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लोक सभा और विधान सभाओं में महिला आरक्षण: लंबा सफ़र बाक़ी, पार्टियों के रुख़ पर होगी नज़र, भविष्य से जुड़े पहलू को समझें

"दो क़दम हम चलें, दो क़दम तुम चलो
आधी दुनिया मेरी है, आधी दुनिया तुम्हारी है."

आज़ादी मिलने के 76 साल और संविधान लागू होने के 73 साल बाद भारतीय संसदीय व्यवस्था में आधी आबादी को अपना हिस्सा मिलने की उम्मीद जगी है. जनसंख्या में हिस्सेदारी क़रीब आधी होने के बावजूद महिलाओं को विधायिका में पर्याप्त हिस्सेदारी न मिल पाना हमेशा से देश की शासन व्यवस्था पर सवालिया-निशान के तौर पर रहा है.

अब जाकर उम्मीद बंधी है कि इस दिशा में निकट भविष्य में कुछ ठोस होगा. उम्मीद इसलिए कह रहा हूं क्योंकि अभी भी आधी आबादी के लिए लड़ाई लंबी है, सफ़र लंबा है. नए संसद भवन में 19 सितंबर से कामकाज की शुरुआत हुई और यह दिन एक ख़ास वजह से हमेशा-हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.

विधायिका में महिलाओं के लिए आरक्षण

लोकतंत्र के प्रमुख स्तंभ विधायिका में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की नज़र से इस दिन लोक सभा में नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से संविधान (एक सौ अट्ठाईसवां संशोधन) विधेयक, 2023 पेश किया गया. यह संविधान संशोधन विधेयक संसद के निचले सदन लोक सभा और राज्यों के विधान सभा में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को सुनिश्चित करने से जुड़ा है.

महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण 

ऐसे तो 1996 से विधायिका में महिला आरक्षण को लेकर प्रयास हो रहे हैं, लेकिन उसे अमली जामा पहनाना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं हुआ था. मौजूदा व़क्त में नरेंद्र मोदी सरकार जिस स्थिति में है, उसके मद्द-ए-नज़र अब एक तरह से तय हो गया है कि लोक सभा और विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33 फ़ीसदी सीटें आरक्षित हो जाएंगी. यहां पर एक बात ग़ौर करने वाली है कि इस विधेयक के जरिए लोक सभा और विधान सभाओं में ही महिला आरक्षण लागू होगा, संसद के उच्च सदन राज्य सभा और राज्यों के विधान परिषद में नहीं.

राज्य सभा और विधान परिषद में आरक्षण नहीं

हालांकि अभी भी कई पड़ाव हैं, जिनको पार करना है. सबसे पहले तो यह विधेयक एक संविधान संशोधन विधेयक है, जिसे संसद के दोनों सदनों से दो तिहाई बहुमत से पारित होना चाहिए. इस पैमाने पर तो अब 128वें संविधान संशोधन विधेयक के सामने कोई बड़ी चुनौती नहीं दिख रही है. तक़ाज़ा-ए-वक़्त तो यही कहता है कि अब अधिकांश राजनीतिक दलों के लिए इस विधेयक का समर्थन करना मजबूरी है. जिस तरह से दूसरे कार्यकाल के आखिरी साल में नरेंद्र मोदी सरकार इस मुद्दे पर संजीदगी दिखा रही है, उससे लगभग तय है कि महिला आरक्षण से जुड़े इस विधेयक के क़ानून बनने में कोई ख़ास रुकावट नहीं आने वाली है.

नारी शक्ति वंदन अधिनियम से क्या बदलेगा?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोक सभा और विधान सभाओं में महिलाओं की भागीदारी का विस्तार करने से जुड़े इस संविधान संशोधन से बनने वाले क़ानून को नारी शक्ति वंदन अधिनियम का नाम दिया है. सबसे पहले जानते हैं कि इस विधेयक के क़ानून बनने के बाद संविधान के किस-किस अनुच्छेद में बदलाव होगा. इस अधिनियम के जरिए अनुच्छेद 239AA, अनुच्छेद 330, अनुच्छेद 332, अनुच्छेद 334 में कुछ नए प्रावधान जुड़ जाएंगे.  अनुच्छेद 239AA में संशोधन के जरिए दिल्ली विधान सभा में, अनुच्छेद 330 में संशोधन के जरिए लोक सभा में और अनुच्छेद 332 में संशोधन के जरिए राज्यों की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीट आरक्षित हो जाएंगी.

ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से आरक्षण नहीं

इस विधेयक में एक बात स्पष्ट कर दिया गया है कि महिला आरक्षण के तहत अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से संबंधित महिलाओं के लिए भी एक तिहाई आरक्षण होगा. यहां स्पष्ट है कि महिला आरक्षण के तहत अलग से ओबीसी महिलाओं के लिए अलग से कोई आरक्षण नहीं होगा. कोटा के भीतर कोटा सिर्फ़ एससी और एसटी महिलाओं के लिए ही होगा. आरजेडी, समाजवादी पार्टी जैसे कई दल महिला आरक्षण के तहत कोटा के भीतर कोटा में अन्य पिछड़े वर्गों या'नी ओबीसी महिलाओं के लिए भी आरक्षण चाहते हैं. हालांकि मेरा मानना है कि फ़िलहाल सामान्य तौर से संसद और विधानमंडलों में सिर्फ़ अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए ही आरक्षण है, ओबीसी के लिए. इसलिए उसी ढर्रे पर महिला आरक्षण में भी एससी और एसटी के लिए कोटा का निर्धारण किया गया है.

2024 के लोक सभा चुनाव में लागू नहीं

एक सवाल उठता है कि महिला आरक्षण को मूर्त रूप देने से जुड़े इस विधेयक के क़ानून बनने के बाद क्या 2024 के लोक सभा चुनाव में महिला आरक्षण की व्यवस्था लागू हो जाएगी. इसका सरल सा जवाब है कि बिल्कुल नहीं. लोक सभा और विधान सभाओं में महिला आरक्षण कब से लागू होगा, इसके लिए कोई तारीख़ अभी तय नहीं है. लेकिन विधेयक में जो प्रावधान किए गए हैं उससे मुताबिक महिला आरक्षण 2029 के लोक सभा चुनाव में लागू हो सकता है.

लागू होने से पहले लंबी प्रक्रिया बाक़ी

महिलाओं के लिए सीटों के आरक्षण के प्रभावी होने की समय सीमा को लेकर विधेयक के सेक्शन 5 में  स्पष्ट किया गया है. इस सेक्शन में कहा गया है कि संविधान के अनुच्छेद 334 के बाद अनुच्छेद 334A जुड़ जाएगा. अनुच्छेद 334A में चार सेक्शन होंगे, अनुच्छेद 334A में यह स्पष्ट किया गया है कि  महिला आरक्षण कब से लागू होगा. इस अनुच्छेद के पहले सेक्शन में  कहा गया है कि संविधान (एक सौ अट्ठाईसवां संशोधन) अधिनियम, 2023 के प्रारंभ होने बाद जो पहली जनगणना होगी, उसके बाद फिर परिसीमन का कार्य किया जाएगा. उसके बाद ही महिला आरक्षण के संवैधानिक उपबंध लोक सभा और विधान सभाओं में लागू होंगे. इस सेक्शन में यह भी स्पष्ट किया गया है कि शुरुआत में महिला आरक्षण की व्यवस्था 15 साल के लिए होगी. उसके बाद महिला आरक्षण को जारी रखना होगा, तो संसद से क़ानून बनाकर इसे आगे के लिए बढ़ाया जा सकता है.

महिला आरक्षण रोटेशन के आधार पर लागू

अनुच्छेद 334A के सेक्शन 3 में स्पष्ट कर दिया गया है कि महिला आरक्षण रोटेशन के आधार पर लागू होगा और हर परिसीमन के बाद उसमें बदलाव देखने को मिल सकता है. उसी तरह से अनुच्छेद 334A के सेक्शन 4 में  यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि इस क़ानून का प्रभाव या असर मौजूदा लोक सभा या विधान सभाओं पर नहीं पड़ने वाला है. नए क़ानून के प्रावधान मौजूदा लोक सभा या विधान सभाओं के विघटन के बाद ही लागू होंगे. इन सब बातों से ज़ाहिर है कि महिला आरक्षण के प्रावधान निकट भविष्य में लागू होने वाले नहीं है. लोक सभा में 2029 और अलग-अलग विधान सभाओं में अलग-अलग तारीखों पर ये लागू हो सकते हैं.

क्या निकट भविष्य में बढ़ेगी सीटों की संख्या?

सवाल उठता है कि क्या महिला आरक्षण को लागू करने के लिए लोक सभा और विधान सभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी. फिलहाल इस पर सरकार की ओर से या मौजूदा संविधान संशोधन विधेयक में कुछ नहीं कहा गया है. अभी तो फिलहाल यही कह सकते हैं कि यथास्थिति मौजूदा वक़्त में जो सीट हैं, उन्हीं पर महिला आरक्षण की व्यवस्था लागू होगी.

भविष्य में अगर सीटों की संख्या में बदलाव करना है तो यह 2026 के बाद ही हो सकता है. ऐसे भी क़ानून तभी लागू होगा जब जनगणना के नए आंकड़े प्रकाशित होने के बाद परिसीमन का काम पूरा कर लिया जाएगा. जैसा कि हम सब जानते हैं कि संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत परिसीमन का काम होता है. 2002 में यथासंशोधित अनुच्छेद 82 के मुताबिक़ 2026 के बाद की गयी पहली जनगणना के आधार पर परिसीमन प्रक्रिया के माध्यम से लोक सभा और विधान सभाओं की सीटें बढ़ाई जा सकती हैं, उससे पहले नहीं. जो हालात बन रहे हैं, उसके मुताबिक़ 2024 में तो महिला आरक्षण लागू होना नहीं है, तो  इसकी संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता है कि जब 2029 लोक सभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू हो, तब तक लोक सभा में सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए सरकार नया क़ानून बना दे.

लागू होने से लोक सभा में क्या होगा बदलाव?

मौजूदा हालात में अगर उदाहरण से समझें तो अभी लोक सभा के लिए 543 सीटों पर चुनाव होता है. जैसे ही महिला आरक्षण से जुड़ा क़ानून लागू हो जाएगा, इनमें से 181 सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी. फिलहाल लोक सभा में 82 महिला सांसद हैं, इस लिहाज़ से यह क्रांतिकारी कदम है. इसी तर्ज़ पर राज्यों की विधान सभाओं में भी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएंगी.

राजनीतिक और सामाजिक पहलू महत्वपूर्ण

यह सब तो संवैधानिक, क़ानूनी पहलू हैं. महिला आरक्षण से राजनीतिक और सामाजिक पहलू भी जुड़े हुए हैं. यह बात सच है कि लोक सभा और विधान सभा में महिलाओं की भागीदारी का विस्तार होने जा रहा है. इसके लिए लंबी लड़ाई भी लड़ी गई है. किसी भी राष्ट्र की उन्नति सही मायने में तभी हो सकती है, जब नीति निर्धारण में भी महिलाओं की भागीदारी या योगदान बराबरी की हो. इस लिहाज़ से नारी शक्ति वंदन अधिनियम मील का पत्थर साबित होगा, इसमें कोई दो राय नहीं है.

क्या एक तिहाई आरक्षण है पर्याप्त?

पहला राजनीतिक और सामाजिक पहलू है कि जब संविधान लागू होने के इतने साल बाद महिलाओं को लोक सभा और विधान सभाओं में आरक्षण मिलने ही जा रहा है, तो यह एक तिहाई की जगह पर 50 फ़ीसदी होना चाहिए था. अगर यही आरक्षण संविधान के लागू होने के वक़्त से लागू होता तब तो उससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता था और उस वक़्त की परिस्थितियों को देखते हुए 33 फ़ीसदी का आंकड़ा को संतोषजनक माना जा सकता था. लेकिन इतनी मशक़्क़त पर जब संविधान लागू होने के 76 साल बाद महिला आरक्षण से जुड़ी उम्मीदों को पंख लगने जा रहा है, तो 50 प्रतिशत का आंकड़ा ही सही होता. 21वीं सदी के भारत में, विकसित राष्ट्र बनाने के लिए नीति निर्धारण में महिलाओं की भागीदारी बराबरी की होनी चाहिए. ऐसे भी यह मसला यहां की सरकार और राजनीतिक दलों के लिए कितना पेचीदा रहा है, यह हम सब जानते हैं.

अमल में पार्टियों के रुख़ पर होगी नज़र

राजनीतिक और सामाजिक तौर से विधायिका में महिला आरक्षण से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू इस पर अमल है. क़ानून तो बन जाएगा, लेकिन इसको लागू करने को लेकर देश के राजनीतिक दल भविष्य में  क्या रुख़ अपनाते हैं, ये देखना महत्वपूर्ण होगा. विधायिका में महिलाओं की अधिक से अधिक भागीदारी सुनिश्चित हो, इसके लिए ज़रूरी है कि राजनीतिक दल पीछे के रास्ते से महिलाओं का हक़ न छीने. राजनीतिक दलों के रुख़ पर सब कुछ निर्भर करता है.

पिछले दरवाजे से महिलाओं के हक़ का न हो हनन

इसे उदाहरण के माध्यम से बेहतर तरीक़े से समझा जा सकता. फिलहाल बिना आरक्षण के लोक सभा में 82 महिला सांसद हैं. अब अगर महिला आरक्षण क़ानून लागू हो जाता है, तो कहीं ऐसा न हो कि राजनीतिक दल सिर्फ़ उन्हीं सीटों पर महिला उम्मीदवार को टिकट दें, जो महिलाओं के लिए आरक्षित हैं. अगर ऐसा हुआ तो यह एक प्रकार से विधायिका में महिलाओं की भागीदारी के विस्तार पर चोट होगा. भविष्य में इस मसले पर राजनीतिक दलों को संकीर्ण मानसिकता से बाहर आना होगा. तभी सही मायने में लोक सभा और विधान सभाओं में आबादी के हिसाब से महिलाओं को उनका हक़ मिल पाएगा. महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों के अलावा सामान्य सीटों पर भी, जहां किसी महिला की दावेदारी बनती है, राजनीतिक दलों को टिकट देने में कोताही नहीं बरतनी होगी. अगर पार्टियां ऐसा करती हैं, तो यह पिछले दरवाजे से महिलाओं के अधिकार का हनन होगा.

आम महिलाओं को पार्टियां देंगी टिकट!

इसका एक और राजनीतिक और सामाजिक पहलू है, जो बेहद गंभीर है. यह हम सब जानते हैं जानते हैं कि भारतीय संसदीय व्यवस्था में लोक सभा या विधान सभा का चुनाव जीतना कितना मुश्किल काम है. चुनाव लड़ना दुरूह नहीं है, लेकिन चुनाव जीतना बेहद कठिन और चुनौतीपूर्ण है. इक्का-दुक्का अपवाद छोड़ दें, तो धनबल, बाहुबल के साथ ही राजनीतिक और आर्थिक रसूख़ की इसमें भूमिका बहुत अधिक या कहें सब कुछ है. लोक सभा या विधान सभा चुनाव में बड़ी या प्रभावशाली पार्टियों से टिकट पाना ही आम लोगों के लिए दिन में तारे देखने सरीखा है.

राजनीतिक रसूख़ से न हो दुरुपयोग

विधायिका में महिला आरक्षण लागू हो जाएगा, तो कहीं ऐसा न हो कि इसका ज़्यादातर फ़ाइदा पहले से ही राजनीतिक में प्रभाव रखने वाले परिवार की महिलाओं को ही मिले. महिलाओं के लिए आरक्षित कई ऐसी सीटें सभी होंगी, जहां अब तक पुरुष सांसद बनते आए थे. आरक्षण लागू होने के बाद ऐसे पुरुषों का पूरा ज़ोर होगा कि उनके घर परिवार की महिलाओं को ही राजनीतिक दल टिकट दें, भले ही तब तक उनके परिवार की महिलाओं का दूर-दूर तक राजनीति से कोई वास्ता न रहा हो. अगर ऐसा हुआ तो सांसद को महिला बन जाएंगी, लेकिन कई मामलों में सांसदी पुरुष के पास ही रहेगा.

महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ हो सुनिश्चित

इस नजरिए से सोचें तो महिला आरक्षण का सही लाभ तभी मिल सकता है, जब बड़े-बड़े राजनीतिक रसूख़ वाले परिवारों के साथ ही आम महिलाओं को राजनीतिक दल आरक्षित सीटों पर टिकट दें. इस दिशा में राजनीतिक दलों के साथ ही सरकार की ओर से भी प्रयास किए जाने की ज़रूरत है, ताकि देश को, समाज को महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ व्यापक रूप से हासिल हो सके.

राजनीति में परिवारवाद पर अंकुश लगाने का वक़्त

महिला आरक्षण के बहाने ही सही अब राजनीति में परिवारवाद पर अंकुश लगाने के लिए सरकारी स्तर पर भी कोशिश करने का वक़्त आ गया है. भविष्य में सरकार को क़ानूनी स्तर पर कुछ ऐसे क़दम उठाने की दरकार है, जिनसे महिला आरक्षण का वास्तविक लाभ समाज के हर तबके तक पहुंचे. हालांकि अब तक पिछले 7 दशक से भारत में सरकार और राजनीतिक दलों का जो रवैया रहा है, उसको देखते हुए ऐसा करना आसान नहीं है. फिर भी देर से ही सही, महिला आरक्षण की तरह ही इसकी उम्मीद तो की ही जा सकती है कि भविष्य में सरकार और तमाम राजनीतिक दल इस दिशा में 
ठोस क़दम उठाएंगे.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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