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Luxurious Colour: प्राचीन काल में बैंगनी रंग‌ हुआ करता था सबसे महंगा, जानें क्यों थी इसकी सोने से भी ज्यादा कीमत?

Luxurious Colour: एक समय ऐसा भी था जब बैंगनी रंग सोने से भी ज्यादा महंगा हुआ करता था. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

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  • रंग बनाने की प्रक्रिया अत्यधिक मेहनत और समय लेती थी।

Luxurious Colour: आज बैंगनी रंग कपड़ों की दुकान, पेंट की दुकान और फैशन कलेक्शन में आसानी से मिलने वाला एक आम रंग है. लेकिन पुराने समय में बैंगनी रंग को दुनिया की सबसे कीमती चीजों में से एक माना जाता था. इसकी कीमत इतनी ज्यादा थी कि बैंगनी रंग से रंगे कपड़े की कीमत अक्सर सोने के बराबर या फिर उससे भी ज्यादा होती थी. इसके कम मिलने और इसे बनाने के खास तरीके की वजह से यह रंग शाही शान, ताकत और दौलत के निशानी बन गया.

समुद्र में छिपा एक दुर्लभ स्त्रोत 

बैंगनी रंग की इतनी ज्यादा कीमत की मुख्य वजह इसका दुर्लभ स्रोत था. पौधों या फिर खनिजों से मिलने वाले ज्यादातर रंगों के उलट बैंगनी रंग बोलिनस ब्रैंडारिस नाम के समुद्री घोंघे की एक खास प्रजाति से निकाला जाता था. इसे आम तौर पर म्यूरेक्स स्नेल कहा जाता है. ये घोंघे मुख्य रूप से भूमध्य सागर के तट पर पाए जाते थे. इन्हें बड़ी मात्रा में इकट्ठा करना मुश्किल था इस वजह से यह रंग शुरू से ही काफी कम मिलता था. 

थोड़े से रंग के लिए हजारों घोंघे

बैंगनी रंग बनाना काफी ज्यादा मेहनत वाला और कम फायदेमंद काम था. ऐतिहासिक अनुमानों के मुताबिक सिर्फ 1.4 ग्राम शुद्ध बैंगनी रंग बनाने के लिए लगभग 12000 समुद्री घोंघों की जरूरत होती थी. यही वजह है कि थोड़े से रंगे हुए कपड़े के लिए भी हजारों घोंघों को इकट्ठा करने और प्रोसेस करने की जरूरत पड़ती थी. 

मेहनत वाला निर्माण कार्य 

रंग निकालने की प्रक्रिया काफी मुश्किल और समय लेने वाली थी. मजदूरों को सावधानी से घोंघे इकट्ठे करने पड़ते थे. रंग बनाने वाले इससे को निकालना पड़ता था और नियंत्रित स्थितियों में सामग्री को प्रोसेस करना पड़ता था. इसके बाद रंग को धूप में रखना पड़ता था और कपड़ों पर इस्तेमाल करने से पहले सावधानी से ट्रीट करना पड़ता था. पूरी प्रक्रिया में काफी ज्यादा मेहनत लगती थी. इससे इसकी लागत और भी बढ़ जाती थी.

हफ्तों का काम और बुरी गंध

टायरियन पर्पल बनाना न सिर्फ मुश्किल था बल्कि यह अपनी बुरी गंध के लिए भी बदनाम था. इसे बनाने में काफी तेज और बुरी बदबू आती थी जिसे दूर से भी महसूस किया जा सकता था. इस वजह से रंग बनाने वाली वर्कशॉप आमतौर पर समुद्र के किनारे और आबादी वाले शहरों से दूर बनाई जाती थीं. कपड़ों को रंगने और सुखाने में अक्सर कई हफ्ते लग जाते थे.

यह भी पढ़ेंः अगर भारत का सोना नहीं लौटाएं विदेशी बैंक तो क्या होगा, कहां शिकायत कर सकता है इंडिया?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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