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ब्लॉग: सोनिया गांधी के गोद लिए गांव 'उड़वा' जरूर जाएं प्रियंका, ताक रहा है विकास की राह

एसपी के नेता हमारे गांव का विकास नहीं करते हैं कहते हैं कि सोनिया गांधी ने गोद लिया है उनसे ही करवाओ. महिला, पीएम मोदी से भी नाराज हैं. साल भर से उज्जवला गैस योजना के तहत मिले सिलेंडर को रिफिल नहीं करवा पा रही है क्योंकि देने के लिए एक साथ आठ सौ रुपये नहीं हैं.

रायबरेली (यूपी): प्रियंका गांधी लखनउ में रोड शो कर रही हैं लेकिन वह एक ऐसे गांव को भूल रही हैं जहां उन्हें जाना चाहिए. रायबरेली जिले में एक गांव है उड़वा. इस गांव को वहां की सासंद सोनिया गांधी ने गोद लिया है. गांव में घर के बाहर धूप सेंक रही एक महिला सोनिया गांधी की घोर आलोचक है. उनका कहना है कि सोनिया ने गांव गोद लिया और फिर गोद से उतार भी दिया. पड़ोस के गांव लोहिया हो गये. लोहिया यानि अखिलेश यादव की सरकार के समय विकास के काम जम कर हुए और ऐसे गांवों को लोहिया गांव कहा जाने लगा. आगे बताया गया कि समाजवादी पार्टी के नेता हमारे गांव का विकास नहीं करते और कहते हैं कि सोनिया गांधी ने गोद लिया है उनसे ही करवाओ. महिला प्रधानमंत्री मोदी से भी नाराज हैं. साल भर से उज्जवला गैस योजना के तहत मिले सिलेंडर को रिफिल नहीं करवा पा रही है क्योंकि देने के लिए एक साथ आठ सौ रुपये नहीं हैं. अपने कच्चे पक्के घर में परछत्ती पर बोरी में बांधे गये गैस चूल्हे को दिखाती हैं. तो सोनिया और मोदी के काम से नाखुश महिला से जब प्रियंका गांधी के बारे में पूछा गया तो कहने लगी कि प्रियंका वो आंधी है जो मोदी का उड़ा देगी. पास की महिलाएं हंस पड़ती हैं. उनसे पूछता हूं कि क्या वह सब इससे सहमत हैं तो कुछ हां कहती है तो कुछ ना.

इस हां और ना के बीच प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में चुनावी संभावनाएं तलाशने उतर रही हैं. पूर्वी यूपी की कुल मिलाकर 48 सीटों की जिम्मेदारी उन्हें दिए जाने की चर्चा है. इनमें रायबरेली और अमेठी की सीटें शामिल हैं. बात हो रही थी सोनिया गांधी के गोद लिये गांव उड़वा की. इसी गांव में गर्म कपड़ों की दुकान चला रहे एक नौजवान से बात हुई. पास की एक मिल में नौकरी कर रहे इस नौजवान की नोटबंदी के कारण नौकरी जाती रही थी. नौजवान इससे हताश तो था और मोदी सरकार से नाराजगी भी दिख रही थी लेकिन नौजवान गांधी नेहरु परिवार से भी पूरी तरह नाउम्मीद नजर आया.

प्रियंका गांधी का नाम लिया तो कहने लगा कि कौन प्रियंका... मैं नहीं जानता. बाद में चाय पीते हुए कहने लगा कि वह सोनिया या प्रियंका का नाम तक नहीं लेना चाहता क्योंकि इन लोगों ने रायबरेली के लिए कुछ नहीं किया. उसी चाय की दुकान पर बैठे कुछ अन्य लोगों का भी यही कहना था. एक ने कहा कि आज तक सोनिया इस गांव में कभी नहीं आई, चुनाव के समय वोट मांगने तक नहीं. एक ने कहा कि कुछ साल पहले बगल के गांव में प्रियंका का जरुर आना हुआ था और नई पीढ़ी की प्रियंका से कुछ उम्मीद बांधी जा सकती है. कुल मिलाकर सोनिया के गोद लिए गांव उड़वा में लोग सांसद से लेकर प्रशासन तक से दुखी नजर आए. प्रियंका को एक बार उस गांव में जाकर गांववालों से जरुर बात करनी चाहिए.

बात तो रायबरेली और अमेठी के स्थानीय पत्रकारों से भी करनी चाहिए. प्रियंका को भी और राहुल गांधी को भी. इन पत्रकारों का कहना है कि वह स्थानीय कांग्रेस नेताओं से कई दफे आग्रह कर चुके कि राहुल गांधी और सोनिया गांधी से ऑफ द रिकार्ड बात करना चाहते हैं. लेकिन ऐसा मौका कभी नहीं मिला. पत्रकार बताते हैं कि दोनों सीटों पर दोनों सांसदों ( सोनिया और राहुल ) के स्थानीय नुमांइदे सच्चाई बताते ही नहीं हैं. ऐसा नहीं है कि दोनों नेता केन्द्र से परियोजनाएं यहां लेकर नहीं आए लेकिन उन परियोजनाओं का काम किस रफ्तार से चल रहा है, रुकावटें कैसे दूर की जा सकती हैं, आगे की किश्तें नहीं आने से काम कैसे अटक रहा है और परियोजना के शुरु होने के बाद उसका संचालन में क्या क्या खामियां पेश आ रही हैं. इन बातों की जानकारी न तो सोनिया को दी जाती हैं और न ही राहुल को. यहां तक कि प्रियंका तक को स्थानीय नेताओं की चौकड़ी घेरे रहती है जो भरोसा दिला देती है कि सब कुछ ठीक चल रहा है , जनता बहुत खुश है और परियोजनाओं का लाभ आम जनता भरपूर उठा रही है.

पत्रकार रायबरेली की आईटीआई का उदाहरण देते हैं जो एक समय में अपने समय से बहुत आगे हुआ करती थी, पांच सितारा होटल की तरह, हर तरह की सुविधाओं से लबालब. लेकिन आज आईटीआई जर्जर हालत में है. पत्रकार दावा करते हैं कि सोनिया गांधी को पता ही नहीं होगा कि बड़े जोर शोर से शुरु की गयी आईटीआई किस हालत में है. इसी तरह रेल डिब्बों का कारखाना तो सालों पहले लग गया लेकिन डिब्बे बनने शुरु नहीं हुए और सोनिया गांधी का यहां भी अधेंरे में रखा गया. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डिब्बों के निर्माण की नींव रखी और सोनिया गांधी पर तंज कसा कि कैसे रेल डिब्बों की फैक्टरी में पंजाब से बने बनाए डिब्बे लाकर रखे जाते थे और जिन्हें यहां बनना दिखा दिया जाता था.

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लेकिन यह सच्चाई सोनिया और राहुल इसलिए भी नहीं जान पाए क्योंकि यहां की जनता हर बार इन्हें जितवा देती थी. उड़वा गांव में ही सोनिया की आलोचना करने वाले भी कह रहे थे कि जीतेंगी तो सोनिया गांधी ही या फिर प्रियंका गांधी ( अगर वह चुनाव लड़ती है तो ). यहां तक कि नजदीक के एक गांव में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत अपना पक्का घर बनवा रहे एक दंपत्ति का भी कहना था कि इस बार उन दोनों का वोट तो मोदी को मिलेगा लेकिन चुनाव तो सोनिया को ही जीतना है.

जीत का यह भरोसा रायबरेली और अमेठी की जनता से सोनिया और राहुल की दूर बढ़ा रहा है इस बात को प्रियंका जितनी जल्दी समझ लें उतना ही फायदा यूपी में कांग्रेस को हो सकता है. राजनीति तेजी से बदल रही है. मोदी और अमित शाह ने काम काज की शैली को बहुत बदला है. रोज नई जगह जाकर कुछ नया करना है या पुराने को इस तरह दोहराना है कि नया जैसा लगे. इस बात को समझने में राहुल को चार साल लग गये. जब समझे तो राजस्थान , छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश जीते भी. इस सिलसिले को प्रियंका गांधी को आगे ले जाने की जरुरत पड़ेगी. इसके लिए स्थानीय कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ साथ स्थानीय जनता के विश्वास को जीतना होगा.

इसकी शुरुआत प्रियंका गांधी चाहे तो रायबरेली के उस उड़वा गांव से कर सकती हैं जिसे उनकी मां सोनिया गांधी ने गोद लिया था. इसके बाद रायबरेली के स्थानीय पत्रकारों से मिलना होगा. जाति, मजहब के नाम पर राजनीति, विकास बनाम आरोपों के नाम पर राजनीति, इंद्रिरा गांधी से शक्ल मिलने के नाम पर राजनीति, पति वाड्रा पर लग रहे आरोपों और जांच के नाम पर राजनीति और धर्मनिरपेक्षता बनाम देश तोड़ने के नाम पर राजनीति तो होती ही रहेगी लेकिन पहले उस महिला से तो मिलो जिसे मलाल है कि सोनिया गांधी ने जिस गांव को गोद लिया था उसे गोद से क्यों उतार दिया.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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