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R-1 और R-2 मॉडल क्या हैं और इससे स्टूडेंट्स को क्या होगा फायदा? आसान भाषा में जानें हर एक बात

आज के दौर में बच्चों को उनकी मातृभाषा से रूबरू कराना बेहद जरूरी हो गया है. इसके चलते आर-1 और आर-2 मॉडल काफी ज्यादा चर्चा में है.

पढ़ाई के दौरान बच्चों का जुड़ाव उनकी मातृभाषा से कैसे रखा जाए, जिससे वे दूसरी भाषाओं को सीखने के साथ-साथ इससे भी दूर न हो. इस मसले पर चर्चा के लिए एबीपी लाइव ने सोमवार (9 जून) को  एबीपी स्मार्ट एजुकेशन कॉनक्लेव का आयोजन किया, जिसमें एजुकेशन सेक्टर से जुड़े कई दिग्गजों ने अपनी बात रखी. इसी कड़ी में नई दिल्ली स्थित सेंट मार्क सीनियर सेकेंडरी पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल रितिका आनंद, नोएडा एक्सप्रेसवे स्थित दिल्ली पब्लिक स्कूल की प्रिंसिपल सुप्रीति चौहान और शेमरॉक एंड शेमफोर्ड ग्रुप ऑफ स्कूल्स के एमडी अमोल अरोड़ा ने आर-1 और आर-2 मॉडल पर अपनी राय रखी.

मातृभाषा से ऐसे बढ़ेगा बच्चों का कनेक्शन 

रितिका आनंद ने बताया कि आज के दौर में बच्चों को उनकी मातृभाषा से रूबरू कराना बेहद जरूरी हो गया है. इसके चलते आर-1 और आर-2 मॉडल काफी ज्यादा चर्चा में है. यही वजह है कि स्कूलों में बच्चों से जब बातचीत हो तो वह उस भाषा में हो, जिसमें वह आमतौर पर अपने घर में बात करते हैं. इससे उनका जुड़ाव उनकी मातृभाषा से बढ़ेगा. अधिकतर राज्यों में उनकी लोकल लैंग्वेज अलग है. सभी जगह हिंदी लोकल लैंग्वेज नहीं है. हम सिर्फ दिल्ली की भी बात करें तो यहां भी हर किसी की मातृभाषा हिंदी नहीं है. बच्चे को जितनी भाषाएं आ जाएं, उतना अच्छा है. उसे किसी दायरे में बांधना सही कदम नहीं होगा.

हर बच्चे की लोकल लैंग्वेज अलग

सुप्रीति चौहान ने बताया कि यह बेहद जरूरी है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा के बारे में सिखाया जाए. पढ़ाई-लिखाई के शुरुआती दौर में मातृभाषा की जानकारी होना बेहद जरूरी है. हालांकि, यहां सबसे बड़ा चैलेंज यह है कि किसी भी स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चों की लोकल लैंग्वेज हिंदी या अंग्रेजी नहीं है. अगर कोई किसी दूसरे राज्य से ताल्लुक रखता है तो उसकी लोकल लैंग्वेज अलग है. हर राज्य की अपनी अलग भाषा है, जहां के स्कूलों में लोकल लैंग्वेज में पढ़ाई करना अनिवार्य है. ऐसे में आर-1 और आर-2 मॉडल की अहमियत काफी ज्यादा बढ़ जाती है. ऐसे में मातृभाषा को लेकर हमारी जिम्मेदारी काफी ज्यादा बढ़ जाती है.

यहां देखें पूरा वीडियो

सबसे पहले समस्या को समझने की जरूरत

अमोल अरोड़ा ने कहा कि दरअसल हम समस्या को गलत तरीके से उठा रहे हैं. हम अक्सर हिंदी मीडियम और अंग्रेजी मीडियम एजुकेशन के बीच उलझे हुए हैं. ऐसे में समस्या यह है कि बच्चा चीजों को तो अपनी मातृभाषा में समझ रहा है, लेकिन उसे चीजें अंग्रेजी में बताई जा रही हैं. ऐसे में यह जरूरी नहीं है कि एक ही फॉर्म्युला सभी जगह काम करे. इसके लिए सोसायटी में चर्चा करना बेहतर जरूरी है. अब यह नहीं हो सकता कि बच्चे को अंग्रेजी बोलना आ गया तो वह कामयाब हो जाएगा. अब अंग्रेजी का काम तो एआई भी कर दे रहा है. आर-1 और आर-2 मॉडल को अप्लाई करने की जगह उसे समझने की जरूरत है, जिससे बच्चों का डिवेलपमेंट बेहतर हो सके. 

कार्यक्रम में ये स्पीकर्स भी हुए शामिल

एबीपी न्यूज के एबीपी स्मार्ट एजुकेशन कॉनक्लेव  में शिक्षा राज्य मंत्री सुकांता मजूमदार, Innov8 के डॉ. रितेश मलिक, एडम्स यूनिवर्सिटी के डॉ. समित राय, नेक्स्ट एजुकेशन के व्यास देव रल्हान, अड्डा247 के अनिल नागर समेत तमाम एजुकेशन एक्सपर्ट्स शामिल हुए. उन्होंने देश की शिक्षा नीति और एजुकेशन सिस्टम से जुड़े तमाम मसलों पर चर्चा की. साथ ही, बताया कि सरकार की शिक्षा नीति से बच्चों का भविष्य कैसे उज्ज्वल होगा. 

ये भी पढ़ें: मातृ भाषा में पढ़ाई से लेकर जॉब क्रिएशन तक, शिक्षा मंत्री ने बताया NEP लागू होने के बाद क्या होंगे बदलाव

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