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धरती पर कहां से आया था 'लोहा', तब कैसे होता था इसका इस्तेमाल? 

तुर्की को अब तक लोहे का उत्पादन शुरू करने वाला क्षेत्र माना जाता था. हालांकि पुरातत्वविदों को भारत के तमिलनाडु में छह जगह लोहे की वस्तुएं मिली हैं, जो 2953 से 3345 ईसा पूर्व से भी ज्यादा पुरानी हैं.

मानव विकास क्रम के बारे में पढ़ने पर हमें कई रोचक बातें पता चलती हैं. जैसे पाषाण युग और कांस्य युग. इन दोनों युगों में मनुष्य ने जीवन यापन के लिए अन्य तरीकों का इस्तेमाल करना शुरू किया. पाषाण युग में पत्थरों का इस्तेमाल हुआ और कांस्य युग में कांसे के उपयोग के बारे में इंसानों ने सीखा. हालांकि इस समय तक इंसानों ने लोहे के प्रयोग के बारे में नहीं जाना था. 

आज हम इसी लोहे के बारे में बात करेंगे. दुनिया में लोहे का प्रयोग आज भारी मात्रा में हो रहा है. औजारों, हथियारों से लेकर इमारतों तक में लोहे का इस्तेमाल होता है, लेकिन क्या आपको पता है कि धरती पर लोहा कहां से आया था? इसका उत्पादन कैसे हुआ है और उस समय इसका इस्तेमाल किस तरह से किया गया? 

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तो यहां हुआ था सबसे पहले लोहे का उत्पादन?

दुनिया में तुर्की को अब तक लोहे का उत्पादन शुरू करने वाला क्षेत्र माना जाता था. हालांकि, इस बारे में नई बहस छिड़ चुकी है. पुरातत्वविदों को हाल में भारत के तमिलनाडु में छह जगह लोहे की वस्तुएं मिली हैं,जो 2953 से 3345 ईसा पूर्व से भी ज्यादा पुरानी हैं. इससे पता चलता है कि तुर्की से भी पहले यहां लोहे का इस्तेमाल शुरू किया जा चुका था. 

इस तरह होता था इस्तेमाल

लोहे के इस्तेमाल के बारे में हाल ही में किए गए एक अध्ययन में पता चला है कि तमिलनाडु दुनिया का वह पहला क्षेत्र था, जहां गलाकर लोहे का इस्तेमाल किया जाता था. यह लोहा अयस्कों से निकाला जाता था. पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, 5300 साल पहले इस क्षेत्र में रहन वाले लोग लोहे को गलाना जानते थे और उसका इस्तेमाल करते थे. रिपोर्ट्स में कहा गया है कि लोहे के निकालने, गलाने और उसे आकार देने की प्रक्रिया भारतीय उपमहाद्वीप में शुरू हुई थी. इसके अलावा वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती पर लोह उल्कापिंडों और अंतरिक्ष की चट्टानों से भी आया, जो अंतरिक्ष से धरती पर गिरे थे.

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प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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