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औरतें भी सर्वहारा ही हैं कॉमरेड

जिस समय यह सब लिखा जा रहा है, शायद उस समय केरल के बिजली मंत्री चाय की चुस्कियां ले रहे हों. हो सकता है- वह चाय पीते ही न हों-कॉफी पीते हों लेकिन इतना तो तय है कि चाय का स्वाद उन्होंने चखा जरूर होगा. कभी वह चाय के बागान में खुद मजदूरी किया करते थे. चाय बागान की खुशबू उनकी रगों में दौड़ती तो होगी ही- तभी तो चाय बागान से जुड़े ‘सच’ को बयान करने में उन्होंने इतनी तत्परता दिखाई. केरल का मुन्नार शहर चाय के बगीचों से लहलहाता है. खासकर कानन देवन हिल्स. यहां काम करने वाली औरतें क्या-क्या करती हैं, हाल ही में बिजली मंत्री ने सबके सामने इसका खुलासा किया है- ‘पेम्पिलइ ओरुमई नाम का उनका मजदूर संगठन दारूबाज औरतों का समूह है जो तमाम तरह के गलत काम करता है’. बिजली मंत्री सब कुछ जानते हैं. उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया लेकिन बस, अपने मन की भड़ास निकाल दी. यह होना ही था. दो साल पहले जब मुन्नार की महिला मजदूरों ने अपने लिए समान वेतन और बोनस के संघर्ष को शुरू किया था तब किसी पुरुष का सहयोग न लेने का फैसला भी किया था. औरतों का स्ट्रगल, और वह भी किसी आदमी के बिना- किसी को कहां मंजूर हो सकता है? हमारे देश में अलग-अलग क्षेत्रों में मजदूरी की प्रकृति एक दूसरे से एकदम अलहदा है. एक क्षेत्र, दूसरे के बारे में तनिक भी नहीं सोच सकता. चाय बागान की सच्चाइयां चाय की पत्तियों की ही तरह कड़वी हैं जो उबलने पर भी मीठी नहीं होतीं. लगभग 10 राज्यों में फैले इन बागानों में 10 लाख से ज्यादा लोग काम करते हैं जिनमें से आधी औरतें हैं. मजे की बात तो यह है कि हर राज्य में दैनिक मजदूरी अलग-अलग है. अगर पश्चिम बंगाल में अनस्किल्ड टी लेबर को रोजाना सवा सौ रुपए से भी कम दिहाड़ी है तो केरल में दो सौ रुपए से कुछ ज्यादा. हां, दिहाड़ी थोड़ी बहुत अलग होने के बावजूद प्रॉब्लम्स एक सी ही हैं. हर जगह भुखमरी, बिगड़ती सेहत, काम करने की खराब स्थितियां, सब एक सी हैं. इसके बावजूद मुन्नार इन सबसे अलग इसलिए है क्योंकि पेम्पिलइ ओरुमई ने इसके खिलाफ आवाज उठाई. 2015 में मुन्नार की 6,000 औरतों ने तय किया कि अब लड़ना ही है. इन औरतों ने टाटा जैसी बड़ी कंपनी से दो-दो हाथ करने का फैसला किया. दरअसल जब कंपनी ने इन महिला मजदूरों को बोनस न देने का फरमान जारी किया तो औरतों ने हाथ खड़े कर दिए. साफ था- हमें दिहाड़ी भी दुगुनी चाहिए और बोनस भी. सबसे खास बात यह थी कि इन औरतों ने अपने स्ट्रगल को पूरी तरह आदमियों से मुक्त रखा. उनका कहना था कि लेबर यूनियंस के मेल मेंबर मैनेजमेंट के गुर्गे हैं और हम उनका विरोध करते हैं. जब कुछ आदमियों ने इस आंदोलन का हिस्सा बनना चाहा तो औरतों ने उन्हें चप्पलें लगाईं- सचमुच. चाय की पत्तियां तोड़ना, उन्हें बोरों में भरकर ट्रक में चढ़ना, यह सब औरतों का ही काम है. हमारे यहां बहुत से काम सिर्फ औरतों के जिम्मे ही आते हैं. घर के ही नहीं, बाहर के भी. धान को रोपना, बीड़ी और अगरबत्ती को लपेटना, झींगों के छिलके उतारना, रेशम के कीड़ों को पालना, काजू की भूसी निकालना, यह सब औरतें ही किया करती हैं. क्यों करती हैं, इसके पीछे कई तर्क हैं. लेकिन इसके पीछे आप क्या तर्क देंगे कि उन्हें आदमियों के कम दिहाड़ी क्यों मिलती है. मेटरनिटी लीव या बेनेफिट क्यों नहीं मिलते हैं? चाय बागानों में स्प्रे किए जाने वाले कीटनाशकों से बचाव का कोई साधन क्यों नहीं दिया जाता? देश का प्लांटेशन लेबर्स एक्ट कहता है कि चाय बागान में काम करने वाले मजदूरों को दिहाड़ी के अलावा प्राविडेंट फंड, बोनस, पेंशन, राशन, काम करने के लिए छाता और एप्रेन, खाना पकाने के लिए लकड़ियां, घर, बिजली, पानी, मेडिकल केयर और शिक्षा की सुविधा दी जाएगी. टी एक्ट कहता है कि अगर चाय कंपनी मजदूरों के हितों की रक्षा नहीं करती तो सरकार को खुद मैनेजेरियल कंट्रोल अपने हाथ में ले लेना चाहिए. 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से अपनी संवैधानिक ड्यूटी पूरी करने को कहा था, लेकिन सरकार बराबर चाय बागानों के प्राइवेटाइजेशन का काम करती रही. चाय बागान की औरतों की हालत देखनी है तो पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग, तेरई और देओरा की कहानियां सुनिए. कितनी ही बागान बंद कर दिए गए क्योंकि मुनाफा नहीं हो रहा था. जो चलते हैं, उनमें भी काम करने वाली औरतों का दुखड़ा दिल दहलाने वाला है. हजारों मौतें सिर्फ इसलिए हो रही हैं क्योंकि मजदूर के पास खाने खरीदने के लिए पैसा नहीं है. देश में कितने ही लोग जूठी थाली में दर्जनों पकवान 'स्वाद नहीं आ रहा’, कहकर छोड़ देते हैं. क्या कोई सोच सकता है कि 2013 में देओरा के बंद पड़े धेकलापाड़ा टी एस्टेट में 95 मजदूरों ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री को चिट्ठी लिखी और कहा उन्हें खुद की जान देने की इजाजत दी जाए क्योंकि वे भुखमरी का शिकार हैं. यूनिसेफ और सेव द चिल्ड्रन की ज्वाइंट स्टडी ने बताया कि बदतर स्थितियों के कारण नन्ही बच्चियों की सेक्स ट्रेड के लिए स्मगलिंग कर दी जाती है. मुन्नार की मजदूर औरतों ने इन सबके खिलाफ मोर्चा लिया. अनपढ़, साधारण औरतों ने. जो किसी संगठन का कभी सदस्य नहीं रहीं. दो साल पहले 20 परसेंट बोनस के उनके राइट को तो मंजूर कर लिया गया लेकिन दुगुने वेतन की मांग अब भी जारी है. औरतें के स्ट्रगल की कहानियां और भी हैं. अहमदाबाद में माणिक चौक के फुटपाथों पर दुकानें लगाने वाली औरतों ने फुटपाथ पर ही इस बात के लिए धरना दिया था कि उन्हें वहां से हटाया न जाए. जिस जगह सौ सालों से औरतें दुकानें लगाती थीं, वहां कार पार्किंग बनाई जा रही थी. इंफाल के मदर्स मार्केट इमा किथल की महिला दुकानदारों ने अपने ट्रेडिशनल मार्केट प्लेस को बचाए रखने के लिए अपनी दुकानों के आगे ही रात को सोना चालू कर दिया. 3,000 की तादाद में ये औरतें नहीं चाहती थीं कि दो सौ साल से चलने वाले इस मार्केट की जगह मल्टीस्टोरी बिल्डिंग बने. यूं सरकारें सब जगह बहरी हो जाती हैं. कई जगह गूंगी भी- कोई पत्ता नहीं खड़कता. लेकिन यहां जनप्रतिनिधि गूंगे नहीं-वाचाल हो गए हैं. पर औरत भी सर्वहारा ही है कॉमरेड! अगर उसकी लड़ाई नहीं लड़ोगे तो सड़ांध का शिकार हो जाओगे. दरअसल सारे प्रबुद्ध लोग- प्रगतिशोल लोग औरतों की बात आने पर धराशाई हो जाते हैं. तो प्रोग्रेसिव होने से आप जेंडर सेंसेटिव नहीं हो जाते. कुल मिलाकर बाईं ओर जाइए या दाईं ओर, औरतें आपके पैरों की जूतियां ही हैं. उन्हें पैरों से कुचलना बंद कीजिए. उनकी लड़ाई में साथ न देना हो न सही, मुंह तो बंद रखिए ही!! (नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आकड़ें लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है)
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