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गंगा एक्सप्रेसवे: आर्थिक पुनर्जागरण की जीवंत रेखा

गंगा की धारा जब किसी पत्थर से टकराती है, तो वह उसे काटती नहीं, बल्कि उसे घिसते-घिसते अपने रास्ते की शक्ल में ढाल लेती है. उत्तर प्रदेश की नियति भी कुछ ऐसी ही रही है . इस भूमि ने सभ्यताएं जन्मी हैं, क्रांतियां बोई हैं, फिर भी एक दशक पहले तक एक विडंबना इसके माथे पर चिपकी रही कि यह राज्य, जो देश की आबादी का छठा हिस्सा समेटे है, विकास की दौड़ में अक्सर पिछली पंक्ति में ही खड़ा दिखाई पड़ा. इतिहास की यह विरोधाभासी विरासत अब एक नए अध्याय की दहलीज पर खड़ी है और उस दहलीज का नाम है गंगा एक्सप्रेसवे, जो योगी सरकार के संकल्प के एक बड़े प्रतिमान के रूप में अब साकार रूप में है.

594 किलोमीटर....मेरठ से प्रयागराज...यह केवल एक सड़क की लंबाई नहीं है, बल्कि उस सोच की लंबाई है, जो मानती है कि किसी राज्य को बदलने के लिए पहले उसकी नसों में नई रक्त-संचार व्यवस्था बनानी पड़ती है. जब कोई जमीन पर इतनी बड़ी रेखा खींची जाती है, तो वह केवल भूगोल नहीं बदलती, वह उस भूगोल में जीने वाले लोगों की संभावनाओं का नक्शा बदल देती है. गंगा एक्सप्रेसवे उत्तर प्रदेश के लिए ऐसा ही एक परिवर्तनकारी हस्तक्षेप है, जिसे समझने के लिए केवल इंजीनियरिंग की नहीं, बल्कि अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र और दूरदर्शिता की भाषा जाननी होगी.

उत्तर प्रदेश का एक पुराना घाव है पश्चिम और पूर्व के बीच की खाई. पश्चिमी उत्तर प्रदेश, जो मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद, आगरा जैसे शहरों से परिभाषित होता है, में उद्योग हैं, बाज़ार हैं, रोजगार है, और एक खास किस्म की आधुनिकता भी है. लेकिन, जैसे-जैसे आप पूर्व की ओर बढ़ते हैं प्रयागराज, वाराणसी, आजमगढ़, बलिया,,,,एक अलग उत्तर प्रदेश मिलता है. वहां खेत हैं, मंदिर हैं, नदियां हैं, और असीम मानवीय संभावनाएं भी हैं, लेकिन उन संभावनाओं में अवसरों का घोर अभाव दिखता था.

गंगा एक्सप्रेसवे इस विभाजन को पाटने की सबसे बड़ी भौतिक कोशिश है. जब मेरठ और प्रयागराज एक तेज, सुगम, भरोसेमंद सड़क से जुड़ जाते हैं, तो वास्तव में यह दो शहरों का नहीं, दो आर्थिक ध्रुवों का मिलन होता है. पूर्वांचल की श्रम शक्ति और कृषि उत्पाद पश्चिम के बाजारों तक पहुंचने लगते हैं. पश्चिम की पूंजी और उद्यमशीलता पूर्व की सस्ती जमीन और उपलब्ध श्रम को देखकर खिंचती है. यह वह आर्थिक गुरुत्वाकर्षण है जो तब उत्पन्न होता है जब दूरी सिकुड़ती है, न केवल किलोमीटर में, बल्कि समय और लागत में भी.

लॉजिस्टिक्स की दुनिया में एक पुराना सच है, माल की ढुलाई की लागत जहां कम होती है, वहां उद्योग खिंचे चले आते हैं. भारत में लॉजिस्टिक्स लागत विकसित देशों की तुलना में लगभग दोगुनी है. यह अतिरिक्त लागत उद्योगों की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर करती है, उत्पादों को महंगा बनाती है और निर्यात को बाधित करती है. जब गंगा एक्सप्रेसवे जैसे हाई-स्पीड कॉरिडोर बनते हैं, तो यह समीकरण बदलता है. माल तेज़ पहुंचता है, भंडारण की जरूरत घटती है, ट्रांसपोर्ट का समय कम होता है और पूरी सप्लाई चेन अधिक विश्वसनीय बन जाती है. गंगा एक्सप्रेसवे से होकर गुजरने वाला एक ट्रक केवल माल नहीं ढोएगा, वह उत्तर प्रदेश की आर्थिक प्रतिस्पर्धात्मकता को एक पायदान ऊपर ले जाएगा.

लेकिन, असली रूपांतरण तब होगा जब एक्सप्रेसवे के किनारे एक औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र उगेगा. सरकार की योजना औद्योगिक नोड्स, वेयरहाउसिंग हब और एमएसएमई क्लस्टर विकसित करने की है. यह योजना अगर सही नीयत और सही क्रियान्वयन के साथ जमीन पर उतरी, तो उत्तर प्रदेश को एक नई ‘ग्रोथ स्पाइन’ मिल सकती है. वह रीढ़, जिसके सहारे एक पूरा आर्थिक शरीर खड़ा होता है. टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए /U विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. हरदोई, शाहजहांपुर, बदाये, संभल रायबरेली, उन्नाव, ये वे शहर हैं जो अब तक विकास की मुख्यधारा से किनारे पड़े थे. एक्सप्रेसवे की पहुंच उन्हें एक बड़े आर्थिक नेटवर्क से जोड़ेगी.

किसानों की बात किए बिना यह विश्लेषण अधूरा है. किसान की सबसे बड़ी पीड़ा यह नहीं है कि वह मेहनत नहीं करता, बल्कि यह है कि उसकी मेहनत का सही मूल्य उसे नहीं मिलता. फसल खेत में पकती है, लेकिन मंडी तक पहुंचते-पहुंचते उसकी ताजगी और उसकी कीमत दोनों गिर जाती हैं. कोल्ड चेन की कमी, खराब सड़कें और बाजार तक पहुंच की धीमी रफ्तार, ये तीन चीजें मिलकर किसान की उपज का एक बड़ा हिस्सा बर्बाद कर देती हैं. गंगा एक्सप्रेसवे खेत से बाजार की यात्रा को तेज करेगा. यदि इसके साथ-साथ एक्सप्रेसवे के किनारे कोल्ड स्टोरेज, फूड प्रोसेसिंग यूनिट और एग्री-लॉजिस्टिक्स हब विकसित हों, तो किसान की तकदीर बदलने में देर नहीं लगेगी. यह विकास का वह बिंदु है जहां बुनियादी ढांचा सीधे मानवीय जीवन की गुणवत्ता से जुड़ता है.

एक्सप्रेसवे का एक और आयाम है जिसे अक्सर सार्वजनिक विमर्श में नजरअंदाज किया जाता है — रियल एस्टेट का रूपांतरण. जब भी किसी इलाके में हाई-स्पीड कनेक्टिविटी आती है, जमीन की कीमतें बदलती हैं. नए आवासीय क्षेत्र उभरते हैं, लोग शहर के महंगे इलाकों को छोड़कर एक्सप्रेसवे के किनारे बसने लगते हैं. हालांकि इस प्रक्रिया में जमीन की सट्टेबाजी और असमान लाभ वितरण के खतरे भी हैं, जिनसे बचने के लिए सरकार को सक्रिय नीतिगत हस्तक्षेप करना होगा. रणनीतिक दृष्टि से भी यह एक्सप्रेसवे महत्वपूर्ण है. इसकी संरचना ऐसी बनाई गई है कि आपात स्थिति में इसे वायुसेना की एयरस्ट्रिप के रूप में इस्तेमाल किया जा सके. यह विशेषता इसे केवल एक आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय सुरक्षा परिसंपत्ति भी बनाती है.

निवेशकों का मनोविज्ञान भी इस संदर्भ में विचारणीय है. जब कोई राज्य इस पैमाने की परियोजना को समय पर, पारदर्शिता के साथ और कार्यकुशलता के साथ पूरा करता है, तो वह केवल एक सड़क नहीं बनाता, वह एक संदेश देता है कि यह राज्य अब गंभीर है. यहां शासन काम कर रहा है. यहां आपकी पूंजी सुरक्षित है और आपकी परियोजनाएं अटकेंगी नहीं. यह अमूर्त भरोसा बहुत ठोस परिणाम देता है. उत्तर प्रदेश, जो कभी बीमारू राज्यों की श्रेणी में गिना जाता था, अब खुद को एक आधुनिक, निवेश-अनुकूल और महत्वाकांक्षी राज्य के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. गंगा एक्सप्रेसवे इस नई छवि का सबसे दृश्यमान प्रतीक है.

लेकिन यहां एक चेतावनी भी जरूरी है. बुनियादी ढांचा अपने आप में परिवर्तन नहीं लाता, वह केवल परिवर्तन की शर्तें बनाता है. ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहां शानदार सड़कें बनीं, पुल उठे, बंदरगाह बने लेकिन उनके आस-पास का जीवन नहीं बदला, क्योंकि नीतिगत वातावरण उनके साथ नहीं बदला. परिवर्तन तब होगा जब सड़क के साथ-साथ शासन के संकल्प धरातल पर दिखाई देंगे.. जब किसान को उचित मुआवजा मिलेगा, युवा को कौशल प्रशिक्षण मिलेगा, उद्यमी को त्वरित अनुमति मिलेगी और पर्यावरण का ध्यान रखा जाएगा. इन चुनौतियों के बावजूद, यह स्वीकार करना होगा कि गंगा एक्सप्रेसवे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की उस सोच की अभिव्यक्ति है जो मानते हैं कि उत्तर प्रदेश अब केवल ‘सबसे बड़े राज्य’ के अभिमान से नहीं, बल्कि ‘सबसे तेज विकसित होते राज्य’ की वास्तविकता से पहचाना जाएगा.

जब कोई सड़क बनती है, तो उस पर भविष्य की पदचापें भी अंकित होने लगती हैं. गंगा एक्सप्रेसवे पर जो पहला ट्रक दौड़ेगा, जो पहली बस मेरठ से प्रयागराज जाएगी, जो पहला किसान अपनी सब्जी लेकर इस सड़क से गुजरेगा, वे सब इस परिवर्तन के पहले साक्षी होंगे. उनके लिए यह सड़क केवल सड़क नहीं होगी. यह एक वादे का पूरा होना होगा, उस वादे का, जो इस योगी सरकार से इस राज्य के करोड़ों लोगों ने मांगा था.

[यह लेखक के निजी विचार है. ]

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