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'पुतिन को हल्के में न ले यूक्रेन और अमेरिका, टेक्टिकल न्यूक्लियर हथियार का भी कर सकते हैं इस्तेमाल'

एक बात स्पष्ट है कि यूक्रेन के राष्‍ट्रपति जेलेंस्‍की युद्ध तो नहीं जीत पाएंगे क्योंकि रूस ने यूक्रेन के पूर्वी और दक्षिणी हिस्से को आजाद कर दिया है. रूस एक सुपर पावर है. फिर पुतिन परमाणु युद्ध की भी धमकी दे रहे हैं. ऐसे हालात में एक साल लड़ाई इसलिए खींच गई क्योंकि नाटो अपना प्रॉक्सी वार लड़ रहा है. यूक्रेन के साथ तो ये युद्ध अभी और खींच सकता है या ये भी हो सकता है कि ये लड़ाई बंद हो जाएगी.

भारत का रुख तटस्थ है और भारत कह रहा है कि इस युद्ध को बातचीत के जरिए बंद किया जाए. दोनों देशों पर लड़ाई लड़ते-लड़ते स्ट्रेन जरूर आ गया है, तो वक्त का तकाजा ये है कि लड़ाई बंद जो जाएगी.

चीन अपने हितों को साधना चाहता है

हर देश राष्ट्रीय हित को आगे रखकर अपना कदम बढ़ाता है. चीन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह से पूरी तरह रूस के तरफ है, लेकिन उसका मुख्य उद्देश्य रूस से सस्ता तेल और सस्ती गैस की खरीद करना है. अचानक से वो न्यूट्रल गियर में इसलिए आ गया क्योंकि वह चाहता है कि उस पर प्रतिबंध न लगे. चीन की भी अर्थव्यवस्था चरमराई हुई है और प्रतिबंध लगने से उसके यहां विदेशी प्रत्यक्ष निवेश बंद हो जाएगा और वहां जो विदेशी कंपनियां हैं वो भागना शुरू कर देंगी. इसलिए चीन भी अपने प्रो-रसिया स्टैंड की बजाय अपने आप को न्यूट्रल रखने या उसका दिखावा करने की कोशिश कर रहा है.

हर कोई चाहता है युद्ध बंद हो

सबसे बड़ी बात ये है कि जर्मनी भारत के साथ भारत की करेंसी रुपया में व्यापार करने के लिए तैयार हो गया है और इंडियन रुपये में व्यापार के लिए तैयार होना एक बहुत बड़ी बात है. दूसरी बात ये है कि प्रधानमंत्री मोदी का वैश्विक रुतबा और भरोसा इतना है कि युद्ध की शुरुआत में उन्होंने दो दिन तक वॉर को रुकवाया और भारत का तिरंगा झंडा लेकर अपने यहां के छात्रों को और पड़ोसी देशों के जो छात्र वहां फंस गए थे उन्हें बाहर निकाला. भारत के कहने से दोनों देशों ने दो दिन के लिए लड़ाई बंद कर दी. भारतीय पीएम मोदी की यह कैपेबिलिटी है कि वो वॉर रूकवा सकते हैं या समझौते के टेबल पर ला सकते हैं. और रही बात जर्मनी की तो उसके अपने राष्ट्रीय हित हैं. वह नाटो में फंसा हुआ तो जरूर है लेकिन पूरा यूरोप रूस के गैस के ऊपर आश्रित है. युद्ध के कारण इसके ऊपर प्रभाव पड़ा है. हालांकि जर्मनी ने यूक्रेन को लेपर्ड टैंक भी सप्लाई किया है और वॉर में वो नाटो के साथ हैं और पूरी यूरोपियन यूनियन भी साथ है. लेकिन दीर्घकालिक समय में यूरोप को फायदा नहीं है. इसलिए जर्मनी कह रहा है कि जंग बंद करो.

दुनिया में दबदबा बढ़ाना चाहता है अमेरिका

अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन यूक्रेन में गए और बोले मैं आपके साथ आखिरी दम तक रहूंगा. अमेरिका इतना बड़ा देश है और वो सेल्फ सफिशिएंट है. न्यूक्लियर मिसाइल्स को छोड़कर बाकी वो पारंपरिक लड़ाई में भी सुरक्षित है. अब उनको नाटो के बहाने एक प्रॉक्सी वॉर लड़ने की क्या जरूरत है. एक वक्त यूक्रेन सोवियत संघ का ही हिस्सा था. ये हिंदुस्तान-पाकिस्तान जैसी बात है. रूस और यूक्रेन पहले एक ही मुल्क थे, जो बंटने के बाद अब आपस में लड़ रहे हैं. अमेरिका इस युद्ध से प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित नहीं है. इसलिए वो अप्रत्यक्ष तौर पर इसमें शामिल है क्योंकि वह चाहता है कि दुनिया अमेरिका पर आश्रित हो जाए.

रूस-यूक्रेन का नजरिया अलग-अलग

एक बात तो स्पष्ट तौर पर कहना चाहूंगा कि इस युद्ध को लेकर रूस को जो आकलन था, वो ग़लत साबित हो गया है. दरअसल रूस ने सोचा था कि युद्ध करके हम यूक्रेन की सरकार को गिरा देंगे. रूस का ये आकलन ग़लत साबित हो गया. दूसरी बात ये कि रूस और यूक्रेन के क्षेत्र में ही पहला और दूसरा विश्व युद्ध लड़ा गया था. ऐसे में इन्हें लंबे समय के लिए युद्ध करने की ऐतिहासिक आदत है. यूक्रेन के पास नाटो का अप्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष तौर पर मदद है. चूंकि रूस अपने आप में एक बहुत बड़ा देश है, जिसके पास अपना बहुत बड़ा संसाधन है. गौर करने वाली बात है कि रूस का व्यापार भारत और चीन के साथ खुला हुआ है और जब तक इन दोनों देशों के साथ उसका व्यापार चल रहा है, मैं समझता हूं कि रूस का अस्तित्व खत्म नहीं हो सकता है. ये सच है कि इस युद्ध से रूस की अर्थव्यवस्था पर प्रभाव जरूर पड़ता है. आज दुनिया एक ग्लोबल विलेज है और सभी एक-दूसरे पर आश्रित हैं तो मेरी समझ से ये लड़ाई अभी खींचती जाएगी. हां, ये जरूर है कि दोनों देश ऑनरेबल पीस करना चाहते हैं और ये उनके वेस्टेड इंट्रेस्ट पर है कि वे इसे होने देंगे कि नहीं. ऑनरेबल पीस का मतलब ये कि दोनों अपने-अपने तरीके से इसे देखते हैं. जैसे रूस ने यूक्रेन के जिन इलाकों को खाली किया है, वो इलाका रसियन डोमिनेटेड है, वहां पर रूसी नागरिक अधिक हैं. अभी जो यथास्थिति बन गई है उस पर रूस शांति बहाल करने के लिए तैयार हो सकता है. लेकिन ये बात यूक्रेन को मंजूर नहीं है. यूक्रेन का कहना है कि हमारा बनाया हुआ इलाका खाली कर दो.

पुतिन जो कहते हैं, उस पर अमल भी करते हैं

यूक्रेन में हर जगह रशियन भाषा बोलने वाली आबादी है. रूस ने जिन इलाकों में कब्जा कर रखा है वहां पर तो और अधिक संख्या में (60से 80%) रूसी नागरिक हैं.   पूरे यूक्रेन में करीब 20 प्रतिशत रूसी नागरिक हैं. इसलिए रूस जो टेक्टिकल न्यूक्लियर हमले की बात कर रहा है वो उसके लिए भी बहुत मुश्किल है और ऐसा करना लगभग असंभव है. देखिये एक बात ये भी समझना चाहिए कि परमाणु हमला जो होता है वो सेलेक्टेड नहीं होता है लेकिन पुतिन जो कहते हैं वो कर देते हैं. उन्होंने यूक्रेन पर हमला करने की बात कही थी वो कर दिया. इसलिए परमाणु हमले की बात कोई मेगा टर्म्स में सीमित नहीं है. आजकल टेक्टिकल न्यूक्लियर हथियार आए हुए हैं, मतलब की छोटे पैमाने पर जैसे ब्रिगेड लेवल पर, छोटे शहरों पर, छोटी आबादी पर उसके टारगेट कारगर सिद्ध होते हैं और अमेरिका की भी ये कोशिश रहेगी की परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं हो. लेकिन पुतिन के व्यक्तित्व को देखते हुए उनकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए. स्पष्ट तौर पर यह भी कहा जा सकता है कि परमाणु हमला करने की बात करने वाले पुतिन के साथ ही उसकी कमजोरी ये भी है कि वहां रसियन आबादी की मौजूदगी है. यूक्रेन के जो एक्सक्लूसिव फौजी ठिकाने हैं, उनको ध्वस्त करने के लिए रूस छोटे पैमाने केटेक्टिकल न्यूक्लियर हथियार का इस्तेमाल कर सकता है. चूंकि यूक्रेन के हर शहर में रसियन आबादी हैं तो ऐसी स्थिति में वो कोई बड़े परमाणु हथियारों का इस्तेमाल नहीं करेगा. 

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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