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सिर्फ पान का पत्ता ही कत्था-सुपारी लगाकर क्यों खाया जाता है और कोई पत्ता क्यों नहीं?

Betel Leaf: आपने कभी यह सोचा है कि पान के पत्ते को ही क्यों खाया जाता है. दुनिया में और भी पत्ते मौजूद है उन्हें क्यों नहीं खाया जाता. चलिए जानते हैं

साल 1978 में एक फिल्म आई थी. फिल्म का नाम था 'डाॅन'. अदाकार थे अमिताभ बच्चन, फिल्म में गीत था 'खइके पान बनारस वाला' जिसे लिखा था गीतकार अंजान ने संगीत था कल्याण जी आनंद जी का और गाया था किशोर कुमार ने. हम सबने बचपन में यह गाना बहुत सुना है और आज भी यह गाना खूब सुना जाता है. लेकिन आपने कभी यह सोचा है कि इसमें पान का ही जिक्र क्यों हैं. किसी और पत्ते का क्यों नहीं. दुनिया में और भी पत्ते मौजूद है. उन्हें क्यों नहीं खाया जाता. उन पर भी तो कत्था, चूना, सुपारी लगाकर खाया जा सकता है. चलिए जानते हैं पान का पत्ता ही क्यों खाया जाता है. 

पान का पत्ता ही क्यों खाया जाता है?

पुराने समय में पान खाना बेहद शाही माना जाता था. कवि, संगीतकार, राज दरबारी आदि पान अपने साथ लेकर चला करते थे. पान खाने की प्रथा कब से शुरू हुई इस बात को लेकर कहा जाता है कि मुगलों के समय इसे खाने का चलन शुरू हुआ था. पहले इसमें सौंफ, इलायची मिलाकर खाना खाने के बाद खाया जाता था. मुगलों के बाद अंग्रेजों के समय में भी इसका इस्तेमाल इसी तरह होता रहा. फिर बाद में इसे माउथ फ्रेशनर के तौर पर इस्तेमाल किया जाने लगा.

क्या होते हैं फायदे?

दरअसल पान के पत्ते को चबाने से पाचन क्रिया ठीक होती है. इसे खाने से कब्ज एसिडिटी जैसी समस्याएं दूर हो जाती हैं और इसके साथ ही अल्सर जैसी बीमारी भी पान के पत्तों से ठीक हो जाती हैं. अब क्योंकि अकेले पेट चलाएंगे तो स्वाद नहीं आएगा इसीलिए कत्था, चूना, सुपारी लगाकर खाया जाता है. 

धार्मिक मान्यता

पान के पत्तों को लेकर सनातन धर्म में कुछ मान्यताएं भी हैं. ऐसा कहा जाता है कि समुद्र मंथन के दौरान देवताओं ने पान के पत्ते का इस्तेमाल करके भगवान विष्णु की आराधना की थी. आज भी पूजा के अनुष्ठानों में पान के पत्ते का बहुत महत्व होता है. 

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About the author नीलेश ओझा

नीलेश ओझा पिछले पांच साल से डिजिटल पत्रकारिता में सक्रिय हैं. उनकी लेखन शैली में तथ्यों की सटीकता और इंसानी नजरिए की गहराई दोनों साथ-साथ चलती हैं.पत्रकारिता उनके लिए महज़ खबरें इकट्ठा करने या तेजी से लिखने का काम नहीं है. वह मानते हैं कि हर स्टोरी के पीछे एक सोच होनी चाहिए.  

कुछ ऐसा जो पाठक को सिर्फ जानकारी न दे बल्कि सोचने के लिए भी मजबूर करे. यही वजह है कि उनकी स्टोरीज़ में भाषा साफ़ होती है.लिखने-पढ़ने का शौक बचपन से रहा है. स्कूल की नोटबुक से शुरू हुआ यह सफर धीरे-धीरे पेशेवर लेखन और पत्रकारिता तक पहुंचा. आज भी उनके लिए लेखन सिर्फ पेशा नहीं है यह खुद को समझने और दुनिया से संवाद करने का ज़रिया है.

पत्रकारिता के अलावा वह साहित्य और समकालीन शायरी से भी गहराई से जुड़े हुए हैं. कभी भीड़ में तो कभी अकेले में ख्यालों को शायरी की शक्ल देते रहते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता का काम सिर्फ घटनाएं गिनाना नहीं है. बल्कि पाठक को उस तस्वीर के उन हिस्सों तक ले जाना है. जो अक्सर नजरों से छूट जाते हैं.

उन्होंने स्पोर्ट्सविकी, क्रिकेट एडिक्टर, इनशॉर्ट्स और जी हिंदुस्तान जैसे प्रमुख प्लेटफॉर्म्स के साथ काम किया है.

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