रोशनी तक का अहम साथी
एक दौर था जब भारतीय घरों में बिजली और एलपीजी सिलेंडर का नामोनिशान नहीं था. उस समय केरोसिन ही वह जादुई ईंधन था जो घरों को रोशन करता था और चूल्हा जलाता था. लालटेन और लैंप में इसी तेल का इस्तेमाल होता था. वहीं, खाना पकाने के लिए स्टोव में केरोसिन का उपयोग अनिवार्य था. हालांकि, समय के साथ गैस सिलेंडरों ने इसकी जगह ले ली, लेकिन आज के मौजूदा वैश्विक संकट और गैस की किल्लत ने एक बार फिर लोगों को इस पुराने और भरोसेमंद ईंधन की याद दिला दी है.
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