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यूपी चुनाव: क्या मायावती अकेले पड़ गई हैं या जानबूझकर सक्रिय नहीं होना चाहतीं ?

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश पर चार बार राज करने वाली बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती क्या इस बार अकेली पड़ गई हैं और क्या चुनाव से पहले ही उनके हौसलें पस्त होते दिखने लगे हैं? सियासी गलियारों में ये सवाल इसलिये उठ रहे हैं कि मायावती को जिन छोटे दलों के साथ चुनावी गठबंधन की उम्मीद थी, वो सिरे नहीं चढ़ पाई.लिहाजा वे एक नए गठबंधन के साथ चुनावी-मैदान में कूदकर बसपा के वोट बैंक में सेंध लगाने की पुरजोर ताकत लगाएंगे और यही मायावती के लिए सबसे बड़ी चिंता का विषय है.

उल्लेखनीय है कि सांसद असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और बसपा ने बिहार विधानसभा का चुनाव मिलकर लड़ा था. लिहाजा, ऐसे कयास थे कि उत्तर प्रदेश में भी वे मिलकर ही लड़ेंगे लेकिन बात नहीं बनी. ओवैसी ने साफ कर दिया है कि उनकी पार्टी ने ओम प्रकाश राजभर के नेतृत्व वाली सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के साथ गठबंधन करने का फैसला किया है और इस गठबंधन का नाम, 'भागेदारी संकल्प मोर्चा' रखा गया है.

दलितों में अपनी मजबूत पैठ बनाती जा रही चंद्रशेखर आजाद की भीम पार्टी के भी इस गठबंधन में शामिल होने की संभावना है.इसलिए राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि बीजेपी, सपा या कांग्रेस को भले ही इससे कोई फर्क न पड़े लेकिन ये नया गठबंधन बीएसपी को खासा नुकसान पहुंचा सकता है. आगामी विधानसभा चुनावों में एआईएमआईएम ने सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है.

साल 2017 में हुए विधानसभा चुनावों के बाद से ही यह धारणा भी मजबूत होती जा रही है कि क्या दलितों के गढ़ में ही बीएसपी कमजोर पड़ती जा रही है. इसकी वजह ये है कि बीएसपी की सबसे मजबूत समर्थक मानी जाने वाली जाटव बिरादरी भी अब उससे दूरी बनाने लगी है. इसके लिए सिर्फ आगरा के जातीय समीकरण से ही बसपा की दुर्दशा का अंदाजा लगाया जा सकता है.

आगरा को देश की दलित राजधानी भी कहते हैं क्योंकि यहाँ उत्तर प्रदेश में दलितों की जनसंख्या में जाटव यानी चमड़ा व्यवसाय से जुड़े लोगों का बाहुल्य है. छह लाख से ज़्यादा जाटव वोटर आगरा लोकसभा की सात विधानसभा सीटों में हार जीत का फ़ैसला करने का माद्दा रखते हैं. 2007 में जब मायावती की पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी, तो आगरा की सातों सीटें बसपा ने जीती थीं. लेकिन 2007 से लेकर 2017 के राजनीतिक सफ़र में बसपा आगरा की इन सात सीटों पर सात से शून्य पर आ गयी. 2007 में 206 विधान सभा सीटों की ऊंचाई नापने वाली बसपा इन दस सालों में महज 19 सीटों पर सिमट गई. लिहाजा,बसपा के इस मजबूत गढ़ में इस बार भी पार्टी का जनाधार खिसकता दिख रहा है.

मायावती जब 2007 से 2012 तक मुख्यमंत्री रहीं, तब विपक्षी दल उन पर सबसे बड़ा आरोप यही लगाते थे कि वो दलित की बेटी से दौलत की बेटी में तब्दील हो गई हैं. इन आरोपों के बीच तब मायावती की पार्टी को मैनेज करने वाले तमाम लोग थे. लेकिन असली मुश्किल आई 2017 के विधानसभा चुनाव में ख़राब नतीजों के बाद, जब पार्टी का क़द कम हुआ तो बसपा बिखरने लगी.

कई सारे नेता, जैसे- स्वामी प्रसाद मौर्य (पूर्व कैबिनेट मंत्री और मौर्य समाज के बड़े नेता), बृजेश पाठक और नसीमुद्दीन सिद्दीकी, या तो पार्टी से निकाल दिए गए या फिर पार्टी छोड़ कर चले गए. इनमें से कुछ लोग पार्टी के बहुजन मूवमेंट से जुड़े हुए थे और उन्होंने पार्टी को 206 विधान सभा सीटों तक पहुँचाने में काफ़ी मेहनत की थी. नसीमुद्दीन अब काँग्रेसी नेता हैं, तो स्वामी प्रसाद मौर्य योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं और बृजेश पाठक भी उत्तर प्रदेश के क़ानून मंत्री हैं.

मायावाती से बगावत करने वालों ने अब आजाद की भीम आर्मी का दामन थामना शुरू कर दिया है और एक तरह से वह दलितों की असल हमदर्द पार्टी के रुप में उभर रही है.ज़ाहिर है धीरे धीरे ही सही चंद्रशेखर आज़ाद की सक्रियता उन्हें राजनीति में अपने पैर जमाने में मदद कर रही है जबकि दूसरी ओर मायावती की निष्क्रियता के चलते पार्टी के अंदर वह सब भी हो रहा है जिसकी कल्पना पहले शायद ही किसी ने की हो, पार्टी के अंदर बग़ावती सुर उभरने लगे हैं.इसके चलते ही  छह विधायकों को पार्टी विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के चलते मायावती ने पार्टी से निलंबित किया हुआ है.

मायावती की एक और बड़ी मुश्किल ये भी है कि अब मुसलमान भी उन पर भरोसा जताने को तैयार नहीं दिखते.आगरा की एक नाट्य अकादमी से जुड़े विसजाल रियाज़ कहते हैं कि "मुसलमान समुदाय का बसपा से भरोसा कम हुआ है. ये सच है कि मुसलमान बहन जी से जो उम्मीद रखता था, वो चीज़ बहनजी से मुसलमानों को नहीं मिली. बहनजी के कुछ वक्तव्य ऐसे रहे हैं जिससे मुस्लिम समाज में शंका पैदा हुई कि क्या वे भाजपा की हिमायती हैं. ऐसा बिल्कुल महसूस किया है पब्लिक ने. जब कोई बात ऐसी आती है, जैसे अनुच्छेद-370 हो, या सीएए की हम बात करते हैं, उस पर उन्होंने खुल कर बात नहीं की, दबी ज़ुबान से ही बात की."

हालांकि सियासी हलकों मे ये चर्चा भी आम है कि  मायावती खुद पर व अपने भाई पर केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा दर्ज मामलों का दबाव है जिससे वे डरी हुई हैं.और शायद इसीलिये वे राजनीतिक तौर पर निष्क्रिय बने रहने में ही अपनी भलाई समझती हैं. 

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