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देश में आरक्षण को तर्कसंगत और न्यायपूर्ण बनाने के लिए जरूरी है रोहिणी आयोग जैसे कमीशन, ओवैसी का बयान बस सुर्खियों के लिए

देश में रोहिणी आयोग और आरक्षण को लेकर बातचीत हो रही है. दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जस्टिस की अध्यक्षता में एक कमिटी बनी है, जो ओबीसी के वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण पर काम कर रही है. उसी के साथ असदुद्दीन ओवैसी ने आरक्षण की सीमा 50 परसेंट से बढ़ाने की कर दी है. इसके साथ ही इसमें एक पेंच धर्मांतरित हिंदुओं का भी है. आरक्षण एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर कोई भी नेता या सेलिब्रिटी कुछ भी कहने से बचता है. यह भावनात्मक तौर पर इतना जटिल और घुमावदार मसला है कि इसकी समीक्षा की बात भी महंगी पड़ जाती है. अब ऐसे में रोहिणी आयोग के नतीजों के बाद देश में क्या कुछ बदलने की उम्मीद है या सबकुछ वैसा ही चलता रहेगा?

अन्य पिछड़ा वर्ग के आरक्षण पर विचार

जी रोहिणी दिल्ली हाईकोर्ट की पूर्व जज हैं और उनकी अध्यक्षता में एक कमिटी बनी है. उस कमिटी को यह देखना है कि ओबीसी आरक्षण जिसे मिलता है, क्या वो सही अनुपात में मिल रहा है और उसका सही अनुपात में अनुपालन हो पा रहा है कि नहीं. अब बात चाहे कालेलकर कमिटी हो या बी पी मंडल कमिटी, जिसे हम मंडल आयोग के नाम से जानते हैं. इन दोनों ने ही परंपरागत पेशे और सामाजिक प्रतिष्ठा के आधार पर रिजर्वेशन की बात कही. यही आखिरकार हुआ भी है. लोगों की सोशल स्टेटस के मुताबिक ही तय हुआ कि वह ओबीसी में आएंगे, या एससी में. अगर वह सोशल स्टेटस में खास मानकों को पूरा करता है, उसके पेश पर विचार कर, इन सब के आधार पर रिजर्वेशन का फैसला हुआ है. अब मान लीजिए कि कोई किसानी करनेवाले समाज से आता है, कोई पशुपालक है, तो उसे भी इस वर्ग में रखा जा सकता है. गडबड़ ये हो रही थी कि देखा गया मंडल कमीशन तो 1911 के कास्ट सर्वे पर ही आधारित हुआ था. तो, इस पर सवाल उठे कि जो आरक्षण सोशल स्टेटस के आधार पर हुआ, क्या वह सही है? या इसके अंदर भी कैटेगराइजेशन और सब-कैटेगराइजेशन की जरूरत है. क्या सबको लाभ मिल रहा है? इन्हीं सब बातों के लिए रोहिणी आयोग का गठन हुआ. अब जैसे बिहार का मामला लीजिए. वहां यादव समुदाय को तो खासी तवज्जों दी गयी है, लेकिन मांझी समुदाय को नहीं. तो, रोहिणी आयोग का गठन इन्हीं सब सवालों के जवाब जानने के लिए हुआ है. 

आरक्षण की सीमा से रोहिणी आयोग का नहीं लेनादेना

असदुद्दीन ओवैसी की बात का हालांकि रोहिणी कमीशन से लेनदेन नहीं है. ओवैसी ने आरक्षण की सीमा बढ़ाने को लेकर बात की है, लेकिन रोहिणी आयोग उस पर कोई काम नहीं कर रही है. रोहिणी कमीशन का एकमात्र काम है कि भारत में  मंडल कमीशन की सिफारिशों के बाद जो 27 फीसदी आरक्षण ओबीसी को मिलता है, उसके अंदर में जो सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी और नॉन-क्रीमी लेयर का जो वर्गीकरण किया है, उसके उचित वर्गीकरण की बात करता है. रोहिणी कमीशन यह कहता है कि ओबीसी कितने हैं और कितने तरह के हैं, उसको देखा जाए. जो रिपोर्ट हमारे पास है, उसमें तो ओबीसी 2633 प्रकार के हैं. तो, रोहिणी आयोग अद्यतन वर्ग बना रहा है, उसमें यह भी देख रहा है कि जो वर्गीकरण और उप-वर्गीकरण हुआ है, वह ठीक तरह से हो. हो सकता है कि उसमें ऐसे तीन-चार वर्ग बन जाएं. एक समूह ऐसा हो सकता है किसी जाति का, जिसे काफी आरक्षण मिलता हो. दूसरा ऐसा, जिसे कभी-कभार मिलता है, तीसरा ऐसा है जो बहुत कम आऱक्षण का लाभ लेता है और चौथा ऐसा है, जिसे मिलता ही नहीं है. आप देखें कि सेंट्रल बोर्ड की परीक्षाएं भी जो लोग लिखते हैं, उसमें भी कुछ प्रमुख कास्ट हैं, जिनकी वन फोर्थ एलिजिबिलिटी है, कुछ हैं जिनका सलेक्शन ही नहीं हुआ है. अगर हुआ भी है तो कुल मिलाकर 1 या 2 फीसदी ही. इसी में समानता लाने के लिए वर्गीकरण और फेयर डिस्ट्रीब्यूशन के लिए उप-वर्गीकरण जरूरी है, ताकि सबको फायदा मिल सके, किसी एक जाति को ही सारा लाभ न मिले. ओवैसी साहब की बात मुद्दा भटकाने वाली लगती है. अब जब आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग को 10 फीसदी आरक्षण मिल रहा है और आरक्षण सीमा पर लगी सीलिंग 50 फीसदी से बढ़ गयी है. इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी है कि 50 फीसदी की सीमा जरूरत पड़ने पर लांघी जा सकती है, तब से यह एक पॉलिटिकल नैरेटिव बन गया है कि चूंकि मोदी सरकार ने सीलिंग को क्रॉस किया है, इसलिए और भी अधिक आरक्षण देना चाहिए, तो ओवैसी का यह राजनीतिक बयान है. सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में यह साफ तौर पर कहा है कि जब तक किसी समुदाय का पिछड़ापन आप साबित नहीं कर देते तो उसे आरक्षण नहीं दिया जा सकता है. 

जातिगत जनगणना नहीं है उचित

व्यक्तिगत तौर पर तो मैं जातिगत जनगणना के पक्ष में नहीं हूं. जब हम चांद और सूरज पर जा रहे हैं तो अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो वाली नीति को अपनाकर जाति जनगणना करवाना तो गलत है. लेकिन इसमें एक और बात है. जो दल ओबीसी कास्ट के बेसिस पर वोट लेते थे, जातिगत जनगणना में सबसे अधिक नुकसान उनका ही होगा. जरा बिहार को चलानेवाली यादव फैमिली को देखिए. आपको लगता है कि जब जातिगत जनगणना के नतीजे आएंगे, तो यादवों का आरक्षण बढ़ेगा या घटेगा? वो आक्रमण तो कर रहे हैं राजनीतिक फायदा उठाने के लिए, लेकिन आखिरकार यादवों का फायदा नहीं होगा, उनका आऱक्षण कम ही होगा. इस तरह का सर्वे कम से कम देश के हित में तो नहीं है. आरक्षण का सीधा तर्क ये है कि आप देश के सभी नागरिकों को एक ही पैमाना दे सकें, जो आप कई वर्गों को कई वर्षों तक नहीं दे पाए हैं. पैमाने को बराबर करने के लिए आप आरक्षण देते हैं. एक समुदाय आगे बढ़ा है, उसके पास सारी सुविधाएं हैं, तो दूसरे समुदाय के पास वह कुछ है नहीं. उस पैमाने को एक करने के लिए ही आरक्षण की व्यवस्था की गयी है. जब तक समाज में एक समानता नहीं आएगी, आप आरक्षण नहीं हटा सकते. हां, उसको प्रैक्टिकल बनाने के लिए आपको रोहिणी आयोग की है जरूरत. ऐसा न हो कि आरक्षण का फायदा एक ही वर्ग उठा ले और वो बाद में रिवर्स रिजर्वेशन कर आरक्षण के फायदों को ही नुकसान पहुंचा दे. हमारे देश में आरक्षण इक्विटी के लिए मिलता है. अब चूंकि उसका उप-वर्गीकरण नहीं हुआ है, तो उसी वजह से ओबीसी में भी जो अति पिछड़े हैं, उनको आप फायदा नहीं दे रहे हैं. इसके लिए रोहिणी आयोग जैसे कई आयोगों की जरूरत है. ईडब्लूएस भी 70 साल बाद ही सही, मिला तो है. आप मानते हैं कि सवर्णों में भी गरीब हैं. भविष्य में उम्मीद की जा सकती है कि हम लोग आरक्षण जिस भावना के साथ शुरू हुआ था, उसे लागू कर सकें. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.] 

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