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Karnataka Election 2023: कर्नाटक में मजबूत विपक्ष के सामने क्या है बीजेपी की ताकत, कमजोरी, अवसर और खतरा?

Karnataka Election 2023: कर्नाटक की राजनीति में 1989 के बाद से किसी भी सत्तारूढ़ दल की सत्ता में वापसी का रिकॉर्ड नहीं है. हालांकि, पिछले चार में से तीन चुनावों में बीजेपी बड़ी पार्टी के रूप में उभरी.

Karnataka Election 2023: बीजेपी राज्य में सत्ता बरकरार रखने के लिए कर्नाटक विधानसभा चुनाव में अपनी जीत की लय को जारी रखने की कोशिश कर रही है. यह जीत इस साल के अंत में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में आगामी चुनावों में आत्मविश्वास को बढ़ाएगी और अगले साल के लोकसभा चुनाव से पहले राष्ट्रीय स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करेगी.

चुनावी राज्य में प्रधान मंत्री, गृह मंत्री और राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा सहित कई कद्दावर नेता के साथ सूबे की मैदान में उतरेंगे, लेकिन यह कर्नाटक में मजबूत दिखने वाली कांग्रेस के खिलाफ कितना प्रभावशाली होगा यह तो चुनाव के परिणाम ही बताएगा. सत्ताधारी दल के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप और सत्ता विरोधी लहर इस बार भाजपा के सत्ता में लौटने के लिए एक चुनौती बन सकती है.

बता दें कि कर्नाटक में सभी 224 सीटों पर एक ही चरण में 10 मई को मतदान होने वाला है, जिसका परिणाम मई 13 को आएगा. इसके साथ ही बीजेपी चुनावों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारी निर्भर है. पीएम मोदी पिछले चार महीनों में पहले ही चुनावी राज्य में सात दौरे कर चुके हैं. यहां आप कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी की ताकत, कमजोरियों, अवसरों और खतरों के बारे में समझेंगे.

सबसे पहले जानें बीजेपी की ताकत क्या है?

कर्नाटक के पिछले चार विधानसभा चुनावों में बीजेपी तीन में राज्य के निर्वाचन क्षेत्रों में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी थी. सिवाय मैसूरु क्षेत्र को छोड़कर. हालांकि पार्टी पीएम मोदी की लोकप्रियता के जरिए लोगों के समर्थन को अधिकतम करने का लक्ष्य लेकर चल रही है.

वहीं बीजेपी की राज्य इकाई पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा पर भी निर्भर है, जिन्हें राजनीतिक रूप से प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का समर्थन प्राप्त है. 2019 के लोकसभा चुनावों में, बीजेपी ने दक्षिण कर्नाटक में अपने प्रदर्शन में काफी सुधार किया है, जिसे वह इस विधानसभा चुनाव में भी बनाए रखना चाहेगी.

बीजेपी के पास आरएसएस के रूप में एक बड़ा संगठन साथ देने के लिए है, जिसने साथ रहकर पार्टी को गुजरात, उत्तर प्रदेश के साथ और उत्तर-पूर्वी राज्यों के जीत में भी बड़ी भागीदारी निभाई थी. 

किस बिंदु पर कमजोर दिख सकती है पार्टी

बीजेपी पहली बार कर्नाटक विधानसभा चुनाव में बिना मुख्यमंत्री चेहरा के उतरेगी, जिससे कहीं ना कहीं एक समर्थक वर्ग को ठेस पहुंच सकती है. साथ ही बीएस येदियुरप्पा, जो राज्य में साल 1980 से पार्टी का बतौर चेहरा थे और अब वह संन्यास ले चुके हैं, इससे भी पार्टी को कुछ नुकसान देखना पड़ सकता है.

वहीं बीजेपी के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर भी है और राज्य में 1989 के बाद से किसी भी सत्तारूढ़ दल की सत्ता में वापसी का रिकॉर्ड नहीं है. इसके अलावा, भ्रष्टाचार के आरोपों और हाल ही में रिश्वत के आरोप में भाजपा विधायक मदल विरुपक्षप्पा और उनके बेटे की गिरफ्तारी ने पार्टी के अभियान को ठोस पहुंचाया है. जिसे कांग्रेस अपने चुनाव अभियान का केंद्र बिंदु बनाने के लिए तैयार है.

इन अवसरों से मिल सकती है सत्ता

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी का "डबल इंजन" सरकार के अभियान को पार्टी के लिए अच्छा बताया जा रहा है. वहीं इस बार पार्टी के लिए पुराने मैसूरु क्षेत्र में बढ़ते समर्थन आधार को जोड़ने का अवसर भी है, जहां कांग्रेस और जेडी (एस) मजबूत रहे हैं. साथ ही बीजेपी को मांड्या से निर्दलीय सांसद सुमलता अंबरीश के समर्थन का भी लाभ उठा मिल सकता है.

इसके अलावा, बीजेपी ने वोक्कालिगा, लिंगायत और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदायों के लिए शिक्षा और सरकारी नौकरियों में कोटा बढ़ा दिया है, जो पार्टी को जाति समूहों में अपना आधार बढ़ाने में मदद कर सकता है. साथ ही बीजेपी ने दक्षिणपंथी समर्थकों के साथ भावनात्मक संबंध बनाने के लिए पूरे राज्य में ऐतिहासिक प्रतीकों और धार्मिक शख्सियतों की प्रतिमाएं लगाकर एक अभियान भी चलाया है.

मतदाताओं के बंटने का खतरा 

बीजेपी के कुछ नेताओं का आक्रामक हिंदुत्व एजेंडा राज्य के कुछ हिस्सों में उलटा पड़ सकता है, जहां मतदाताओं का आधार बंटा हुआ है. प्रचार के दौरान मौजूदा सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों पर कांग्रेस का फोकस भी एक खतरा पैदा कर सकता है. अनुसूचित जातियों के कोटे में बदलाव भी चुनाव में कही न कही खतरा पहुंचा सकता है.

वहीं अल्पसंख्यकों के लिए ओबीसी कोटा खत्म होने के बाद यह समूह भी पार्टी से दूरी बना सकता है. बीजेपी को कांग्रेस द्वारा की गई पांच चुनावी गारंटियों का मुकाबला करने की जरूरत है जो गरीबों और मध्यम वर्ग के वोट आधार को दूर कर सकती हैं. अगर कुछ प्रमुख उम्मीदवारों को टिकट नहीं मिला तो पार्टी में असंतोष की भी संभावना है.

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