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जानें उम्मुल ख़ैर ने कैसे तय किया झुग्गी से लेकर सिविल सर्विसेज पास करने तक का सफर

नई दिल्ली: ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले, ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है. उर्दू के शायर अल्लामा इक़बाल की इन पंक्तियों को दिल्ली की उम्मुल खैर ने सच साबित कर दिखाया है. उम्मुल ने यूपीएससी के सिविल सर्विसेज एग्जाम में सफलता हासिल की है. उम्मुल की ये सफलता इसलिए बड़ी है क्योंकि उन्होंने अपनी जिंदगी मे काफी संघर्ष किया है.  उम्मुल ने सिविल सर्विसेज एग्जाम में 420वीं रैंक हासिल की है.

मैं जो कुछ भी हूं संघर्ष की वजह से हूं- उम्मुल खैर रोजगार की तलाश में उम्मुल का परिवार राजस्थान से दिल्ली आया. दिल्ली आने के बाद उम्मुल और उनका पूरा परिवार निजामुद्दीन के स्लम एरिया में रहा. उम्मुल का घर बल्लियों और फट्टों से बनी हुई एक झुग्गी थी. बारिश के दिनों में बेतरतीब छत से पानी टपकता रहता था और रास्ते नालियों से नाला बन जाते थे. उम्मुल अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताती हैं कि 2001 में हमारा घर टूट गया. उस वक्त मैं 5वीं क्लास में थी. इसके बाद हमने त्रिलोकपुरी में रहने का इरादा किया. मेरे पापा हजरत निजामुद्दीन के फुटपाथ पर कुछ सामान बेचा करते थे. घर टूट जाने के बाद त्रिलोकपुरी गए तो पापा के पास कोई काम भी नहीं था.

7वीं क्लास में लिया बच्चों को पढ़ाने का फैसला उम्मुल बताती हैं कि जब वे 7वीं क्लास में थीं तब उन्होंने परिवार की आर्थिक स्थिति देखते हुए बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने का इरादा किया. उम्मुल ने बताया त्रिलोकपुरी बहुत गरीब इलाका था जिसके कारण फीस बहुत कम मिला करती थी. मैं 50 रुपए में बच्चों को पूरे महीने ट्यूशन पढ़ाया करती थी. मेरी कमाई से किसी तरह से घर का गुजारा होता था.

फ्रिजाइल बोन डिस्ऑर्डर से ग्रसित हैं उम्मुल उम्मुल को फ्रिजाइल बोन डिस्ऑर्डर नाम की बीमारी है. इस बीमारी की वजह से हड्डियां बेहद ही कमजोर हो जाती हैं. बचपन में उम्मुल की हड्डियों में 16 बार फ्रैक्चर हो चुका है. इन फ्रैक्चर्स को ठीक कराने के लिए उम्मुल को कई सर्जरी भी करानी पड़ी.

उम्मुल ने 9वीं क्लास में छोड़ा अपना घर उम्मुल जब 8वीं क्लास में थीं तक उनके घरवालों ने उनपर पढ़ाई छोड़ने का बहुत दवाब बनाया. उम्मुल कहती हैं कि ये स्थिति उनके लिए 'करो या मरो' जैसी थी. उम्मुल के घरवालों ने साफ कर दिया कि अगर वे पढ़ाई नहीं छोड़ती हैं तो उन्हें अलग होना पड़ेगा. 9वीं क्लास में पढ़ने वाली उम्मुल ने त्रिलोकपुरी में ही एक कमरा किराए पर ले लिया और बच्चों को ट्यूशन पढ़ाती रहीं. इसी के साथ उन्होंने अपनी पढ़ाई भी जारी रखी.

दिव्यांगो और महिलाओं के लिए काम करना चाहती हैं उम्मुल उम्मुल अपने माता-पिता से मिलने राजस्थान जाएंगी. उम्मुल का कहना है कि उन्हें अपने माता-पिता से कोई नाराजगी नहीं है. उनका मकसद सफलता हासिल करना था जो उन्होंने कर ली. उम्मुल का कहना है कि उन्हें जो विभाग मिलेगा वे उस विभाग में पूरी ईमानदारी से काम करेंगी. अगर उम्मुल को मौका मिला तो वे दिव्यांगों और महिलाओं के लिए काम करना चाहेंगी.

उम्मुल कर चूकीं हैं भारत का प्रतिनिधित्व उम्मुल दिव्यांगों से जुड़े कई कार्यक्रमों में भारत का विदेशों में प्रतिनिधित्व भी कर चुकी हैं. उम्मुल इन कार्यक्रमों के तहत कई बार कोरिया और जापान जा चुकी हैं. 2014 में उम्मुल का जापान के इंटरनेशनल लीडरशिप ट्रेनिंग प्रोग्राम के लिए सेलेक्शन हुआ था. उम्मुल के लिए ये भी एक बड़ी कामयाबी थी क्योंकि 18 साल में सिर्फ तीन भारतीयों को ही इस प्रोग्राम के लिए चुना गया था. उम्मुल ऐसी चौथी भारतीय थीं जो इस प्रोग्राम के लिए चुनी गई थीं.

उम्मुल ने दिल्ली यूनिवर्सिटी के गार्गी कॉलेज से साइकॉलजी में ऑनर्स किया है. इसके बाद उन्होंने जेएनयू का रुख किया. जेएनयू से उम्मुल ने इंटरनेशनल रिलेशंस में एमए किया.  मास्टर्स करने के बाद उम्मुल ने जेएनयू से ही एम. फिल किया. एम फिल के दौरान ही उन्हें यूजीसी-सीबीएई नेट में जेआरएफ मिला. अभी उम्मुल जेएनयू से पीएचडी कर रही हैं.

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