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कागज और कलम को बनाई अपनी ताकत, रिहा होने वाली महिलाओं को फिर से जीने की दी हिम्मत

इस वक्त मैं तिहाड़ जेल में हूं मेरे सामने है आरती, 35 साल की आरती. उसके हाथ में एक किताब, किताब का नाम तिनका-तिनका तिहाड़. किताब के पन्नों को पलटते हुए वो लगातर रो रही है. उसकी सिसकियों के बीच अतीत की यादें अटकी है, वही यादें जो उसके बचपन की है. हरियाणा की एक छोटे से शहर में जन्मी और पढ़ाई करने वाली आरती शुरू से ही चुलबुली थी. रोहतक यूनिवर्सिटी से उसने पढ़ाई की और उसके बाद शादी हो गई शादी के बाद दिल्ली आ गई. एक बेटी हुई और एक बेटा. 2011 में उसने बेटे को खो दिया. बेटा बीमार था समय पर इलाज ना हो सका. अपनी बेटी को गोद में लिए उसने सपना देखा कि काश उसकी एक और एक और औलाद होती.

एक दिन में बदल गयी जिंदगी

उस दिन शाम में वह डॉक्टर के पास गई और उसे दिन शाम उसकी जिंदगी पलट गई. कैसे पलटी जिंदगी, उस दिन एक हत्या हुई. उस हत्या के आरोप में आरती आ गई तिहाड़ जेल में. दक्षिण एशिया की सबसे बड़ी जेल. जेल नंबर 6. उस समय जेल की क्षमता 400 बंदियों की थी. समय गुजरता गया, 2013 में आरती की मुझसे मुलाकात हुई. बहुत सी महिलाएं वहां पर थी उनमें से आरती भी एक कोने में सिमटी हुई थी. मैंने पूछा आपका नाम क्या है उसने कहा आरती. क्या करती हो कुछ खास नहीं तो मैंने कहा कुछ खास करो न. उसने कहा क्या, मैंने कहा लिखो और बस लिखते-लिखते कहानी ऐसे आगे बढ़ी कि 12 साल गुजर गए.

कैसे गुजरे वो बारह साल. हुआ यूं की वो तिनका-तिनका तिहाड़ के लिए कविताएं लिखने लगी. जिन चार महिलाओं का चयन इस किताब के लिए हुआ उनमें से एक थी आरती. फिर आरती की पहचान तिनका तिनका के रुप में हो गई. जेल में जब उसे आवाज दी जाती तो कहा जाता कि तिनका-तिनका वाली आरती को बुला दो. आरती की पहचान लिखने वाली आरती के रुप में हो गई. बंदिनी की पहचान हटती गई. लिखने वाली आरती निखरती गई. शुरू के कुछ साल मां-बाप मुलाकात के लिए आते रहे. कभी-कभी बेटी भी आई. बेटी छोटी थी. उसके दिमाग में बहुत से सवाल थे. धीरे-धीरे बेटी बड़ी होती गई चीजों को समझती गई 12 साल बाद बेटी बड़ी हुई जिम्मेदारियां बड़ी हुई और आरती कुछ और सिकुड़ गई. 

लिखने से बदली जिंदगी

26 सितंबर 2023 को फिर एक नई बात. उस दिन तिनका-तिनका तिहाड़ के दूसरे संस्करण का जेल में  विमोचन हुआ, बहुत बड़ा विमोचन. जेल के महानिदेशक संजय बेनीवाल आईपीएस ने इस किताब को अनुमोदित किया और उसके साथ ही कृष्ण शर्मा इस जेल की सुपरिटेंडेंट भी थीं. उस दिन कई कार्यक्रम हुए, लेकिन कार्यक्रम के केंद्र में थी आरती. आरती ने उस दिन एक नाटक रचा और उस नाटक में वो खुद बनी सुपरिटेंडेंट. उसके सामने एक महिला आई जिसने आरती की एक्टिंग की और बाकी बहुत सी महिलाएं जो ठीक उसी अंदाज में खड़ी हुई मेरे सामने, जैसे 2013 में मेरे सामने कुछ महिलाएं थी 

इनमें से एक महिला वर्तिका भी बनी. आरती का कॉन्फिडेंस उस दिन देखने लायक था. हिम्मत से लबरेज आरती बार-बार प्रार्थना करती कि वह जल्दी छूट जाए और वो और ज्यादा लिखे. जेल के 12 साल के प्रवास ने उसे कागज और कलम से जोड़ा. उसे सपनों से और लिखने से जोड़ा. आरती ने मुझे कहा वह चाहती है उसकी पहचान और उसके नाम के साथ ही मैं उसकी बात कहूं. आज बता रही हूं आरती की कहानी. आरती अब जेल से रिहा हो चुकी है. अभी लिखती है आरती और जाते-जाते आरती जेल में बहुत सी और महिलाओं को हिम्मत दे गई कि वह भी लिखती जाएं. लिखते-लिखते जाने कौन सी लौ मन में जग जाए, जाने कब जीने की हिम्मत फिर से आ जाए.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.] 

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