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जहां कंक्रीट से 'संवर' रहा विकास, वो आज बन गया उत्तर प्रदेश

अंत्योदय की अवधारणा जब नीति की भाषा बनती है, जब योजनाओं की स्याही में उतरती है और जब ज़मीन पर साकार होती है तो इतिहास उसे केवल शासन नहीं, एक सभ्यतागत घटना कहता है. उत्तर प्रदेश आज ऐसी ही एक सभ्यतागत घटना का साक्षी है और पं. दीनदयाल उपाध्याय की उस अवधारणा को साकार कर रहा है, जिसमें वह विकास की परिभाषा अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति के जीवन में आए उजाले को मानते थे. ऐसा इसलिए है कि अब नेतृत्व में संकल्प दिखाई देता है, नीति में स्पष्टता है और सुशासन की नींव पर समावेशी विकास की इमारत खड़ी दिखाई देती है. आज उत्तर प्रदेश के विभिन्न हिस्सों में जो एक्सप्रेसवे व कॉरिडोर बन रहे हैं, जो क्लस्टर आकार ले रहे हैं, जो इंडस्ट्रियल पार्क व हब जीवंत हो रहे हैं, वे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की समावेशी विकास नीति का मूर्त रूप हैं. वे उत्तर प्रदेश में दशकों से चली आ रही आर्थिक असमानता को मिटाने के उपकरण हैं. यह प्रदेश में कंक्रीट से संवारे जा रहे समावेशी विकास की जीवंत तस्वीर भी है.

सामाजिक संकल्प की परियोजनाएं

उत्तर प्रदेश कभी अपनी विशालता के बोझ तले दबा था. इतनी बड़ी आबादी, इतना विस्तृत भूगोल, इतनी गहरी विषमताएं और इन सबके बीच एक ऐसी व्यवस्था जो थकी हुई थी, जो अपने ही नागरिकों को रोक नहीं पाती थी, जो पलायन को नियति मान चुकी थी. बुंदेलखंड की फटी धरती, पूर्वांचल की सूनी गलियां और पश्चिम की दबी हुई औद्योगिक क्षमता, यह उत्तर प्रदेश की वह तस्वीर थी जो दशकों से बदलने का नाम नहीं ले रही थी. योगी आदित्यनाथ की सरकार ने जब 2017 में कमान संभाली, तो उत्तर प्रदेश की पहचान बीमारू राज्य के रूप में थी. तब किसी ने शायद सोचा भी न था कि एक दिन यही प्रदेश देश की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दौड़ में सबसे तेज़ धावक होगा, भारत की अर्थव्यवस्था का ग्रोथ इंजन बनेगा.

राज्य में विकसित हुए विभिन्न एक्सप्रेसवे, कॉरिडोर्स, क्लस्टर्स, विशेष पार्क व हब भविष्य की अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत साबित होंगे. आगरा से लखनऊ, कानपुर, झांसी और चित्रकूट को जोड़नेवाला डिफेंस कॉरिडोर केवल एक औद्योगिक परियोजना नहीं है, यह एक सामाजिक संकल्प है. इस परियोजना के अंतर्गत अब तक लगभग दो सौ एमओयू पर हस्ताक्षर किए जा चुके हैं. हस्ताक्षरित एमओयू के सापेक्ष हजारों करोड़ के निवेश तथा पचास हजार से ज्यादा लोगों के प्रत्यक्ष रोजगार का अनुमान है. अप्रत्यक्ष रूप में कितनों को रोजगार मिलेगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है.

लेकिन, इससे बड़ी बात यह है कि बुंदेलखंड जो दशकों से सूखे, पलायन और निराशा की कहानी था, अब एक नई पहचान बना रहा है. झांसी की वह भूमि जहाँ कभी रानी लक्ष्मीबाई ने वीरता की इबारत लिखी थी, आज फिर से एक नई शक्ति का केंद्र बन रही है. जब किसी क्षेत्र का युवा पलायन बंद करता है और जड़ें पकड़ता है, तो यह केवल आर्थिक घटना नहीं है, यह सामाजिक पुनर्जन्म है.

आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा

भारत की आत्मा गांवों में बसती है और योगी सरकार ने इस आत्मा को आर्थिक शक्ति देने का बीड़ा उठाया है. एक जनपद-एक उत्पाद जैसी योजना एक करोड़ से अधिक कारीगरों को प्रत्यक्ष लाभ देती है. जब वाराणसी का कोई बुनकर अपनी साड़ी सीधे ई-कॉमर्स प्लेटफार्म पर बेचने लगता है, तो वह केवल एक व्यापारी नहीं बनता, वह आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा गढ़ता है. पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, बुंदेलखंड एक्सप्रेसवे, गंगा एक्सप्रेसवे क्षमता विस्तार के नए साधन हैं. जब पूर्वांचल एक्सप्रेसवे के किनारे औद्योगिक क्लस्टर बनते हैं, तो आज़मगढ़ और मऊ का युवक सूरत या मुंबई जाने की मजबूरी से मुक्त होता है.

गंगा एक्सप्रेसवे पर जब इंडस्ट्रियल नोड्स विकसित होते हैं, तो मेरठ से प्रयागराज तक का पूरा भूगोल बदल जाता है. ग्रेटर नोएडा में आईआईटीजीएनएल, बरेली में मेगा फूड पार्क, उन्नाव में ट्रांसगंगा सिटी, गोरखपुर में प्लास्टिक पार्क, गोरखपुर में गारमेंट पार्क तथा अनेक फ्लेटेड फैक्ट्री परिसर, यमुना एक्सप्रेसवे क्षेत्र में जेवर इंटरनेशनल एयरपोर्ट के साथ ही फिल्म सिटी, टॉय पार्क, अपैरल पार्क, हैंडीक्राफ्ट पार्क, लॉजिस्टिक हब व ऐसी ही अन्य योजनाएं आर्थिक ताकत की रीढ़ साबित होंगी.

नीति के केंद्र में सामाजिक लोकतंत्र

नोएडा और ग्रेटर नोएडा में इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग क्लस्टर आज देश के सबसे बड़े मोबाइल उत्पादन केंद्रों में से एक है. सैमसंग, ओप्पो, वीवो जैसी विश्वस्तरीय कंपनियों की उपस्थिति ने यहां एक पूरा पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा किया है. लेकिन इस इकोसिस्टम की असली कहानी उन हज़ारों छोटे उद्यमियों की है जो इन बड़ी कंपनियों के लिए कंपोनेंट बना रहे हैं. उन युवा इंजीनियरों की है जो अपने शहर में ही अपनी क्षमता को मूर्त रूप दे रहे हैं. डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था, ‘राजनीतिक लोकतंत्र तब तक टिक नहीं सकता जब तक उसकी नींव में सामाजिक लोकतंत्र न हो.’ योगी सरकार की औद्योगिक नीति इसी सिद्धांत पर आधारित है. ग्रेटर नोएडा में विकसित हो रहा डेटा सेंटर पार्क इसी बात की मिसाल है.

यह पार्क न केवल डिजिटल अर्थव्यवस्था की नींव रखेगा, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं के लिए उच्च- कौशल रोज़गार के नए द्वार खोलेगा. वस्त्र उद्योग पर विशेष ध्यान देना भी इस संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है. प्रदेश में लखनऊ, कानपुर, वाराणसी, मुरादाबाद, बरेली और आगरा में टेक्सटाइल पार्क और हैंडलूम क्लस्टर विकसित हो रहे हैं. भारत के कुल हस्तशिल्प निर्यात में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक है. यह न केवल विदेशी मुद्रा अर्जन का माध्यम है, बल्कि उन लाखों हाथों की गरिमा का प्रश्न भी है जो पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं.

समाधान का मॉडल बनता राज्य

सुशासन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, नैतिक और सामाजिक विजय है. इन्वेस्ट यूपी की स्थापना और ईज़ ऑफ डूइंग बिज़नेस में प्रदेश की बेहतर रैंकिंग ने निवेश के वातावरण को जो नई ऊंचाई दी है, उसका सामाजिक अनुवाद यह है कि भ्रष्टाचार घटा है, पारदर्शिता बढ़ी है, और सरकार पर नागरिकों का विश्वास मज़बूत हुआ है. लॉजिस्टिक्स पार्क और मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब का जाल बिछाते हुए योगी सरकार ने एक ऐसी कनेक्टिविटी दी है जो प्रदेश के हर कोने को एक साथ धड़कने की ताकत देती है. दादरी में विकसित हो रहा मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स हब एशिया के सबसे बड़े लॉजिस्टिक्स केंद्रों में से एक बनने की राह पर है. जब माल तेज़ी से पहुँचता है, जब किसान की उपज समय पर बाज़ार तक जाती है, जब निर्यातक की समयसीमा पूरी होती है तो इस पूरे चक्र में लाभान्वित होने वाला अंतिम व्यक्ति भी वही है, जो इस श्रृंखला की नींव है.

उत्तर प्रदेश में हो रहा यह औद्योगिक और अवसंरचनात्मक परिवर्तन उस समाज की कहानी है जो सदियों की उपेक्षा के बाद अपनी नियति खुद लिख रहा है. जो प्रदेश कभी समस्याओं का प्रतीक था, आज समाधानों का मॉडल बन रहा है. इतिहास जब इस कालखंड को देखेगा, तो वह इसे महज़ आर्थिक उछाल नहीं कहेगा, वह इसे एक सभ्यतागत पुनर्जागरण कहेगा. हालांकि, इस स्वर्णिम तस्वीर के बीच कुछ कठिन सच्चाइयां भी हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं होगा. पर्यावरणीय स्थिरता के सवाल, विशेषकर जल संसाधनों पर बढ़ते दबाव और औद्योगिक प्रदूषण के ख़तरे, भविष्य की नीति-निर्माण के लिए गंभीर विचार मांगते हैं. लेकिन जो समाज अपनी कमज़ोरियों को पहचानकर उनसे लड़ता है, वही स्थायी परिवर्तन की नींव रख सकता है.

[ये लेखक के निजी विचार है]

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