Holi 2026: कहां से शुरू हुआ होली पर गुजिया बनाने का रिवाज, जानें क्या है इसका इतिहास
Holi 2026: होली के त्योहार पर गुजिया बनाने की प्रथा सदियों से चली आ रही है. आइए जानते हैं कि कहां से शुरू हुई यह प्रथा और क्या है इसका इतिहास.

Holi 2026: जैसे-जैसे होली का त्योहार पास आने लगता है पूरे नॉर्थ इंडिया के किचन में खोया और ड्राई फ्रूट से भारी और तली हुई गुजिया की खुशबू आने लगती है. गुजिया सिर्फ त्योहार की मिठाई नहीं है बल्कि यह कल्चरल लेनदेन का भी महत्व रखती है. हालांकि इतिहासकार इसकी असली शुरुआत के बारे में अलग-अलग राय रखते हैं लेकिन ज्यादातर लोग गुजिया की जड़े 13वीं और 17वीं सदी के बीच मानते हैं.
13वीं सदी में हुई शुरुआत
गुजिया जैसी मिठाइयों का सबसे पहले जिक्र 13वीं सदी में मिलता है. उस समय उन्हें डीप फ्राइड नहीं किया जाता था. इसके बजाय गेहूं के आटे की छोटी लोइयों में गुड़ और शहद भरकर धूप में सुखाया जाता था. यह शुरुआती वर्जन आज की मिठाई की तुलना में काफी सिंपल था. यह मिठाई बसंत की फसल के त्योहार के दौरान बनाई जाने वाली मौसमी मिठाई थी जो बाद में होली की परंपरा से मिल गई.
मिडल ईस्टर्न असर
कई फूड हिस्टोरियन ऐसा मानते हैं कि गुजिया पर बकलावा जैसे मिडल ईस्टर्न डेजर्ट का असर हो सकता है. बकलावा आटे की पतली परतों पर ड्राई फ्रूट्स और स्वीटनर डालकर बनाया जाता है. कुछ जानकारों का ऐसा कहना है कि गुजिया में नट्स और मीठी चीज भरने का आईडिया ट्रेड रूट से भारत आया होगा. एक और थ्योरी गुजिया को समोसे के मीठे वर्जन से जोड़ती है. इसके बारे में माना जाता है कि वह खुद मिडल ईस्टर्न ओरिजिन का है.
कुछ पुराने रेफरेंस
कुछ जानकारों का ऐसा कहना है कि गुजिया की जड़ें पूरी तरह से देसी हैं. पुराने संस्कृत टेक्स में करणीका नाम की एक मिठाई का जिक्र है. यह शहद और ड्राई फ्रूट से भरी होती थी. इस तैयारी को अक्सर मॉडर्न गुजिया का बेस माना जाता है.
मुगल काल में बदलाव
16वीं और 17वीं सदी में मुगल काल के दौरान गुजिया का रूप काफी बदल गया. यह तब था जब खोया को चीनी और सूखे मेवे के साथ भरावन के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा. इस समय घी में डीप फ्राई करने का तरीका भी आम हो गया था.
होली कनेक्शन
उत्तर प्रदेश का बुंदेलखंड इलाका होली के दौरान गुजिया बनाने का गढ़ माना जाता है. इस मिठाई का ब्रज क्षेत्र खासकर वृंदावन से भी गहरा कनेक्शन है. राधा रमण मंदिर में सदियों से भगवान श्री कृष्ण को प्रसाद के रूप में गुजिया और चंद्रकला चढ़ाने की परंपरा रही है. अब क्योंकि होली राधा और कृष्ण के प्रेम से काफी करीब से जुड़ी हुई है इस वजह से गुजिया धीरे-धीरे त्योहार के जश्न का एक अहम हिस्सा बन गई.
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Source: IOCL


























