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यूपी चुनाव पर BJP ने पीएम मोदी को भेजी रिपोर्ट, बताया क्यों कम हुईं सीटें ?

देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में बीजेपी दोबारा सत्ता में तो काबिज़ हो गई लेकिन उसकी सीटें पहले के मुकाबले कम हो गईं. दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए पार्टी की सीटें कम होना, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए चिंता का विषय बन गया, लिहाजा उन्होंने बीजेपी की यूपी इकाई से पूछा था कि आखिर ऐसा क्यों हुआ और इसके पीछे क्या-क्या खास वजह रही, ये उन्हें विस्तार से बताया जाए.

यूपी बीजेपी ने पीएम मोदी को 80 पेज की रिपोर्ट की जो रिपोर्ट भेजी है,उसमें कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं. पहला और मूल कारण तो ये रहा कि बीजेपी की इस जीत में मायावती की बीएसपी की भी बड़ी भूमिका रही है क्योंकि बीएसपी का बड़ा वोट बैंक बीजेपी की तरफ शिफ्ट हो गया. दूसरी वजह पार्टी को मिला फ्लोटिंग वोट रहा. ऐसा वोटर जो कभी किसी एक पार्टी या विचारधारा के साथ नहीं बंधा रहता. माहौल देखकर अपना वोट तय करता है.

लेकिन इस रिपोर्ट में बीजेपी की सीटें कम होने को लेकर चौंकाने वाला खुलासा भी किया गया है. कहा गया है कि बीजेपी को अपने दोनों ही सहयोगी दलों-अपना दल और निषाद पार्टी का वोट इस बार नहीं मिला, जबकि बीजेपी का सारा वोट जाति आधारित इन पार्टियों को शिफ्ट हुआ. यही कारण है कि साल 2017 के मुकाबले इस दोनों दलों की सीटों में तो इज़ाफ़ा हुआ लेकिन बीजेपी की सीटें घटकर रह गईं. ग़ौरतलब है कि अपना दल का कुर्मी जबकि निषाद पार्टी का निषाद जाति में खासा जनाधार है. रिपोर्ट के मुताबिक सिराथू सीट से उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य के हारने की बड़ी वजह इन जातियों का समर्थन न मिल पाना ही रहा.

साल 2017 के चुनाव में बीजेपी को मिली ऐतिहासिक जीत में ओबीसी जातियों की बेहद अहम भूमिका रही थी. लेकिन मोदी को भेजी गई इस रिपोर्ट में साफतौर पर बताया गया है कि ओबीसी जातियों मसलन, कुशवाह,सैनी, कुर्मी, निषाद, पाल,शाक्य,राजभर के वोटरों ने मोटे तौर इस बार बीजेपी का साथ नहीं दिया, बल्कि वे सपा गठबंधन की तरफ शिफ्ट हो गया. इस बार जिस तरह से सपा के पक्ष में मुस्लिम वोटों का ध्रुवीकरण हुआ, उसे भी कुछ सीटों पर पार्टी के हारने की एक बड़ी वजह बताया गया है.

दरअसल, गाज़ीपुर,अंबेडकर नगर और आजमगढ़ जिलों में इस बार बीजेपी गठबंधन का सबसे ख़राब प्रदर्शन रहा.इन तीन जिलों की 22 सीटों में से उसे एक भी सीट पर कामयाबी नहीं मिली, जबकि 2017 में उसने यहां की 8 सीटें जीती थीं. वहीं सपा ने यहाँ क्लीन स्वीप किया. सिर्फ गाजीपुर की दो सीटें उसकी सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के खाते में गई, बाकी सब पर सपा का कब्ज़ा रहा. सूत्रों की मानें,तो बीजेपी नेतृत्व के चिंतित होने की बड़ी वजह ये भी है कि विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी ने दो महीने लंबा सदस्यता अभियान चलाया था और दावा किया गया कि पार्टी ने यूपी में 80 लाख नये सदस्य बनाये हैं. इतनी बड़ी कवायद के बावजूद अगर 2017 के मुकाबले पार्टी की सीटें घटकर रह गईं, तो इससे पार्टी नेतृत्व का फ़िक्रमंद होना स्वाभाविक भी है.

बीजेपी ने ये भी पता लगाने की कोशिश की है कि केंद्र सरकार की विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं का लाभ लेने वाले लोगों ने किस हद तक उसका साथ दिया है. पार्टी के एक नेता के मुताबिक " अगर सच कहा जाए तो इन योजनाओं का फायदा उठाने वाले लोगों ने एनडीए सरकार की योजनाओं की तारीफ की तो की है लेकिन इनमें से अधिकांश ने बीजेपी का साथ नहीं दिया." इस रिपोर्ट में एक और दिलचस्प खुलासा भी किया गया है और उसकी वजह भी बताई गई है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ.

दरअसल, यूपी की कुल 403 में से 311 सीटें ऐसी थीं जहाँ पोस्टल वोट बीजेपी के मुकाबले सपा को ज्यादा मिला. तकरीबन 4.42 लाख पोस्टल वोट में से 2.25 लाख सपा गठबंधन को जबकि 1.48 लाख वोट बीजेपी व उसके सहयोगी दलों को मिले थे. इसकी वजह ये बताई गई है कि अखिलेश यादव ने पुरानी पेंशन योजना को फिर से लागू करने का जो चुनावी वादा किया था,वो काफी हद तक क्लिक कर गया. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक " चुनाव के पहले दो-तीन चरणों में ये देखने में आया कि कई जिलों में तैनात अफसर भी इस मुद्दे पर सपा का समर्थन करते हुए नजर आए."

पीएम मोदी को सौंपी गई इस रिपोर्ट की कॉपी पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा को भी भेजी गई है.अब देखना ये है कि अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर बीजेपी इस रिपोर्ट के जरिये खुद की कमियों को दुरुस्त करते हुए अपनी रणनीति में कहां तक बदलाव कर पाती है?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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