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राज्यपाल, SIR और चुनावी संकट: क्या भारतीय लोकतंत्र को सुधार की जरूरत है?

असम, बंगाल, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी के चुनाव नतीजों ने भारतीय राजनीति को एक बड़ा संदेश दिया है. इन परिणामों ने साफ कर दिया कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता आज भी सबसे बड़ी ताकत है, लेकिन इसके साथ ही चुनावी प्रक्रिया, राज्यपालों की भूमिका और संस्थाओं की निष्पक्षता को लेकर कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं. असम, बंगाल और पुडुचेरी में बीजेपी को बढ़त मिली, केरल में कांग्रेस-यूडीएफ मजबूत रही, जबकि तमिलनाडु में अधूरा जनादेश सामने आया. वहां सरकार गठन का मामला अब राज्यपाल और छोटे राजनीतिक दलों के फैसलों पर टिका दिखाई दे रहा है.

यह सिर्फ चुनावी जीत-हार की कहानी नहीं है. यह लगभग सभी राजनीतिक दलों की कमजोरियों और लोकतांत्रिक संस्थाओं पर बढ़ते अविश्वास की तस्वीर भी पेश करता है. कहीं सत्ता पक्ष पर मनमानी के आरोप लगे, तो कहीं विपक्ष जनता का भरोसा खोता दिखा. हिंसा करने वाले भी सवालों के घेरे में हैं और हिंसा झेलने वाले भी.

सबसे ज्यादा बहस राज्यपालों की भूमिका को लेकर हो रही है. कई राजनीतिक दलों और विशेषज्ञों का आरोप है कि कुछ राज्यपाल निष्पक्ष नहीं दिख रहे और उनके फैसले जनता के जनादेश को प्रभावित कर रहे हैं. तमिलनाडु इसका ताजा उदाहरण बन गया है, जहां TVK नेता विजय के बहुमत के दावे के बावजूद सरकार गठन को लेकर असमंजस बना हुआ है.

न्यायपालिका पर भी सवाल उठे हैं. चुनाव आयोग को स्वायत्त संस्था बताते हुए अदालतें कई बार हस्तक्षेप से बचती हैं, लेकिन दूसरी स्वायत्त संस्थाओं के मामलों में सक्रिय भूमिका निभाती हैं. ऐसे में लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं कि वोटर लिस्ट से नाम हटने, चुनावी गड़बड़ियों और विवादित “स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन” यानी SIR प्रक्रिया पर अदालतें अधिक सख्त क्यों नहीं दिखीं.

SIR प्रक्रिया सबसे बड़ा विवाद बनकर उभरी है. भारत में दशकों से मतदाता सूची का नियमित संशोधन होता आया है, लेकिन इस बार लाखों नाम हटाए जाने को लेकर गंभीर सवाल उठे. सिर्फ बंगाल में करीब 91 लाख नाम हटने की बात सामने आई, जिनमें से लगभग 27 लाख नाम “लॉजिकल डिस्क्रेपेंसी” यानी रिकॉर्ड या स्पेलिंग की गलतियों के कारण हटे बताए गए. आलोचकों का कहना है कि इससे चुनावी परिणाम प्रभावित हुए.

विश्लेषण बताते हैं कि जिन सीटों पर ज्यादा नाम हटाए गए, वहां तृणमूल कांग्रेस को अधिक नुकसान हुआ और बीजेपी को फायदा मिला. कई सीटों पर जीत और हार का अंतर तीसरे उम्मीदवार को मिले वोटों से भी कम रहा. इस मुद्दे पर अदालतों में भी चर्चा हुई.

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका पर भी चर्चा तेज रही. संघ ने बंगाल, असम और दक्षिण भारत के कई राज्यों में बड़े पैमाने पर जनसंपर्क अभियान चलाए. कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि वोटर लिस्ट और SIR प्रक्रिया में भी उसकी अप्रत्यक्ष भूमिका रही. हालांकि इसे राष्ट्रहित का कार्य बताया गया, लेकिन सवाल यह है कि क्या इतने बड़े बदलाव से पहले व्यापक चर्चा और पारदर्शिता जरूरी नहीं थी?

दूसरी ओर ममता बनर्जी की राजनीति पर भी सवाल उठे. आलोचकों का कहना है कि अगर उन्होंने अपने करीबी नेताओं और सत्ता के केंद्रीकरण पर नियंत्रण रखा होता, तो जनता में नाराजगी इतनी ज्यादा नहीं बढ़ती. हालांकि कई राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि SIR विवाद के बिना भी तृणमूल कांग्रेस को नुकसान हो सकता था.

तमिलनाडु में स्थिति और भी दिलचस्प बन गई है. TVK नेता विजय की लोकप्रियता ने सभी राजनीतिक समीकरण बदल दिए. लेकिन राज्यपाल द्वारा 118 विधायकों के समर्थन की सूची मांगने को लेकर विवाद गहरा गया. आलोचकों का कहना है कि एस.आर. बोम्मई फैसले के अनुसार बहुमत साबित करना विधानसभा का विषय है, न कि राज्यपाल का. ऐसे फैसले “हॉर्स ट्रेडिंग” यानी विधायकों की खरीद-फरोख्त को बढ़ावा दे सकते हैं.

भारत की राजनीति आज एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है. जनता अब सिर्फ वादों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि संस्थाओं की निष्पक्षता और लोकतंत्र की पारदर्शिता भी चाहती है. राज्यपालों को अधिक संवेदनशील और निष्पक्ष भूमिका निभानी होगी. साथ ही प्रभावशाली सामाजिक संगठनों को भी लोकतंत्र मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक योगदान देना होगा.

1959 में केरल की पहली कम्युनिस्ट सरकार को अनुच्छेद 356 लगाकर बर्खास्त किए जाने से लेकर आज तक भारत ने लंबा सफर तय किया है. एस.आर. बोम्मई फैसले ने राष्ट्रपति शासन के दुरुपयोग पर रोक लगाने की कोशिश की. अब उम्मीद यही है कि भविष्य में लोकतंत्र और मजबूत होगा, जनता का विश्वास कायम रहेगा और भारत अधिक पारदर्शी, निष्पक्ष और जनहितकारी राजनीति की ओर आगे बढ़ेगा.

[ये लेखक के निजी विचार है]

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