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ईरान के इस राजा ने दिल्ली पर किया था आक्रमण, जानें क्या-क्या लूट कर ले गए थे?

Persian King Attack On Delhi: आज का ईरान भले ही अलग हालात में हो, लेकिन इतिहास गवाह है कि इसी देश के एक राजा ने दिल्ली में कत्लेआम मचाया था. उसका हमला मुगल सल्तनत के अंत की शुरुआत साबित हुआ.

ईरान इन दिनों भीषण उथल-पुथल से गुजर रहा है. बीते दिनों में वहां सरकार विरोधी प्रदर्शन तेज हुए हैं, जो राजधानी तेहरान से शुरू होकर सैकड़ों शहरों तक फैल चुके हैं. आर्थिक हालात खराब हैं और आम लोग सड़कों पर हैं. अमेरिका की ओर से हस्तक्षेप के संकेत और ईरान की कड़ी चेतावनियों ने माहौल को और तनावपूर्ण बना दिया है. ऐसे समय में इतिहास की ओर नजर डालें, तो ईरान का नाम हिंदुस्तान के इतिहास में भी एक बड़ी और दर्दनाक घटना से जुड़ा है. 

बहुत कम लोग जानते हैं कि आज से करीब तीन सौ साल पहले इसी ईरान के एक ताकतवर शासक ने दिल्ली पर हमला कर ऐसा कहर बरपाया था, जिसने हिंदुस्तान की सबसे अमीर सल्तनत की कमर तोड़ दी थी. आखिर वह राजा कौन था और हिंदुस्तान से क्या-क्या लूट ले गया था?

हिंदुस्तान की दौलत पर टिकी विदेशी नजर

हिंदुस्तान सदियों से अपनी दौलत और समृद्धि के लिए जाना जाता रहा है. मुगल दौर में तो दिल्ली दुनिया के सबसे अमीर शहरों में गिनी जाती थी. औरंगजेब की मौत के बाद मुगल सल्तनत कमजोर होने लगी थी. अंदरूनी गुटबाजी, कमजोर शासन और ऐशो-आराम में डूबे शासकों ने साम्राज्य की जड़ों को हिला दिया था. इसी कमजोरी ने विदेशी आक्रमणकारियों को मौका दिया.

नादिरशाह का उदय और दिल्ली की ओर कूच

ईरान का शासक नादिरशाह उस दौर का बेहद ताकतवर और महत्वाकांक्षी राजा था. दिल्ली की बेशुमार दौलत और कमजोर मुगल सत्ता की खबरें उसे हिंदुस्तान तक खींच लाईं. साल 1738 में उसने खैबर दर्रे को पार किया और तेजी से आगे बढ़ता गया. उस समय मुगल सिंहासन पर औरंगजेब का परपोता मोहम्मद शाह बैठा था, जो विलासिता में डूबा हुआ शासक माना जाता है.

करनाल की लड़ाई और मुगलों की हार

दिल्ली पहुंचने से पहले नादिरशाह का सामना करनाल में मुगल सेना से हुआ था. इस युद्ध में मुगल बादशाह की सेना, अवध और दक्कन की सेनाएं शामिल थीं. संख्या में ये सेनाएं बहुत बड़ी थीं, लेकिन नेतृत्व कमजोर था. नादिरशाह ने अपेक्षाकृत कम सैनिकों के बल पर इस संयुक्त सेना को हरा दिया. इस हार ने मुगल सल्तनत की असल कमजोरी पूरी दुनिया के सामने ला दी.

बादशाह बना बंदी फिर दिल्ली में हुई एंट्री

करनाल की जीत के बाद नादिरशाह ने समझौते का नाटक रचा. मुगल दरबार से बातचीत के नाम पर मोहम्मद शाह को अपने शिविर में बुलाया और उसे बंदी बना लिया. इसके बाद वह मुगल बादशाह के साथ दिल्ली में दाखिल हुआ. शुरुआत में हालात शांत रहे, लेकिन नादिरशाह के हजारों सैनिकों के शहर में घुसने से खाने-पीने की चीजों की कमी होने लगी और जो चीजें मौजूद थीं, उनके दाम बढ़ गए.

एक अफवाह, दंगा और फिर मचा कत्लेआम

एक दिन बाजार में झगड़े से हालात बिगड़े और अफवाह फैल गई कि नादिरशाह मारा गया है. गुस्साई भीड़ ने ईरानी सैनिकों पर हमला कर दिया. जब नादिरशाह को इसकी खबर मिली, तो उसने खुलेआम कत्लेआम का आदेश दे दिया. 22 मार्च 1739 को दिल्ली की गलियां खून से भर गईं. चांदनी चौक, दरीबा और जामा मस्जिद के आसपास हजारों लोग मारे गए. यह दिल्ली के इतिहास का सबसे भयावह दिन माना जाता है. 

जान के बदले दौलत की कीमत

कत्लेआम रोकने के लिए मुगल दरबार के बड़े अफसरों ने नादिरशाह से मिन्नतें कीं. आखिर वह इस शर्त पर माना कि उसे भारी भरकम रकम दी जाए, तब वह ये सब बंद करेगा. इसके बाद नादिर शाह और उसकी सेना दिल्ली से बेहिसाब सोना, चांदी, हीरे-जवाहरात लूटकर ले गए. मुगल सल्तनत का गौरव माने जाने वाला तख्त-ए-ताऊस भी नादिरशाह अपने साथ ले गया, जिसमें कोहिनूर हीरा और तैमूरिया माणिक जड़े थे.

एक हमले ने बदल दिया इतिहास

नादिरशाह के लौटने के बाद दिल्ली और मुगल सल्तनत कभी पहले जैसी नहीं रह पाई. सदियों में जमा की गई दौलत एक झटके में खत्म हो गई. इस हमले ने मुगल साम्राज्य के पतन की रफ्तार तेज कर दी और हिंदुस्तान को आने वाले विदेशी आक्रमणों के लिए और कमजोर बना दिया.

यह भी पढ़ें: वेनेजुएला की तरह ईरान पर अमेरिका ने कब्जा किया तो सबसे ज्यादा नुकसान किसे, भारत या चीन?

About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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