वेनेजुएला की तरह ईरान पर अमेरिका ने कब्जा किया तो सबसे ज्यादा नुकसान किसे, भारत या चीन?
US Iran Tension: अमेरिका-ईरान के बीच टकराव सिर्फ दो देशों की लड़ाई नहीं, बल्कि वैश्विक ताकतों की परीक्षा है. अगर ईरान में सत्ता बदली, तो सबसे बड़ा झटका आखिर किसे लग सकता है. चलिए जानें.

पश्चिम एशिया एक बार फिर तनाव की आग में सुलग रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच तीखी बयानबाजी, हमले की धमकियां और जवाबी चेतावनियों ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. अगर हालात और बिगड़े और अमेरिका ने वेनेजुएला की तरह ईरान में सत्ता बदलाव या कब्जे की कोशिश की, तो इसका असर सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहेगा. असली सवाल यह है कि इस बड़े भू-राजनीतिक खेल में सबसे ज्यादा झटका किसे लगेगा- भारत को या चीन को? आइए इस रिपोर्ट के जरिए समझ लेते हैं.
अमेरिका–ईरान टकराव की पृष्ठभूमि
अमेरिका और ईरान के रिश्ते 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से लगातार तनावपूर्ण रहे हैं. तब से दोनों देशों के बीच भरोसा कभी बन ही नहीं पाया. परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक प्रतिबंध, इजरायल का मुद्दा और पश्चिम एशिया में प्रभाव बढ़ाने की होड़ ने हालात और बिगाड़ दिए हैं. हाल के वर्षों में सैन्य गतिविधियों और कड़े बयानों ने इस टकराव को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है.
ईरान के अंदरूनी हालत गंभीर
ईरान इस समय गंभीर आर्थिक संकट से गुजर रहा है. उसकी मुद्रा कमजोर हो चुकी है, महंगाई आम लोगों की कमर तोड़ रही है और अमेरिकी प्रतिबंधों ने अर्थव्यवस्था को जकड़ रखा है. सरकार पर दबाव है, लेकिन सत्ता अभी भी कायम है. ऐसे माहौल में बाहरी हस्तक्षेप की आशंका ईरान के लिए ही नहीं, उसके सहयोगी देशों के लिए भी चिंता का विषय है.
ईरान के दोस्त और रणनीतिक साझेदार
ईरान के दो बड़े रणनीतिक साझेदार माने जाते हैं- रूस और चीन. रूस खुद यूक्रेन युद्ध और प्रतिबंधों की वजह से आर्थिक दबाव में है, इसलिए ईरान को बड़े पैमाने पर आर्थिक सहारा देने की स्थिति में वह कमजोर दिखता है. ऐसे में चीन की भूमिका ज्यादा अहम हो जाती है. चीन खुलकर कह चुका है कि वह ईरान के मामलों में बाहरी दखल के खिलाफ है और वहां स्थिरता चाहता है.
चीन का दांव पर लगा भारी निवेश
चीन और ईरान के रिश्ते सिर्फ कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि गहरे आर्थिक हितों से जुड़े हैं. साल 2021 में दोनों देशों के बीच 25 साल की एक बड़ी रणनीतिक साझेदारी हुई थी, जिसकी कुल कीमत लगभग 400 अरब डॉलर मानी जाती है. इस समझौते के तहत चीन को ईरान में ऊर्जा क्षेत्र में बड़ा निवेश करना है और परिवहन व उद्योग में भी भारी पूंजी लगानी है. ईरान, चीन के बेल्ट एंड रोड प्रोजेक्ट का एक अहम केंद्र है.
तेल, छूट और चीन को मिलता फायदा
अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का कच्चा तेल चीन तक पहुंचता है. माना जाता है कि रोजाना लगभग 15 लाख बैरल ईरानी तेल चीन को जाता है. यह तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार कीमत से सस्ता मिलता है, जिससे चीन को हर साल अरबों डॉलर की बचत होती है. प्रतिबंधों के कारण ईरान डॉलर में भुगतान नहीं ले सकता, इसलिए यह पैसा चीनी बैंकों और कंपनियों के जरिए ईरान में ही निवेश के रूप में लौटता है.
अगर सत्ता बदली तो क्या होगा?
अगर अमेरिका की वजह से ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है और वहां अमेरिका समर्थित शासन आता है, तो सबसे बड़ा झटका चीन को लग सकता है. चीन की ऊर्जा सुरक्षा, सस्ते तेल की सप्लाई और बेल्ट एंड रोड से जुड़े कई प्रोजेक्ट्स खतरे में पड़ जाएंगे. वर्षों की योजना और निवेश एक झटके में बेकार हो सकता है.
भारत पर असर कितना?
भारत का ईरान के साथ रिश्ता मुख्य रूप से ऊर्जा और रणनीतिक संपर्कों तक सीमित रहा है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद भारत ने पहले ही ईरान से तेल खरीद काफी हद तक बंद कर दी है. चाबहार बंदरगाह जैसे प्रोजेक्ट भारत के लिए अहम जरूर हैं, लेकिन कुल मिलाकर भारत की निर्भरता चीन जैसी गहरी नहीं है. इसलिए नुकसान होगा, लेकिन सीमित स्तर पर.
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Source: IOCL



























