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500 साल में तबाह हो चुकीं दुनिया की ये 3 सुपरपावर्स, जानें कैसे हो गया इनका खात्मा?

पिछले 500 साल में दुनिया ने स्पेनिश, ब्रिटिश हुकूमत और सोवियत संघ जैसी महाशक्तियों को अर्श से फर्श पर आते देखा है. आइए जानें कि इनका सूरज कब तक उगा रहा और पतन का कारण आखिर क्या था?

इतिहास खुद को दोहराता है और जब बात महाशक्तियों की हो तो यह बात और भी सच साबित होती है. पिछली पांच सदियों में दुनिया ने कई साम्राज्यों को अर्श से फर्श पर आते देखा है. कभी सोने-चांदी के दम पर दुनिया को नचाने वाला स्पेन हो, या सूरज न डूबने देने वाला ब्रिटेन, सबका अंत हुआ है. आखिर वो क्या कारण थे जिन्होंने इन सुपरपावर्स की नींव हिला दी? आइए, उन तीन महान ताकतों के उत्थान और विनाश की दिलचस्प कहानी को विस्तार से जानते हैं. 

कैसे हुआ था स्पेन का विनाश?

15वीं सदी से 17वीं सदी के बीच स्पेन दुनिया की पहली सुपरपावर बना. दरअसल, उस वक्त स्पेन को अमेरिका से चांदी का विशाल भंडार मिला था, जिसके दम पर उसने पूरे यूरोप की इकोनॉमी को अपनी मुट्ठी में कर लिया था. हालांकि, यही बेतहाशा दौलत उसकी तबाही का कारण भी बनी. हुआ यूं कि स्पेन के राजाओं ने ताकत के नशे में चूर होकर यूरोप और अमेरिका के खिलाफ कई मोर्चों पर जंग छेड़ दी, जिन पर काफी पैसा खर्च होने लगा. इन युद्धों पर स्पेन ने अपनी कमाई का आधे से ज्यादा हिस्सा खर्च कर दिया, जो उसके विनाश का कारण बना.

सिक्कों की मिलावट और महंगाई का दौर

युद्धों की भारी लागत पूरी करने के लिए स्पेन ने अपनी मुद्रा के साथ खिलवाड़ शुरू किया. उन्होंने चांदी के सिक्कों में सस्ता तांबा मिलाना शुरू कर दिया, ताकि ज्यादा सिक्के बनाए जा सकें. नतीजा यह हुआ कि मुद्रा की वैल्यू गिर गई और स्पेन में प्राइस रिवोल्यूशन यानी भारी महंगाई आ गई. दुनिया की सबसे बड़ी ताकत होने के बावजूद, स्पेन कर्ज के जाल में ऐसा फंसा कि महज 40 वर्षों के भीतर वह चार बार डिफॉल्टर घोषित हुआ. आर्थिक रूप से खोखले हो चुके साम्राज्य को बचाना नामुमकिन हो गया.

आयात पर निर्भरता और घरेलू उत्पादन की अनदेखी

अमेरिका से आने वाली चांदी ने स्पेन को इतना आत्मनिर्भर महसूस कराया कि उसने अपने देश के भीतर उत्पादन और उद्योगों पर ध्यान देना ही बंद कर दिया था. स्पेन हर छोटी-बड़ी चीज के लिए विदेशी आयात पर निर्भर हो गया. इसके साथ ही, वहां के शासकों ने धार्मिक और वैचारिक मतभेदों के चलते अपने देश के सबसे बुद्धिमान और मेहनती अल्पसंख्यकों को देश से बाहर निकाल दिया. इस ब्रेन ड्रेन और अक्षम नौकरशाही ने स्पेनिश साम्राज्य के ताबूत में आखिरी कील ठोंकने का काम किया.

ब्रिटिश सुपरपावर का स्वर्णिम काल और ढलान (1800–1950)

19वीं और 20वीं शताब्दी के दौरान ब्रिटिश साम्राज्य का दबदबा ऐसा था कि दुनिया के एक चौथाई हिस्से पर उनका राज था. कहा जाता था ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कभी नहीं डूबता, लेकिन इस विशाल साम्राज्य का पतन दो विश्व युद्धों ने तय कर दिया. प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध ने यूनाइटेड किंगडम को आर्थिक रूप से पूरी तरह निचोड़ दिया. जो ब्रिटेन कभी पूरी दुनिया को कर्ज बांटता था, वह अचानक अमेरिका जैसे देशों का कर्जदार बन गया. साम्राज्य को चलाने और उसकी रक्षा करने का खर्च अब वहां से मिलने वाले मुनाफे से कहीं ज्यादा हो चुका था.

राष्ट्रवाद और आजादी की गूंज से होता रहा कमजोरी

दूसरे विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन की सैन्य और आर्थिक ताकत इतनी कमजोर हो गई कि वह अपनी कॉलोनियों पर पकड़ बनाए रखने में नाकाम रहा. भारत, मिस्र और इराक जैसे प्रमुख देशों में राष्ट्रवादी आंदोलनों ने जोर पकड़ लिया. अपनी घरेलू स्थिति को सुधारने के दबाव में ब्रिटेन को मजबूरन इन देशों को आजाद करना पड़ा. औद्योगिक क्षेत्र में भी जर्मनी और अमेरिका जैसे नए प्रतिद्वंद्वियों ने ब्रिटेन की श्रेष्ठता को चुनौती दी, जिससे उसका वैश्विक दबदबा हमेशा के लिए खत्म हो गया.

जब ताश के पत्तों की तरह बिखरा सोवियत संघ (1917–1991)

20वीं सदी में अमेरिका को सीधी चुनौती देने वाला सोवियत संघ 1991 में ताश के पत्तों की तरह बिखर गया. सोवियत संघ के पतन की सबसे बड़ी वजह उसकी कमांड इकोनॉमी थी. सरकार के कड़े नियंत्रण वाली इस व्यवस्था में नई तकनीक और इनोवेशन के लिए कोई जगह नहीं थी. जनता की जरूरतों को पूरा करने के बजाय सारा ध्यान हथियारों की होड़ पर था. लोग बुनियादी चीजों के लिए तरस रहे थे, जिससे व्यवस्था के प्रति आम जनता का गुस्सा बढ़ता चला गया.

अमेरिका की बराबरी में बिगड़ी जीडीपी

सोवियत संघ ने अमेरिका के साथ बराबरी करने के चक्कर में अपना रक्षा बजट इतना बढ़ा दिया कि वह उसकी जीडीपी का एक बड़ा हिस्सा बिगड़ने लगा. अर्थव्यवस्था ठप हो गई और भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर पहुंच गया. वहां के राजनीतिक सिस्टम में लचीलेपन की भारी कमी थी, जिसके कारण वह बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बिठा पाया. अंत में, सोवियत संघ के भीतर शामिल अलग-अलग गणराज्यों में उठी आजादी की मांग ने इस विशाल यूनियन को हमेशा के लिए तोड़ दिया.

साम्राज्यों के पतन का 500 साल पुराना पैटर्न

इतिहासकारों ने इन तीनों सुपरपावर्स के पतन में एक जैसा पैटर्न देखा है. इसकी शुरुआत हमेशा डेट बबल यानी कर्ज के गुब्बारे से होती है. जब कोई देश अपनी क्षमता से ज्यादा कर्ज ले लेता है, तो उसकी बर्बादी तय होती है. इसके बाद समाज में अमीरों और गरीबों के बीच की खाई बहुत चौड़ी हो जाती है, जो आंतरिक असंतोष को जन्म देती है. सैन्य विस्तार का जुनून खजाने को खाली कर देता है और नए आर्थिक शक्तियों का उदय पुरानी सुपरपावर को हाशिए पर धकेल देता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. ये यहां पर जीके सेक्शन की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. पिछले 7 साल से पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत निधि पाल ने इससे पहले अमर उजाला डिजिटल, न्यूज 24, ईटीवी भारत हैदराबाद जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने आईआईएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन लखनऊ से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

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