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पुरानी दुश्मनी भुलाकर क्या सत्ता के शिखर पर पहुंच पाएंगी मायावती?

पिछले लोकसभा चुनाव में मायावती की पार्टी एक सीट भी नहीं जीत पाई थी. इस बार उन्होंने अपनी पुरानी दुश्मनी को भुलाकर समाजवादी पार्टी के लिए गठबंधन किया है. मुलायम सिंह यादव के लिए उन्होंने वोट भी मांगे. 2019 के नतीजे मायावती के लिए बेहद महत्वपूर्ण होंगे.

Lok Sabha Election 2019: इस बार के लोकसभा चुनाव में बीएसपी सुप्रीमो मायावती पर सबकी नजरें हैं और उनकी नजर प्रधानमंत्री पद की कुर्सी पर है. वे इस बार चुनाव तो नहीं लड़ रही हैं लेकिन वे इशारा कर चुकी हैं कि पीएम पद की कुर्सी पर उनकी नजर है. 20 मार्च को अपने एक ट्वीट में उन्होंने लिखा कि जब वे 1995 में पहली बार यूपी की सीएम बनी थीं तब वे यूपी के किसी भी सदन की सदस्य नहीं थीं. ठीक उसी तरह केंद्र में भी पीएम/मंत्री को छह महीने के भीतर लोकसभा/राज्यसभा का सदस्य बनना होता है. इसलिए चुनाव नहीं लड़ने के उनके फैसले से लोगों को मायूस नहीं होना चाहिए.

2014 के लोकसभा चुनाव में मायावती की पार्टी यूपी में करीब 20 फीसदी वोट लाने के बावजूद 80 में से एक भी सीट नहीं जीत पाई थी. तब यूपी की सत्ता पर काबिज अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी करीब 22 फीसदी वोटों के साथ पांच सीटे ही जीत सकी थी. साल 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनो ही पार्टियों को तगड़ा झटका लगा. तीन बार मुख्यमंत्री रही मायावती को 19 सीटें (22.2%) मिली वहीं सत्ता पर काबिज अखिलेश यादव को 47 (22) सीटें मिली. बीजेपी ने दोनों पार्टियों की कमर तोड़ते हुए कुल 403 सीटों में से 312 सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की.

ऐसे में राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाले दोनों नेताओं के सामने अपनी खोई हुई जमीन वापस पाने की चुनौती खड़ी हो गई. दोनों नेता इस बात को बखूबी समझते थे. ऐसे में मायावती और अखिलेश यादव ने साथ आने का फैसला किया. इस फैसले ने सियासी गलियारे की सरगर्मी को बढ़ा दिया. राजनीति पर पकड़ रखने वाले लोगों को फिर से अपने गणित को दुरुस्त करना पड़ा. इन दोनों नेताओं के साथ आने का मतलब था कि दो बड़े वोट बैंक का एक साथ आना. इस फैसले का क्या प्रभाव होगा इसको लेकर प्रिंट से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में खूब चर्चा हुई. सभी ने अपने-अपने एंगल से यूपी की तस्वीर पेश करने की कोशिश की. गठबंधन की सुगबुगाहट होने तब ही होने लगी थी जब यूपी की तीन लोकसभा सीटों पर हुए उपचुनाव में सपा के कैंडिडेट को मायावती ने समर्थन देने का एलान किया था.

सियासत की पाठशाला में अखिलेश यादव, मायावती से बहुत जुनियर हैं लेकिन यूपी की सीट शेयरिंग में मायावती ने उन्हें बराबर का सीट दिया. ताकि सपा के समर्थकों में इस बात का मैसेज जाए कि बहनजी ने अखिलेश को बराबर का सम्मान दिया है. अब इस सम्मान को समाजवादी पार्टी के वोटर कितना लौटा पाते हैं ये तो 23 मई के नतीजों में पता चलेगा. दोनों नेताओं के पास अपना-अपना वोट बैंक है. मायावती ये जानती हैं कि अगर चुनाव में बीजेपी को मात देनी है तो दोनों के वोट बैंक का एक साथ आना बेहद महत्वपूर्ण है. ऐसे में बराबर-बराबर सीटों का फॉर्मूला बेहद सोच समझ कर लिया गया.

अक्सर ऐसा देखा जाता है कि दो दल गठबंधन तो कर लेते हैं लेकिन सीटों को लेकर खूब माथापच्ची और बयानबाजी होती है. यूपी के पड़ोसी राज्य बिहार में बीजेपी और नीतीश कुमार की पार्टी के बीच ऐसा देखने को मिला. लेकिन बीएसपी-एसपी के सीट बंटवारे का फैसला विवाद और बयानबाजी से बचकर किया गया. बसपा और सपा ने 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ने का फैसला किया और दो सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी. बाद में चौधरी अजीत सिंह की पार्टी राष्ट्रीय लोक दल के गठबंधन में शामिल होने के बाद तीन सीटें दी गई. अब मायावती 38, अखिलेश यादव 37 और आरएलडी तीन सीटों पर लड़ रही है. कांग्रेस को इस गठबंधन में शामिल नहीं किया गया.

वैसे तो सपा-बसपा का गठबंधन नया नहीं है. करीब 26 साल पहले बीएसपी के साथ समाजवादी पार्टी ने गठबंधन किया था और 1993 के विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थी. मुलायाम सिंह यादव सूबे के मुख्यमंत्री बने थे लेकिन ये दोस्ती ज्यादा दिनों तक नहीं चली. कई मुद्दों पर कांशीराम और मुलायम सिंह के रिश्ते में कड़वाहट आ गई. कांशीराम बीएसपी के संस्थापक थे और उनके कहने पर मायावती ने समाजवादी पार्टी से अपना गठबंधन तोड़ दिया. मुलायम सिंह यादव की सीएम की कुर्सी छिन गई. जिसके बाद गुस्साए समर्थकों ने मायावती पर हमला कर दिया. 2 जून 1995 को मायावती बीएसपी के विधायकों के साथ लखनऊ के गेस्टहाउस के कमरा नंबर 1 में थीं. अचानक समाजवादी पार्टी समर्थक गेस्टहाउस में घुस आए. हमलावरों से जान बचाने के लिए खुद को बचाने के लिए मायावती कमरे में बंद हो गईं थीं. इस हमले के बाद कभी सरकारी कार्यक्रम में भी मायावती और मुलायम साथ नजर नहीं आए लेकिन वक्त के साथ सबकुछ बदल गया. 19 अप्रैल 2019 ये वो दिन था जब मायवाती और मुलायाम सिंह एक मंच पर आए. मैनपुरी में मायावती ने मुलायाम सिंह यादव के लिए वोट मांगा.

चाहे गठबंधन करने का फैसला हो या फिर सीट बंटवारा हो, मायावती ने अपनी भूमिका अदा की. यूपी में तीन चरणों के तहत वोटिंग हो चुकी है. चार चरण बाकी हैं. 2014 में शून्य पाने वाली मायावती 2019 के नतीजों के बाद किस भूमिका में होती हैं ये समय के गर्भ में है.

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