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'संवाद से कैदियों के जीवन में रंग भर रहा तिनका तिनका, लेकिन बहुत असंवेदनशील है समाज का रवैया'

चार साल पहले 31 जुलाई 2019 को डॉक्टर वर्तिका नंदा के फाउंडेशन तिनका-तिनका ने भारत की जेलों में सुधार की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया था. देश की सबसे पुरानी जेलों में से एक उत्तर प्रदेश की आगरा डिस्ट्रिक्ट जेल के अंदर तिनका-तिनका कम्युनिटी जेल रेडियो की शुरुआत की गई. इसके जरिए कैदियों के जीवन में रंग भरने और उनके जीवन में सुधार लाने का यह एक बड़ा प्रयास था. ये रेडियो आज आगरा डिस्ट्रिक्ट जेल के अंदर किस तरह कैदियों में बदलाव ला रहा है और देश के अंदर जेलों की मौजूदा स्थिति क्या है...? इन सब पर जेल सुधारक, तिनका तिनका की संस्थापक और लेडी श्रीराम कॉलेज के पत्रकारिता विभाग की अध्यक्ष डॉ. वर्तिका नंदा जी ने एबीपी डिजिटल टीम के राजेश कुमार के साथ बातचीत कर अपनी राय रखी. आइये जानते हैं, जेल में कम्युनिटी रेडियों की भूमिका, कैदियों के जीवन में बदलाव और जेल को लेकर समाज की सोच के बारे में उनका क्या कुछ कहना है:

1-सवाल: चार साल पहले तिनका-तिनका फाउंडेशन ने भारतीय जेलों में सुधार की आवश्यकता को देखते हुए भारत की पुरानी जेलों में से एक 'आगरा डिस्ट्रिक्ट जेल' में कम्युनिटी-रेडियो की शुरुआत की थी. इन चार साल में क्या बदलाव देखने को मिला? 

जवाब: इन चार साल में बदलाव तो पूरी दुनिया में बहुत कुछ हुआ, वैसे ही जेल में भी, लेकिन सवाल इसका है कि अंदरूनी प्रक्रिया जो थी इस बदलाव की, उसे देखना चाहिए. आगरा जेल में जो शुरुआत हुई, उससे ठीक पहले कोरोना का दौर था. जब हमने काम शुरू किया तो फिर कोरोना का दौर आ गया. उस समय कई लोगों ने कहा कि कोरोना के काल में जिंदगी जेल हो गयी है. यह लोगों ने बहुत आसानी से कह दिया, लेकिन उनको खयाल नहीं आया कि जेल के अंदर जो हैं, उनकी जिंदगी कैसी होगी? मुलाकातें बंद हो गयी थीं, परिवार से लोग आ नहीं पा रहे थे. जरिया केवल था कुछ चिट्ठियां और टेलीफोन. तो, रेडियो उनके लिए एक बड़ा जरिया बना, जिंदगी में उम्मीद और उत्साह के लिए. "तिनका-तिनका" की टैगलाइन है- "जेलों में इंद्रधनुष बनाना". हमने ये सोचा कि रेडियो के जरिए इंद्रधनुष बनाया जाए. बात ये हुई कि 2013 में जब देश का पहला जेल-रेडियो तिहाड़ में आया, तो उसकी मैं साक्षी थी. उस समय तिनका-तिनका तिहाड़ पर काम हो रहा था, किताब अपने अंतिम चरण में थी और पूरा काम मेरे सामने था. मेरे दिमाग में यह आया कि इस काम को आगे बढ़ाना है. रेडियो लाना है. आगरा का नाम आते ही ताजमहल का खयाल आता है, जेल का नहीं. यह लेकिन भारत की पुरानी जेलों में एक है. मुगलों के समय में यह बनी थी. पहले इसे हज यात्रियों के लिए बनाया गया था, बाद के वर्षों में यह जेल बनी. तो, हमने पहले वहां एक छोटा सा कमरा चुना, फिर कैदियों को और तब काम शुरू किया.

2-सवाल: तिनका-तिनका फाउंडेशन का कितनी जेलों में कम्युनिटी रेडियो चल रहा है और आप संवाद को कितना जरूरी मानती हैं, कैदियों के जीवन में सुधार लाने के लिए? 

हर जेल ने पहले मुझे खुद बदला. मैंने देखा कि कैदियों का चयन होने से लेकर काम शुरू करने तक उनके साथ ही जेल-स्टाफ में भी बदलाव आया. बंदियों में जेल-रेडियो को लेकर एक डर सा था, खासकर महिला कैदियों के मन में. हमने पहले एक महिला कैदी और दो कैदियों के साथ रेडियो की शुरुआत की. हरियाणा की जेलों में रेडियो लाने पर हमने विधिवत तैयारी की. यह आगरा की जेल से अधिक व्यवस्थित था. यह पूरे देश में सबसे अधिक सिस्टमैटिक था. आईसीएचआर के साथ मैं रिसर्च का काम कर रही थी, तो यही देखना चाह रही थी कि भारत की जेलों में संचार की, खासकर महिलाओं-बच्चों के संदर्भ में क्या स्थिति है? केंद्र इसका उत्तर प्रदेश भले था, पर हमारा नजरिया राष्ट्रीय था. उत्तर प्रदेश, हरियाणा के साथ हमने उत्तराखंड में भी काम शुरू किया. हरियाणा की 10 जेलों में रेडियो आ चुका है और एक दिन भी ऐसा नहीं रहा कि रेडियो रुका हो. इन तमाम जेलों में प्रसारण का समय बढ़ा, गुणवत्ता बढ़ी और महिला बंदियों की भी भागीदारी बढ़ी. उत्तराखंड में तीन महिला कैदियों के साथ हमने काम शुरू किया है. आगरा में अरबाज और सतीश आत्महत्या करना चाहते थे, लेकिन रेडियो के साथ जुड़े तो परिणाम अलग आए. पानीपत के जेल सुपरिटेंडेंट श्रीदेवी दयाल ने मुझे खुद बताया कि उनके कई कैदी डिप्रेशन के शिकार थे और हॉस्पिटल जाते थे. रेडियो आने के बाद इसमें गिरावट आयी. अपराध के शिकार कैदी भी लगभग शून्य हो गए. 

3-सवाल: 31 जुलाई 2019 को इसकी शुरुआत हुई थी. इन चार वर्षों में कई बदलाव हुए. जेल में आप आरजे का चुनाव कैसे करती हैं, कितने घंटे का कार्यक्रम चलता है? 

हरेक जेल अलग है, बंदी अलग है. जेल मैनुअल के मुताबिक हम बंदियों का चयन औऱ कार्यक्रम का चुनाव करते हैं. जिला जेल करनाल में 10 बंदियों का चयन हुआ था. प्रक्रिया होती है कि हम घोषणा करते हैं, बंदियों से बात करते हैं औऱ उनका चुनाव करते हैं. ये सब बाहर की दुनिया से अलग है. यही इसकी खूबसूरती और ताकत भी है. बंदियों को इस बात का कॉन्फिडेन्स रहता है कि उनकी बात वही कह रहे हैं. हमने 5 पुरुष और 5 महिला बंदी चुने. इनमें कोई भी ऐसा नहीं था, जिसका रेडियो से ताल्लुक रहा हो. हमने तिनका जेल-पत्रकारिता शुरू की. थोड़ा सा ट्रेनिंग और वही बंदी ग्रूमिंग के बाद अपना काम करने लगते हैं. आमतौर पर सबसे कम तो 1 घंटा प्रसारण होता है और अधिकतम 6 घंटे तक रेडियो के कार्यक्रम होते हैं. रोचक बात यह है कि राखी जैसे खास दिनों में सबसे लंबा प्रसारण होता है. करनाल की जेल में रात तक भी प्रसारण होता है. उस दिन होता है कि कई बंदियों से लोग मिलने आते हैं. ऐसा जब भी होता है तो जेल रेडियो के कार्यक्रम काफी चलते हैं. लीगल अवेयरनेस का भी कार्यक्रम खूब पसंद किया जाता है. अंबाला की जेल भी ऐतिहासिक है. यहीं नाथूराम गोडसे को फांसी हुई थी. यहां एक कैदी है शेरू नाम का. उसने कोरोना काल में पंजाबी में एक गाना लिखा. बहुत सुंदर था वह. वह गाना केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री तक पहुंचा और उन्होंने उसे ट्वीट किया. जेल में बैठे शेरू को खुद कोविड-19 हुआ था. उसकी कहानी से बहुत जागरूकता आई. यह रेडियो बंदियों के परिवारों को, बंदियों को, स्टाफ को, सबकी सहायता करता है. 

4-सवाल: कैदियों को लेकर आप लगातार काम कर रही हैं, उनके जीवन की बातें हम बहुत कम जानते हैं, आपने उसको कई बार बाहर उजागर किया है. आपके मुताबिक जेलों में और क्या सुधार होने चाहिए? 

देखिए, जेल दो तरह के होते हैं. एक तो कानून और प्रशासन की, जिसे हम सभी देखते हैं. एक जेल होती है, जिसे कोई देखता नहीं. वह व्यक्ति की मानसिक जेल होती है. सुधार की बहुत गुंजाइश है, जेलों में. उनके जीवन-स्तर से लेकर तमाम चीजों तक. उनकी संचार की जरूरते हैं. लिखना-पढ़ना है. बाहर की दुनिया को आत्मसात करने की बात हो. जेल तो ऐसी जगह है, जिसमें अंतहीन सुधार की जरूरत हो. वैसे, चीजें अब बदल रही हैं, पचास साल पहले जैसी थीं, वैसी नहीं हैं. सिनेमा और मीडिया ने भी बहुत नुकसान किया है. लोगों ने झूठ बोलकर कई बार शूट किया है. एक्सक्लूसिव स्टोरी की होड़ में जेल का इस्तेमाल किया गया. जेल का मिसयूज बाहरी दुनिया ने बहुत किया है. यह रुक जाए और संवेदनशील तरीके से हम रहें, तो बहुत अच्छा हो. जेल के अंदर भ्रष्टाचार की समस्या है. स्टाफ को घर अच्छा नहीं मिलता, समय पर प्रमोशन नहीं मिलता. शरीफ दबाए जाते हैं, बदमाश बच जाते हैं. कुछ जेलें ऐसी हैं जो दर्दनाक वजहों से सुर्खियों में रहा. जैसे, तिहाड़. ये छवियां जेल और बंदियों के लिए दिक्कत पैदा करती हैं. सुधार तो हरेक क्षेत्र में होना चाहिए. यह काम बंदियों से करवा सकते हैं. कई जेलों में बंदियों के पास काम नहीं. जेल में कई बार छोटे अपराधी बड़े अपराधी बन जाते हैं. हमे याद रखना चाहिए कि जेल जानेवाला कभी तो बाहर आएगा ही. तो, उनसे उसी तरह निबटना चाहिए. 

5-सवाल: जेलों में महिलाओं और बच्चों की क्या स्थिति है?

महिलाएं सबसे अपेक्षित हैं. भारत की जेलों पर अब तक कोई किताब नहीं आयी थी. तिनका-तिनका ने यह काम भी किया है. उसमें महिलाओं और बच्चों को बड़े स्तर पर शामिल किया है. महिलाओं को बुनियादी सुविधा भी नहीं मिलती. बहुत जवान महिलाएं हैं, जो बहुत छोटे सेल में रखा जाता है. कई जेलों में उनको रंग नहीं देखने को नहीं मिलता. बच्चों को भी ऐसे रखा जाता है, जैसे वे खुद अपराधी हों. कुछ बच्चे मां के साथ जेल आते हैं, लेकिन वे अपराधी नहीं हैं. सोचिए, जेल से जब वह छह साल बाद निकलेगा तो क्या होगा? असल में, जेल पर कोई ध्यान नहीं देता. हमारे लिए जेल का मतलब फिल्म है, मीडिया है, कुछ प्रचार है. कुछ महिलाओं की हालत ऐसी है, जो 20 साल, 25 साल से वही हैं. उनके मायके या ससुराल से कोई नहीं आता. बच्चों से कोई मिलने नहीं आता. फिर, वे वही सोचने लगते हैं कि जिंदगी का मतलब यही है. बाद में उनको पता चलता है कि जिंदगी तो बहुत अलग है. जेलों को सुधार और सहानुभूति चाहिए. जब मैं तिनका-तिनका डासना पर काम कर रही थी, तो डासना जेल के बच्चे मेरे पास बैठते थे. उनके लिए कोई खिलौना, किताब या चॉकलेट बड़ी चीज थी. उन्हें यकीन ही नहीं होता था कि ऐसा कुछ भी होता है. 

6-सवाल: तिनका-तिनका का आगे का लक्ष्य क्या है?

हम जेलों में इंद्रधनुष लाना चाहते हैं. यह दुखद है, क्योंकि समाज से सहयोग नहीं मिलता. हम आनेवाले दिनों में बंदियों की आवाज को एम्प्लिफाई करना चाहते हैं, उनके उत्साह को बढ़ाना है, जो फांसी की सजा पाए हैं, आजीवन कारावास पाए हैं, उनको थामना है. जो लोग जेल से निकलनेवाले हैं, उनको एक स्किल देना है. तिनका-तिनका पॉडकास्ट ऐसे बंदियों को अपनाना चाहता है. हर बार कोई ऐसा बंदी सामने आता है, जिसने जीवन में कुछ बदलाव लाने का प्रयास किया. कोई नर्स बन गया या गयी, कोई लाइब्रेरी में नौकरी करने लगा. हमारी कोशिश इनकी संख्या बढ़ाना है. तिनका-तिनका अवॉर्ड्स की जब हम घोषणा करेंगे तो देश के सारे बंदियों को जोड़ेंगे. एक बंदी की बात बताती हूं. वह ऑल इंडिया रेडियो का कर्मचारी था, राष्ट्रपति से सम्मानित था, उनकी आवाज को हम सहेज रहे हैं. ऐसी बहुत सी आवाजों को हम सहेज रहे हैं. हमें ये शक्ति मिले, ये आशीर्वाद मिले कि हम इन बंदियों की आंखों में सकारात्मक बदलाव और खुशी देख सकें. तिनका-तिनका बंदियों की मन्नतों का असर है. 

7-सवाल: किस तरह का सहयोग आप समाज से चाहती हैं?

हम जेल में किताब ले जाना चाहते हैं. किसी रेडियो स्टेशन में हमें तानपुरे की जरूरत है, कहीं तानपूरे की, कहीं तबले की जरूरत है. कई बार दरियागंज की किसी छोटी सी दुकान से हम कुछ सामान पहुंचा देते हैं, पर हमारे हाथ छोटे हैं. हमारा कोई स्पांसर नहीं है. समाज अगर साथ आए, तो बहुतेरी ऐसी चीजें हो सकती हैं, जो जेल के खाली संसार को भरने में मदद कर सकती हैं. किसी कोने में किताबें हैं, कपड़े हैं, वो अगर हम बांट सकें. हम अपने बच्चों को सिखा सकते हैं. हमारे पास बहुत है. देने के समय हम छोटे हो जाते हैं. इस छोटे पन से हमें उभरना है. तिनका-तिनका डॉट ओआरजी पर लोग हमें जानकारी से लेकर सामग्री तक भेज सकते हैं. हमें और भी जानकारी दे सकते हैं. वे हमें लिख सकते हैं, बता सकते हैं. लोग हमें बता दें कि उनके पास क्या है औऱ वे क्या देना चाहते हैं, फिर हम जेल तक वो पहुंचा सकते हैं. 

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