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मुसलमानों से लोकसभा चुनाव की वोटिंग के वक्त अपील और सलाह का मतलब सिर्फ सियासी

हाल ही में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश के मुसलमानों से आत्ममंथन करने की अपील की. लेकिन असल में वे घबरा गए हैं, चुनाव में हार न जाएं इस कारण ये सब बोल रहे हैं. पहले बीजेपी पसमंदा मुस्लिम की बात करती थी, लेकिन वहां दाल नहीं गली. ऐसे में अब बीजेपी महत्वाकांक्षी लोगों को ढूंढ रही है. हर समाज में लालची लोग होते हैं ऐसे व्यक्तियों को ढूंढ कर अपने पास रखते हैं.

प्रधानमंत्री और देश का विश्वास 

उन्होंने कहा कि मुसलमान कब तक सोचते रहेंगे कि सत्ता में कौन बैठेगा, कौन उतरेगा, इस में मुस्लमान अपने बच्चों का भविष्य खराब करेंगे. ये कथन धमकी है अब केवल मुसलमानों के बच्चों का सवाल नहीं है. उन्होंने देशभर के नौजवानों का भविष्य खराब कर दिया है. महिलाओं के साथ मणिपुर में क्या हुआ, कर्नाटक में NDA से जुड़े प्रज्वल रेवन्ना, जिनके लिए ये वोट मांग रहे थे, आज उन पर संगीन आरोप लगे और वे जर्मनी भाग गए.  इस बार के चुनावों में जनता इनको सज़ा दे रही है.  प्रधानमंत्री की बात हास्यास्पद है. उनकी बातों पर कौन विश्वास करेगा? 

प्रधानमंत्री को ये अपील इसलिए करनी पड़ी क्योंकि अंधभक्तों को छोड़कर देशभक्त, नौजावन, महिला और देश में प्रजातंत्र चाहने वाले इनके खिलाफ हो गए हैं. इसी कारण प्रधानमंत्री ये अपील कर रहे हैं. सबसे पहले देश से माफ़ी मांगनी चाहिए, लेकिन इनकी माफ़ी पर भी कोई भरोसा नहीं करेगा क्योंकि जैसे किसानों से जुड़े कानून वापस लेते हुए माफ़ी मांगी, लेकिन अंत में किसानों को MSP की गारंटी नहीं दी गयी, आज इनको किसान, नौजवान दौड़ा रहे हैं. मणिपुर में चल रहे नरसंहार और बुलडोज़र चला के लोगों को परेशान करने के लिए भी माफ़ी मांगनी चाहिए.

प्रधानमंत्री के तौर पर सम्मानित

जब प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्हें अरब देशों में व्यक्तिगत सम्मान मिलता है, तो यह समझना चाहिए कि वे वहां देश के प्रधानमंत्री के रूप में जाते हैं, जिसके कारण उनका स्वागत और सम्मान होना लाजिमी है. ये पहले से होता आया है. एक बार पहले प्रधानमंत्री बिन बुलाये पाकिस्तान गए थे, वहां भी उनका स्वागत हुआ ये एक प्रोटोकॉल है. सवाल है कि आप अपने देश की जनता से क्या सुलूक कर रहे हैं? देश में महंगाई और बेरोज़गारी होने के बाद भी हिन्दू मुस्लमान की बात बार-बार ये क्यों लाते हैं? 

बीजेपी के लोग कहते हैं मुसलमानों की जरुरत नहीं है, जबकि मुस्लमान आबादी का 15 से 20 प्रतिशत है. बीजेपी ने सबसे ज्यादा धोखा हिन्दुओं को दिया है. इन सब बातों का सार है कि वो इस चुनाव में एक बार फिर हिन्दू - मुस्लिम को एक मुद्दा बनाना चाहते हैं. लेकिन अब इनकी बातों से हिन्दू और मुस्लिम कोई उत्तेजित नहीं हो रहा. हिन्दू भाई समझ गए हैं कि भड़काना बीजेपी का धंधा है. अब बीजेपी घिर गयी है और बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ रही है.  

चुनाव भर ही बयान

जब प्रधानमंत्री मुसलमानों से कहते हैं, ''आप बीजेपी के दफ्तर जाइये और दिन भर बैठिये. हम देखते हैं आपको कौन निकलेगा..'' ऐसे बयान केवल चुनावों में क्यों आते हैं, चुनावों में तो गधे को भी बाप बोलना पड़ता है. ऑफिस में जाने से क्या हासिल होगा, पूरे देश भर में मुसलमानों की स्थिति देखनी चाहिए. हिन्दुओं में दलित और मुसलमानों में पसमंदा मारे जा रहे हैं. गौरक्षा के नाम पर सबसे ज़्यादा पसमांदा मुस्लिम मारे जा रहे हैं.

जब प्राकृतिक या कृत्रिम आपदा आतीं है तो आर्थिक और शारीरिक रूप से कमज़ोर तबका ही आपदा की चपेट में सबसे पहले आते हैं. इस कारण ही हिन्दू-मुस्लिम बीजेपी को धीरे-धीरे समझ रहे हैं, साथ ही बीजेपी पार्टी के सदस्य तक अब विरोध करने लगे हैं. प्रधानमंत्री की अपील का कोई असर नहीं होगा. ये लोग देश को रसातल में लेकर चले गए. इनसे किस बात की हमदर्दी. आज किस परिवार में 2-4 लड़के बेरोज़गार नहीं हैं, जबकि आज तो लड़कियों को भी नौकरी चाहिए.  दुनिया का सबसे बड़ा सेक्स स्कैंडल करने वाले के लिए वोट मांग रहे हैं,  इन्हे महिलाओं से माफ़ी मांगनी चाहिए. 

बीजेपी में गांधी को देशद्रोही बताने वालों और गोडसे का मंदिर बनाने वाले लोगों की भरमार है. ये लोग गोली मारो ..... जैसे नारे देते हैं.  नूपुर शर्मा ने पैगंबर मुहम्मद पर जो टिप्पणी की क्या उसके बाद दुनियाभर के मुस्लिम इनको माफ़ करेंगे?

दुनियाभर में जब नूपुर शर्मा के बयान का विरोध हुआ तब जाकर बीजेपी ने नूपुर शर्मा को पार्टी से निकाला और अंत में उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. पिछले दिल्ली चुनावों में प्रधानमंत्री कपड़ों से पहचानने की बात कह चुके हैं. आज भी दिल्ली दंगों के कारण सैकड़ों लड़के जेल में बंद हैं. अब प्रधानमंत्री की असली माफ़ी तब होगी, जब वे प्रधानमंत्री की गद्दी से उतरेंगे और हाथ जोड़ कर माफ़ी मांगेंगे अंत में लोग उस माफ़ी को नोटिस करेंगे.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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