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यूपी में भाजपा ने जल्दबाजी में जारी कर दी पहली सूची, अब सीट बंटवारे से लेकर उम्मीदवारों तक फंस गया है पेंच

जिस उत्तर प्रदेश में भाजपा 80 में 80 सीटों की जीत का दावा कर रही है, वहां अभी भी करीब 25 सीटों पर पेंच फंसा हुआ है. हालांकि, लोकसभा चुनाव को लेकर भाजपा कार्यकारी समिति की बैठक संपन्न हो गई है.  बैठक में यूपी के मंत्री, उप मुख्यमंत्री के अलावा उत्तर प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष को भी बुलाया गया था. जानकारों का मानना है कि भाजपा ने पहली सूची तो बहुत पहले जारी कर दी. बहुत सारे कयास को नकारते हुए भाजपा ने कई वर्तमान (सिटिंग) सांसदों को भी टिकट दे दिया. जबकि बातें ये उठ रही थी कि उनके प्रति जनता में आक्रोश का भाव है. जनता वर्तमान के सांसद पर भरोसा नहीं जता रही. इसके बावजूद भाजपा ने उनको टिकट देकर चौका दिया.

थमी है भाजपा की रफ्तार, प्रत्याशियों को परेशानी

पहली सूची जारी करने के बाद भाजपा की रफ्तार थोड़ी सी थमती हुई दिख रही है. कई जगहों के लिए अभी तक नाम स्पष्ट नहीं हो पाए हैं, जबकि वहां पर जो प्रबल दावेदार है उनके साथ अलग तरह की समस्याएं है. देखा जाए तो मेनका गांधी और वरुण गांधी को लेकर कोई अभी तक राय नहीं बन पाई है. दूसरी आर बृजभूषण सिंह को लेकर अलग ही विवाद चल रहा है. भाजपा के कार्यकाल के पूरे समय वरुण गांधी अपने ही सरकार के विरुद्ध लगातार आवाज उठाते रहे तो ऐसे में क्या भाजपा फिर से उनको मौका देगी? ये भी एक सवाल उठता है. बृजभूषण सिंह के इतने बड़े मामले और विवाद में फंसने के बावजूद वो ताल ठोक रहे हैं कि उनका टिकट कौन काटेगा और यही सब चीजें भाजपा के पार्टी को उलझा रही है. भाजपा के भीतर भी योगी खेमा की ओर से एक तरह का दबाव बना है कि उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद और बृजेश पाठक को भी लोकसभा का चुनाव लड़ाया जाए. केशव प्रसाद मौर्य को फूलपुर और बृजेश पाठक को उन्नाव से टिकट देने के लिए कहा जा रहा है. हालांकि अभी इस बात पर कोई फैसला नहीं हुआ है. ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिन पर अंदरखाने में मंथन चल रही है. भाजपा को एक नयी परेशानी और झेलनी पड़ रही है.

भाजपा ने जो पहली सूची जारी की है, उसमें से कई को उनके क्षेत्र में जनता के विरोध का सामना करना पड़ रहा है. सलेमपुर के प्रत्याशी को कई बार विरोध का सामना करना पड़ रहा है और उनको खुद अपमानित होना पड़ा है. बस्ती के प्रत्याशी को  कार्यालय नहीं खोलने दिया गया. सीतापुर सीट के सिटिंग सांसद का भी विरोध हो रहा है. कुशीनगर के सांसद को खदेड़ते हुए वीडियो वायरल हुआ था. संघ के लोगों की जो आंतरिक रिपोर्ट है वो चिंताग्रस्त करने वाली है. उस हिसाब से भाजपा ने सीट शेयरिंग में काफी जल्दबाजी दिखाई है. तो, एक संभावना यह भी है कि कुछ टिकट बदल भी दी जाए. प्रत्याशियों को जो विरोध झेलना पड़ रहा है उनका टिकट को रिप्लेस करने के लिए काफी है. ऐसे में भाजपा की चिंता काफी बढ़ी हुई है.

साझेदारों के साथ बनी समझदारी

बड़ी बात है कि भाजपा ने यूपी में अपने साझेदार को मना लिया है. सुभसपा हो चाहें वो पल्लवी पटेल हो या फिर बसपा के संस्थापक सदस्य के परिवार के लोग हों. कई लोग दूसरी पार्टी छोड़कर भाजपा का हाथ थाम चुके हैं. लेकिन भाजपा अपने घर की बात को नहीं सुलझा पा रही है. जानकारों का मानना है कि भाजपा जिस रणनीति पर काम कर रहा था, वो रणनीति अब कहीं न कहीं फेल होती दिख रही है. भाजपा अपने यहां कई पार्टियों के विधायकों और सांसदों के सहित अन्य नेताओं को अपने यहां ले आई है. अब उसके साथ टिकट के लिए और भी संकट बढ़ गया है, क्योंकि जो भी भाजपा में आया है वो एक आश्वासन चाहता है. क्योंकि टिकट मिलने की उम्मीद से वो भाजपा में शामिल हुआ. अभी कुछ दिनों के पहले की बात है कि बसपा के अनंत मिश्र भाजपा के कार्यालय तक पहुंचे हुए थे, लेकिन जॉइनिंग के आधा घंटा पहले ही वो वहां से निकल गए. भाजपा की रणनीति थी कि दूसरे पार्टी के नेताओं को तोड़ा जाए लेकिन जो भी कद्दावर नेता आ रहा है वो चुनाव लड़ने की दृष्टि से आ रहा है. वो एक पार्टी बेस के लिए नहीं आना चाहता, ये एक तरह से पार्टी के लिए सिर दर्द सा है.

भाजपा के लिए अपने ही सिरदर्द

सुभासपा को एक सीट, अपना दल को एक सीट भाजपा ने दे दिया है. लेकिन संजय निषाद अभी भी नाराज चल रहे हैं. क्योंकि उनको जो टिकट मिला है वो भाजपा के सिंबल पर मिला है. इसको लेकर वो कई बयान भी दे चुके हैं. इसके अलावा वो दिल्ली जाकर भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा से भी मिल चुके है. उन्होंने विरोध दर्ज कराया है कि भाजपा की जगह उनके पार्टी के सिंबल पर चुनाव लड़ा जाए. इस सब के अलावा एक समस्या ये भी बनी हई है कि जो दूसरे पार्टी के बड़े लोगों को बुलाया गया है उनको कहां अडजस्ट किया जाए, क्योंकि यूपी में विधानपरिषद का भी चुनाव खत्म हो चुका है. राज्यसभा के चुनाव भी खत्म हो चुके है. जिस पैमाने पर उस कद के नेताओं की जॉइनिंग हुई है अगर टिकट नहीं मिलता है तो वो नाराज हो सकते हैं. अभी हाल में ही बाराबंकी के प्रत्याशी का वीडियो वायरल हुआ उसके बाद उन्होंने अपना नाम चुनाव से हटा लिया. ऐसे में बहुत सारी चीजें भाजपा के अंदर है जो बाहर से सहज लगता है, लेकिन वैसा नहीं है.

भाजपा के लिए बढ़ रही परेशानी

भाजपा ने जो 80 सीटों को जीतने का ख्वाब देखा है. तो क्या ऐसा लगता है कि भाजपा को यूपी में 80 सीटों को जीतने में परेशानी होने वाली है, क्योंकि अंदरखाने में तो अभी तक बात बनती नहीं दिख रही है. जानकारों का मानना है कि भाजपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए ये महज एक नारा है. वो हर पॉलिटिक्ल पार्टी करती है. भाजपा 80 सीटों पर जीतने का दावा करती है तो दूसरी ओर अखिलेश यादव 80 सीटों पर हराने का वादा कर रहे हैं. लेकिन ये सिर्फ नारा भर है. जमीनी हकीकत भाजपा को भी पता है कि ये इतना सहज नहीं है. ये भी तब जब भाजपा के सहयोगी दल पिछले दस सालों में सबसे अधिक दबाव बनाने में कामयाब हो जा रहे हैं. यूपी में ओमप्रकाश राजभर को ही देखा जाए तो वो दबाव बनाकर यूपी में मंत्रिपरिषद भी लिए और लोकसभा में दावेदार भी हैं. बिहार में चिराग पासवान ने दबाव बनाकर सीट अपने पाले में कर लिए. महाराष्ट्र में अभी तक बात बनती हुए नहीं दिख रही. संजय निषाद अभी भी नाराजगी की स्थिति में है. भाजपा का एक अपना प्रभामंडल था कि वो अपने शर्तों पर गठबंधन करती है. अब कहीं न कहीं वो प्रभामंडल टूटते हुए दिख रहा है. ये वजह जमीनी संकेत की ओर से आने के बाद की है.

भाजपा के पास नहीं चुनावी मुद्दे

अगर भाजपा के मुद्दों को देखें तो अब कोई खास मुद्दा बचा नहीं है. भाजपा के पास नरेंद्र मोदी है. हिंदुत्व और सीएए ही एक मात्र अब मुद्दा बचा हुआ है. भाजपा के लिए आलोचनाएं भी है, जिसमें महंगाई, इकोनॉमी, इलेक्टोरल बांड आदि मुद्दा बना हुआ है. इसका असर अभी नीचे तक तो नहीं पहुंचा है लेकिन बात उठी हैं तो ये बात नीचे स्तर तक पहुंचेगी. इसके अलावा जातीय गोलबंदी भी है. ये सब चुनौती का कारण हो सकती है. इन सब को दरकिनार करते हुए ओवर कॉनफिडेंस में 51 सीटों पर प्रत्याशी को उतार देना एक समस्या पैदा कर चुका है. चर्चा तो रहती है कि दिल्ली और लखनऊ के बीच बातचीत उतनी सहज तरीके से नहीं रहती, लेकिन लोकसभा चुनाव में माना जाता है कि दिल्ली के फैसले ही यूपी में महत्वपूर्ण होते हैं. हालांकि, योगी आदित्यनाथ  का भी कद इतना बढ़ चुका है कि उनकी बातों को शीर्ष नेतृत्व दरकिनार नहीं कर सकती. हालांकि संगठन स्तर पर देखा जाए तो मुख्यंमत्री को हक है कि वो अपने फैसले पर अडिग रह सकते हैं लेकिन शीर्ष नेतृत्व को भी इन सब बातों पर ध्यान रखना होता है. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.] 

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