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Opinion: सरपंच की हत्या हो या फिर औरंगजेब की कब्र का मामला..., बेवजह चर्चा में बना महाराष्ट्र

पिछले कुछ महीनों से महाराष्ट्र बेवजह की चर्चा में है, वो चाहे बात महाराष्ट्र में सरकार बनने के बाद से लग रहे आरोप-प्रत्यारोप की हो या यह सरपंच की हत्या और औरंगजेब की कब्र की हो. सरपंच की हत्या के बाद जिस तरह से राज्य के बड़े नेताओं पर आरोप लगे, उसने राज्य में अशांति का माहौल पैदा कर दिया. यानी, बीजेपी वर्सेज, शिवसेना वर्सेज एनसीपी मतलब अजीत पवार ग्रुप, शिंदे ग्रुप और बीजेपी इन सबके बीच में किसी ना किसी चीज पर अनबन चल रही है. लेकिन लॉ एंड ऑर्डर महाराष्ट्र में पिछले कई कुछ महीनों से एक बहुत बड़ा मुद्दा बन चुका है.

जिस तरह से सरपंच की हत्या की गई, उसके बाद सबूत सीबीआई ने कोर्ट में पेश किए. जिस तरह से पिक्चर सबके सामने आयी इसमें पता चलता है की कितनी बेदर्दी से इस पूरे घटनाक्रम अंजाम दिया गया. यह बिना किसी राजनेताओं और मंत्रियों की मदद के बिल्कुल भी संभव नहीं था. 

किसी भी राज्य में गृह विभाग बहुत ही महत्वपूर्ण माना जाता है. हमने पूर्व में देखा कि उद्धव ठाकरे की सरकार गिरने के पीछे गृह विभाग का इनपुट सही समय पर ना मिलना था, जिसके चलते उनकी सरकार चली गई थी. एकनाथ शिंदे सूरत से गुवाहाटी होते हुए फिर बाद में मुख्यमंत्री बने. 

चर्चा में क्यों महाराष्ट्र?

लेकिन अगर वर्तमान परिस्थिति देखें तो महाराष्ट्र में पिछले कई महीनों से कोयता गैंग पुणे, मुंबई या फिर कई क्षेत्रों में सक्रिय है. गैंगस्टर्स का जिस तरह से दबदबा बढ़ रहा है ऐसे में महाराष्ट्र के अंदर कानून-व्यवस्था की चुनौती बनी हुई है.

पहले महाराष्ट्र को सुसंस्कृत यानी एजुकेशन हब और कल्चर के लिए जाना जाता था. यहां पर कभी राजनीति में इतनी गिरावट नहीं देखने को मिली थी, लेकिन कुछ वर्षों और महीने से आज महाराष्ट्र के आपराधिक आंकड़ों की यूपी-बिहार से तुलना की जा रही है. हालांकि, वास्तविकता अब यही है कि उत्तर प्रदेश और बिहार में क्राइम रेट कम हो रहा है जबकि महाराष्ट्र में बढ़ रहा है. 

सरपंच की एक्सटॉर्शन और किडनैप के बाद जिस बेरहमी के साथ हत्या की गई, इससे एक बहुत बड़ा सवाल उठता है महाराष्ट्र की राजनीति में क्या ये गुंडों का राज्य बनकर रह गया है. क्या ये महाराष्ट्र पॉलिटिशियन के हाथ की कठपुतली बन चुका है. क्या यहां पर आम इंसान को भी न्याय मिलेगा यह एक सबसे बड़ा सवाल है.  जिस तरह से चार-पांच लोगों ने सरपंच को बंदी बनाकर उसके ऊपर अत्याचार किया, उसे नंगा करके मारा गया और उसके वीडियो बनाए गए, ये सबकुछ बेहद खौफनाक था.

महाराष्ट्र पर सवाल

ये सारी घटनाएं मुगलों के समय की याद दिलाती है क्योंकि उसी वक्त में इस तरह का अत्याचार हुआ करता था. सरपंच हत्याकांड में नैतिकता की जिम्मेदारी लेते हुए जरूर मंत्री पद से धनंजय मुंडे ने इस्तीफा दे दिया था. लेकिन, वे खुद अपना इस्तीफ लेकर नहीं गए बल्कि अपने पीए के जरिए उसे भिजवाया.

भारत का ये राजनीति इतिहास रहा है कि जब कोई गंभीर आरोप लगते थे तो वे पहले इस्तीफा देते थे. इसके बाद जांच की रिपोर्ट जनता के सामने आती थी, फिर या तो उस नेता को वो पद वापस दिया जाता था नहीं तो फिर वे जेल जाते थे.

लेकिन, काफी दबाव के बावजूद काफी दिनों तक धनंजय मुंडे ने इस्तीफा नहीं दिया. हकीकत ये है कि सीबीआई रिपोर्ट और पुलिस जांच होने के बाद जब वो रिपोर्ट सूबे के मुखिया यानी मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के पास पहुंची, उसके बावजूद सीएम, जिनके पास गृह विभाग था, उन्होंने भी कोई फैसला नहीं लिया. बीजेपी के तो कुछ नेताओं का तर्क ऐसा था कि वो एनसीपी का अंदरुनी मामला है कि वो किसका इस्तीफा लेते हैं और किसका नहीं लेते हैं.

मतलब जब आप राज्य में सत्ताधारी पार्टी हो, जब आप जनता की सेवा के लिए हो तो फिर नैतिकता की जिम्मेदारी हमेशा लेनी चाहिए. महाराष्ट्र के लोगों को आप कैसे न्याय दे सकते हो, इन सभी चीजों के बारे में भी विचार करना चाहिए. लेकिन, ऐसा लगता है कि इस मामले में महायुति की सरकार पीछे रह गई.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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