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Chewing: च्यूइंग से भी फैलता है प्रदूषण, प्रकृति के लिए ये सबसे खतरनाक

अधिकांश लोगों का शौक च्‍युइंग खाने का होता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि च्‍युइंग गम धरती पर सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं. जानिए धरती पर किस तरीके से च्‍युइंग के कारण गम पॉल्यूशन होता है.

अधिकांश लोगों का शौक च्यूइंग खाने का होता है. क्रिकेटर से लेकर सेलेब्रिटी तक अक्सर च्यूइंग खाते दिखते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि च्यूइंग से प्रदूषण फैलता है और ये प्रकृति के लिए बहुत खतरनाक है. आज हम आपको बताएंगे कि च्यूइंग से कैसे प्रदूषण फैलता है और ये कितना नुकसानदायक है.

च्युइंग

आप अपने आस-पास बहुत लोगों को देखते होंगे वो च्युइंग खाते हैं. खेलते समय, कार ड्राइव करते समय, मूवी देखते समय और अन्य गतिविधियों के समय अक्सर लोग च्यूइंग खाना पसंद करते हैं. कुछ लोग च्युइंग चबाते हुए बबल्स भी मनाते हैं. लेकिन च्यूइंग खाने के बाद अक्सर लोग इधर-उधर थूक देते हैं या उसे कहीं चिपका देते हैं.

च्युइंग नहीं होते हैं खत्म

बता दें कि आंकड़ों के मुताबिक दुनियाभर में लोग हर साल करीब 1,00,000 टन च्‍युइंग गम चबाते हैं. ये च्युइंग धरती पर मौजूद रहते हैं, ये खत्म नहीं होते हैं. जानकारी के मुताबिक प्राचीन सभ्यताओं में लोग चीकल जैसे पेड़ के रेजिन को चबाते थे. लेकिन 1950 के दशक तक इसकी जगह सिंथेटिक गम ने ले ली थी. इस गम बेस के साथ आधुनिक च्युइंग गम में वनस्पति तेल, इमल्सीफायर जैसे सॉफ्टनर होते हैं, जो चिपचिपाहट को कम करते हैं. इसमें अलग अलग फ्लेवर, मिठास, प्रिजर्वेटिव्‍स और रंग भी मिलाए जाते हैं.

च्‍युइंग गम कब बना?

बता दें कि सिंथेटिक गम आमतौर पर बायोडिग्रेडेबल नहीं होते हैं. कुछ मामलों में उन्हें रिसाइकिल करके नए प्लास्टिक उत्पाद बनाए जा सकते हैं. हालांकि अब बायोडिग्रेडेबल च्‍युइंग गम भी बनाए जा रहे हैं. जानकारी के मुताबिक बबल गम 1928 के दौरान पहली बार बाजार में आया था.

च्‍युइंग गम के नुकसान?

च्‍युइंग गम को चबाने के बाद बचे हुए हिस्‍से से फैलने वाले प्रदूषण को ‘गम पॉल्‍यूशन’ कहा जाता है. हर साल सिर्फ च्‍युइंग गम से सैकड़ों टन प्‍लास्टिक कचरा पैदा होता है. च्‍युइंगम का ये नॉन-बायोडिग्रेडेबल प्‍लास्टिक कचरा ही पर्यावरण में प्रदूषण की वजह बनता है. वहीं सड़कों पर फेंकी गई च्‍युइंग गम जहरीले पदार्थों को इकट्ठा करके जलस्रोतों तक पहुंच जाती है. बता दें कि च्‍युइंग गम पॉलीसोब्यूटिन नामक सिंथेटिक पॉलिमर के बेस से बनाई जाती है.

बता दें कि च्‍युइंग गम में इस्‍तेमाल होने वाला पॉलीसोब्यूटिन एक प्रकार की सिंथेटिक प्‍लास्टिक सामग्री है. ये ही च्‍युइंग गम को ज्‍यादा लचीला बनाने में मदद करता है. वहीं जब च्‍युइंग गम नदी, तालाब या समंदर में पहुंचती है, तो मछलियां इसे निगल लेती हैं. च्‍युइंग गम के साथ उस पर जमा हुए तमाम टॉक्सिंस भी मछली के पेट में चले जाते हैं. वहीं जब मछली को लोग अपना भोजन बनाते हैं. इससे इंसानों को गंभीर बीमारियां हो सकती हैं.

पर्यावरण को नुकसान

च्‍युइंग गम पर्यावरण को सबसे अधिक हानि पहुंचाता है. ये सालों-साल तक अपनी अंतिम अवस्‍था में मौजूद रहकर पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है. इसे सिगरेट की बड्स के बाद दुनिया में दूसरी सबसे ज्‍यादा प्रदूषण फैलाने वाली चीज माना जाता है. एक अनुमान के मुताबिक गम धरती के लैंडफिल में 2,50,000 टन कचरे का निर्माण करता है.

ये भी पढ़ें: Vegan Diet: क्या होती है वीगन डाइट, ये शरीर के लिए फायदेमंद या नुकसानदायक

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