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Raj Ki Baat: शह-मात की जंग में फंसे अजय मिश्रा टेनी

विधानसभा चुनाव को लेकर उत्तर प्रदेश की सियासत हाईवोल्टेज है. सत्ताधारी दल बीजेपी पूरे लाव-लश्कर के साथ फिर से इतिहास रचने के लिए निकल चुकी है. डबल इंजन की सरकार का नारा और पीएम मोदी और सीएम योगी के चेहरों के साथ पार्टी के चाणक्य कहे जा रहे अमित शाह की रणनीति के भरोसे बिसातें बिछाई जा रही हैं. मगर सत्ता की लड़ाई के बीच प्रतिद्वंदियों के साथ-साथ अपने खेमों में भी ऐसे घातक सियासी शह-मात के खेल चलते हैं कि जो दुश्मनों से ज्यादा चोट पहुंचाते हैं. सबसे बड़ी बात, इसमें जिसको निशाना बनाया जा रहा होता है, दरअसल वो कई बार मोहरा होता है और असली शिकार कोई और. सियासत के इस पेचीदा रूप पर राज की बात में आगे बढ़ें. उससे पहले चलते हैं लखीमपुर खीरी.

याद करिये 4 अक्टूबर को जो कुछ भयावाह हुआ था लखीमपुर खीरी में. वो लखीमपुर खीरी जहां के सांसद अजय मिश्र टेनी फिलहाल गृह राज्य मंत्री हैं. टेनी के बेटे की थार वहां किसान आंदोलनकारियों को कुचलते हुए चली गई. आंदोलनकारियों ने पीट-पीटकर बीजेपी के कार्यकर्ताओं को मार डाला. इस रौंदने और पीटने में आठ जानें चली गईं. यूपी की इस घटना ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया. कैमरे के सामने लोगों को कुचलती जीप अजय मिश्रा टेनी के बेटे मोनू मिश्रा की थी. इस घटनाक्रम के बाद सियासत भी भरपूर हुई. कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी लखीमपुर खीरी पहुंची तो सपा अध्यक्ष अखिलेश ने भी जाने का प्रयास किया, लेकिन उन्हें नजरबंद कर दिया गया.

जैसे-तैसे तनाव खत्म हुआ. एफआईआर हुई, जिसमें टेनी के बेटे मोनू मिश्रा भी गैरइरादतन हत्या के मामले में आरोपी बने. सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सरकार ने पूरे मामले की जांच के लिए एसआईटी गठित कर दी. इस बीच किसान कानून पीएम नरेंद्र मोदी ने वापस ले लिए. किसान भी उठ गए. मगर तभी यूपी सरकार की गठित एसआईटी रिपोर्ट आई. इसमें मोनू मिश्रा और अन्य अभियुक्तों के खिलाफ एफआईआर में धाराएं बदल कर संगीन हो गईं. एसआईटी ने जांच में पाया कि अनायास नहीं, बल्कि साजिशन किसानों को कुचला गया.

बस फिर क्या था...फिर से सियासत गरम हो गई. संसद भी सर्दियों में सरगर्म हो गई. टेनी के इस्तीफे की मांग बुलंद हुई. इसी बीच गृह राज्य मंत्री का दबंगई वाला एक और चेहरा सामने आ गया. वह एबीपी के रिपोर्टर को धमकाते हुए दिख गए. मामला और तूल पकड़ गया. इस्तीफे की मांग और बुलंद. राजनीति में दबंगई के इस चेहरे की लानत-मलानत सबने की. मगर तमाम शोर-शराबे के बावजूद टेनी को मंत्री पद पर केंद्र सरकार ने बनाए रखा है. ये सब सामने होते दिख रहा है, लेकिन राज की बात वास्तव में बीजेपी की यूपी में सियासी वर्चस्व की दिग्गजों की लड़ाई है. जो तमाम परदेदारी के बाद भी दिख रही है.

पहली तो राज की बात ये कि अजय मिश्रा टेनी को जब रिपोर्टर से बदसुलूकी के लिए आलाकमान ने फटकारा तो उन्होंने इस्तीफे तक की पेशकश कर दी. माफी मांगते हुए. टेनी ने शीर्ष नेतृत्व से कह दिया कि उनके मंत्री होने की वजह से उनके बेटे को निशाना बनाया जा रहा है. ध्यान रहे कि एसआईटी यूपी सरकार ने बनाई है. 120 बी यानी साजिश के साथ-साथ 304 को बदल कर धारा 302 के तहत टेनी के बेटे पर प्राथमिकी दर्ज की जा चुकी है. यहां जानना जरूरी है कि साजिश वाली धारा 120 बी आने के बाद तो गृह राज्य मंत्री तक भी आंच या सकती है. साजिशन हत्या के मामले में उम्रकैद से लेकर फांसी तक की सजा का प्रावधान है.

ये किसी से छिपा नहीं है कि टेनी की करीबी यूपी के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य से है. खास बात है कि जिस दिन 4 अक्टूबर को ये घटना हुई थी उस दिन मौर्या की ही वहां सभा थी. जिसके बाद ये दर्दनाक हादसा हुआ था. ये भी बताने की जरूरत नहीं है कि केशव मौर्या निश्चित तौर पर अकेले नेता हैं यूपी में जो खुलकर पीएम मोदी और अमित शाह के नेतृत्व की ही बात करते हैं. उनसे जब पूछा गया था कि चुनाव योगी जी के नेतृत्व में लड़ा जाएगा तो उन्होंने कहा था कि कमल के नेतृत्व में चुनाव होगा. 2017 में मौर्य ही बीजेपी यूपी के अध्यक्ष थे.

राज की बात ये है कि इन सब समीकरणों के साथ मोदी सरकार अब पीछे हटते हुए खुद को कमजोर नहीं दिखना चाहती. यही कारण है कि जब टेनी ने माफी मांगते हुए इस्तीफे की पेशकश की तो उनसे कह दिया गया कि आप लो प्रोफाइल रहिए. बीजेपी नेतृत्व और सरकार ऐसे सोच रहा है कि टेनी के इस्तीफे का मतलब इस घटना में उनकी संलिप्तता मानी जाएगी. अभी एसआईटी की रिपोर्ट में भी बेटे का नाम है...ऐसे में पिता को सजा देने वाली बात कहकर पार्टी इसका बचाव कर रही है.

राज की बात ये है कि टेनी के शुभचिंतक बड़े नेताओं ने एसआईटी की रिपोर्ट पर सवाल भी उठाए. उनका कहना था कि जिस तरह से घटना थी उसमें दोनों तरफ से लोगों की जान गई. ऐसे में टेनी पर हमला वास्तव में पार्टी के अंदर किसी और समीकरण या सियासी पेंच की तरफ इशारा कर रहा है. बहरहाल, अभी केंद्रीय नेतृत्व ने टेनी से कह दिया है कि सार्वजनिक कार्यक्रमों में जाने से बचें. साथ ही आपा न खोने की सलाह भी टेनी को दी गई है. दरअसल, केंद्रीय नेतृत्व को किसान कानून वापस लेने के बाद टेनी को हटाने से सरकार के झुकने की छवि जाने का भी खतरा लग रहा है. साथ ही प्रदेश के सामाजिक और सियासी समीकरणों के नुकसान भी आशंका है इसलिए अभी टेनी का इस्तीफा तुरंत लिए जाने से बचा जा रहा है. 

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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