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पुंछ का आतंकी हमला और टेरर आउटफिट के नाम में 'एंटी फासिस्ट' शब्द का इस्तेमाल, राजनीतिक-कूटनियक संदेश को समझे भारत

जम्मू-कश्मीर में काउंटर टेररिस्ट ऑपरेशन के लिए तैनात की गई राष्ट्रीय राइफल्स यूनिट के जवानों पर आतंकी हमला हुआ. भीमबेर गली और पुंछ के बीच हाइवे पर आतंकियों ने गोलीबारी कर ग्रेनेड से हमला कर दिया. इस हमले में पांच जवानों ने बलिदान दिया. कश्मीर में अगले माह जी-20 की बैठक होनेवाली है और उसके मद्देनजर इस हमले ने अधिकारियों की पेशानी पर बल ला दिया है. 

हमले की टाइमिंग देखने लायक 

बहुत दिनों पर आतंकी हमला हुआ है, लेकिन इसकी टाइमिंग ही देखने लायक है. समय काफी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि कश्मीर में जी-20 की बैठक होने जा रही है. पाकिस्तान ने कश्मीर को कभी भी रिकगनाइज नहीं किया. जी-20 बैठक कश्मीर में होने का सीधा सा मतलब है कि भारत कई तरह से अपने दावे को लेजििमेसी दे रहा है. दावा चाहे अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में हालात बिल्कुल सामान्य होने का हो, कश्मीर को दुनिया के सामने कॉन्फ्लिक्ट फ्री जोन बताने का हो या फिर दावा पाकिस्तान के दावे को पूरी तरह फर्जी बताने का हो. दूसरी तरफ, पाकिस्तान कभी ये नहीं चाहता कि कश्मीर में हालात नॉर्मल हों, न ही उसने कश्मीर को कभी भारत का अभिन्न हिस्सा माना है. पाकिस्तान की कश्मीर नीति को उन तमाम कदमों और दावों से धक्का पहुंचता है, जहां और जिनसे कश्मीर में हालात सामान्य हों. पाकिस्तान चाहता है कि कश्मीर में इस तरह के बड़े कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से नहीं हों और वह प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से इस प्रॉसेस को डिरेल करना ही चाहेगा. काफी समय बाद का ये आतंकी हमला उसी संदर्भ में है और हमें भी इसे उसी तरह देखना चाहिए. 

भारत-पाकिस्तान में कश्मीर सहित अन्य मुद्दों पर जो बातचीत होती है, उसका अगर इतिहास देखें तो कश्मीर के मसले पर दोनों ही देश अपने राष्ट्रीय हितों को लेकर तटस्थ हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर की बातचीत कई स्तरों की होती है. तो, दूसरी बातें चलती रहती हैं और यही डिप्लोमैसी का हासिल भी है. युद्ध से हमेशा न तो वांछित परिणाम मिलते हैं, न ही हमेशा हरेक हाल में जीत ही मिलती है. समय-समय पर भारत और पाकिस्तान दोनों ने ही कूटनीति के जरिए अपनी बात कहने का रास्ता खुला रखा है. 

370 हटने के बाद भारत के पाले में चीजें

जब से अनुच्छेद 370 हटा है, तब से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, द्विपक्षीय या बहुपक्षीय संबंधों में कश्मीर में जो 'लेजिटिमाइजेशन' का दांव भारत ने खेला है, वह उसके ही पक्ष में पड़ रहा है. पाकिस्तान को भारत इसलिए भी इंगेज करना चाहता है, ताकि उसके रुख का पता चले. दूसरी तरफ, पाकिस्तान के संलग्न होने का मतलब ही है कि वह इतिहास के बैगेज के साथ आएगा, वह कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग नहीं मानता, वह अपने हितों को प्राथमिकता देंगे. एक मुद्दा यह भी है कि कश्मीर में शांति का एक मतलब ये भी है कि वहां के लोग खुश हैं और भारत के साथ बेहद अच्छे से रह रहे हैं. पाकिस्तान यह कभी नहीं चाहता है. वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि कश्मीर में अभी भी समस्याएं हैं और भारत सरकार वहां लोकशाही के जरिए नहीं, बल्कि अनडेमोक्रेटिक मीन्स से शासन कर रहा है. पाकिस्तान किसी भी सूरत में कश्मीर को लेकर अस्थिरता ही चाहता है. इसीलिए, ऐसे हमले उसके प्रत्यक्ष या परोक्ष समर्थन से होते रहते हैं. वह दुनिया को जताना चाहता है कि सब कुछ ठीक ही नहीं है. 

इस बार जिस संगठन ने जिम्मेदारी ली है, आप उसका नाम देखिए- PAFF यानी पीपल्स एंटी फासिस्ट फ्रंट. अब समझिए कि इस नाम का मकसद क्या है? अब तक हमने देखा है कि इस तरह के हमलों की जिम्मेदारी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुख्यात संगठन लेते थे. या फिर, जिहादी आतंकवादी संगठन जैसे जैश-ए-मोहम्मद या हरकत-उल-अंसार आदि का नाम उभरता था. इस बार आखिर माजरा क्या है? इसके पीछे उनका उद्देश्य है कि जो भाजपा सरकार केंद्र में है, वह फासिस्ट सरकार चल रही है, डेमोक्रेटिक नहीं है, हिंदू सुप्रीमैसी को बढ़ावा दे रही है, वगैरह-वगैहर जैसे संदेश अंतरराष्ट्रीय समुदाय को वे देना चाहते हैं. भारत में अभी जो केंद्र की सरकार है, वह माइनॉरिटी विरोधी है, फासीवादी है और यह हमला उसके विरोध में है- यही संदेश देना िस हमले का मकसद लगता है. 

वैसे, तो पाकिस्तान हमेशा ही कश्मीर में होनेवाले किसी भी कन्फ्लिक्ट के पीछे प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर रहता है. इस हमले में भी भले ही नाम बदल दिया गया हो, लेकिन टेरर समूह वही हैं, जो वर्षों से इस तरह का काम करते आए हैं, इसमें शायद ही हमें किसी तरह की शंका करनी चाहिए. आउटफिट के नाम बदले गए हैं, क्योंकि समय बदला है, कान्टेक्स्क्ट बदला है, बाकी ये टेरर ग्रुप वही हैं, जो पहले से थे. 

भारत देगा संतुलित और कड़ी प्रतिक्रिया

जी-20 की जो मीटिंग होनी है, उसी तरह होगी. ये बहुत बड़े स्तर के कार्यक्रम होते हैं और महीनों पहले से इनकी तैयारियां चलती हैं.  तो, अंतिम समय में इसको टाला नहीं जाएगा. इसके अलावा पाकिस्तान बहुत छोटा हिस्सा है, इस पूरी प्रक्रिया का. जी-20 में और भी बहुत कुछ बड़ा स्टेक पर लगा होता है. पाकिस्तान कितना भी छटपटा ले, वह इस बैठक को डिले नहीं करवा सकता. जहां तक भारत और पाकिस्तान की बात है, तो यह समझा जाना चाहिए कि भारत-पाक के बीच ये कोई नई बात नहीं है. हां, अब चूंकि केंद्र में एक मजबूत राष्ट्रवादी सरकार है तो बातचीत का सीधा रास्ता बंद कर दिया गया है. कूटनीतिक रास्ते तो चलते ही रहते हैं और भारत-पाक दोनों के ही हित में ये है कि शांति की प्रक्रिया चलती रहे. 

दोनों ही देश जब भी इंगेजमेंट बढ़ाते हैं, तो आतंकी समूह इस तरह के हमले को अंजाम देते हैं. आपको याद होगा कि जब पूर्व प्रधानमंत्री वाजपेयी और पाकिस्तानी राष्ट्राध्यक्ष मुशर्रफ के बीच वार्ता हो रही थी, तब भी हमले हुए थे. यह होता ही है. जरूरत बस इस बात की है कि भारत अपने रुख पर दृढ़ रहे लेकिन शांति की प्रक्रिया को बाधित न होने दे. भारत को सांस्कृतिक और कूटनीतिक तौर पर पाकिस्तान के साथ, जी-20 के तमाम देशों के साथ स्थापित करना पड़ेगा. पाकिस्तान को भी एलिनेट करने की जरूरत है. यह कोई एकाध साल की नहीं, कई वर्षों की प्रक्रिया है. भारत को लगातार दूसरे देशों के साथ खुद को एंगेज करना होगा और पाकिस्तान के दुष्प्रचार का जवाब देना होगा. पाकिस्तान में भी जब सिविल सोसायटी मजबूत होगी, वहां की जनता को भी जब समझ आएगा कि शांति ही उनके हक में है, तो हालात बदलेंगे. 

फिलहाल, भारत वेट एंड वॉच की नीति अपनाएगा. वह कुछ ऐसा तीखा कदम नहीं उठाएगा कि दोनों ही देशों के संबंध बिल्कुल ही बिगड़ जाएं. 

[ये आर्टिकल निजी विचारों पर आधारित है.]

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