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हत्या और बलात्कार के दोषियों का सम्मान करने वाले समाज को आखिर कहां ले जा रहे हैं?

बीते कुछ सालों में हमारे समाज में एक नया चलन शुरु हुआ है, जो देश के कानून का मज़ाक उड़ाने के साथ ही समूचे समाज के मुंह पर भी तमाचा मार रहा है, जिसे  बेहद खतरनाक स्थिति समझना चाहिए. हत्या और बलात्कार जैसे संगीन जुर्म करने वाले दोषियों का सम्मान करके उन्हें जिस तरीके से महिमामंडित करने का सिलसिला शुरु हुआ है, उसका नतीजा ये होगा कि एक आम इंसान खासकर महिलाओं का एक दिन न्याय-व्यवस्था से ही भरोसा उठ जायेगा. दोषियों को सम्मानित करने की इस बेशर्म परम्परा को रोकने की पहल हमारे नेता तो करेंगे नहीं. लिहाजा, देश की सर्वोच्च अदालत के माननीय न्यायाधीशों को ही इस पर विचार करना होगा कि महिमामंडन करने वालों के खिलाफ़ कानून के दायरे में क्या कार्रवाई की जा सकती है, ताकि इस पर लगाम कसी जा सके.

साल 2002 में गुजरात में सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हुई बिलकिस बानो के 11 दोषियों की जेल से रिहाई के बाद फूलमाला पहनाकर और लड्डू खिलाकर उनका स्वागत- सत्कार करने की तस्वीरें तो 15 अगस्त को पूरे देश ने देखीं, लेकिन अब ताजा मामला दिल्ली से सटे नोएडा से सामने आया है. पिछले दिनों श्रीकांत त्यागी का नाम खूब सुर्खियों में रहा था, जिसे कथित रुप से बीजेपी का नेता भी बताया गया. एक महिला से बदसलूकी करने के बाद देशभर के लोगों में श्रीकांत त्यागी के लिए गुस्सा फूटा था. उसकी गिरफ्तारी के बाद लोगों ने नोएडा पुलिस की तारीफ इसलिये की थी कि उसने प्रदेश में बीजेपी की सरकार होने के बावजूद इस मामले में कोई पक्षपात नहीं किया.

हैरानी की बात ये है कि जिस दोषी के लिए समाज में नफ़रत पैदा होनी चाहिये, उसके लिए समर्थन जुटाया जाता है, ताकि दबाव की राजनीति करते हुए उसे बेकसूर साबित कराया जा सके. त्यागी समाज ने श्रीकांत त्यागी के समर्थन में नोएडा में महापंचायत का आयोजन किया, जिसमें कई राज्यों से त्यागी समाज के लोग जुटे हैं. किसान नेता नरेश टिकैत का भी इन्हें समर्थन मिला है. त्यागी समाज का आरोप है कि बीजेपी सांसद महेश शर्मा के कहने पर ही श्रीकांत की पत्नी और अन्य लोगों के खिलाफ गुंडों जैसी कार्रवाई की गई. महापंचायत के मंच से श्रीकांत त्यागी के उन साथियों का भी सम्मान किया गया, जो नोएडा की ओमेक्स सोसायटी में गैर कानूनी रूप से घुसे थे.

दरअसल, इसके जरिये यूपी की योगी सरकार पर दबाव बनाया जा रहा है, लेकिन साथ ही ये उस सोसाइटी में रहने वाली तमाम महिलाओं के लिए भी डराने वाला संदेश है कि एक आरोपी के समर्थन में किस तरह से पूरा समाज एकजुट हो जाता है. ये एक खतरनाक प्रवत्ति है और अगर इसे ऐसे ही बढ़ावा मिलने लगा तो उसे किसी भी सभ्य समाज के लिए शुभ संदेश नहीं माना जा सकता है.

ऐसा नहीं है कि बिलकिस बानो के दोषियों या श्रीकांत त्यागी का सम्मान करने की ये कोई पहली घटना है. इसकी शुरुआत तो साल 2015 में ही ही गई थी, जब ग्रेटर नोएडा के दादरी कांड में अखलाक की हत्या के आरोपी के शव पर तिरंगा रखा गया था. ग्रामीणों ने रविन सिसोदिया नाम के शख्स को शहीद बताते हुए उसके शव पर तिरंगा रखा था और सरकार से एक करोड़ रुपये का मुआवजा मांगा था. बीमारी के बाद किडनी और श्वसन तंत्र फेल हो जाने से उसकी मौत हो गई थी. गांव वालों का कहना था कि रविन और उसके साथ तीन और आरोपियों की जेल में पिटाई की गई थी, जिसके बाद उसे अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां उसकी मौत हो गई. बता दें कि साल 2015 में सितंबर में दादरी में मोहम्मद अखलाक की बीफ खाने के संदेह के आधार पर भीड़ ने पीट-पीटकर हत्‍या कर दी थी.

उसके बाद साल 2017 में झारखंड में हुई मॉब लिंचिंग की एक घटना के आरोपियों को केंद्रीय मंत्री तक ने माला पहनाकर उनका स्वागत किया था. आरोपियों की रिहाई के लिए आंदोलन करने वाले एक पूर्व विधायक ने भी बीजेपी दफ्तर पर ही आरोपियों को जमानत मिलने पर खुशी जताई थी. तब इस पर सियासत भी खूब गरमाई थी. 9 जून 2017 को झारखंड के रामगढ़ में उत्तेजित भीड़ ने मीट व्यापारी अलीमुद्दीन अंसारी की पीट-पीटकर जान ले ली थी. अलीमुद्दीन अपनी वैन से मांस लेकर आ रहा था. वैन में बीफ होने के शक में कुछ लोगों ने उसे पकड़ और पीट-पीट कर मौत के घाट उतार दिया था.

यही नहीं यूपी के बुलंदशहर में हिंसा भड़काने के एक आरोपी की मौत के बाद उसकी मूर्ति लगाकर उसे शहीद बनाने की कोशिश की गई. दरअसल बुलंदशहर के स्याना कोतवाली इलाके में 3 दिसंबर 2018 को कथित गोहत्या को लेकर हिंसा भड़की थी. इस दौरान स्याना थाने के इंस्पेक्टर सुबोध कुमार की हत्या कर दी गई थी. वहीं हिंसा के दौरान गोली लगने से युवक सुमित की मौत हो गई थी. हिंसा मामले में पुलिस ने मृतक सुमित को भी आरोपी बनाया था. सुमित के घरवालों ने चिंगरावठी में ही उसकी मूर्ति लगवाई. हिंसा के एक अन्य आरोपी के जमानत पर जेल से रिहा होने पर लोगों ने फूलमाला से उसका स्वागत किया था.

यही वजह है कि बिलकिस बानो केस में 11 दोषियों को सजा पूरी करने से पहले ही रिहा करने के गुजरात सरकार के फैसले की तीखी प्रतिक्रिया हुई है. सामाजिक, महिला एवं मानवाधिकार सक्रियतावादियों समेत छह हजार से अधिक नागरिकों ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि 2002 के बिलकीस बानो मामले में बलात्कार और हत्या के लिए दोषी करार दिये गए 11 व्यक्तियों की सजा माफ करने के निर्णय को रद्द करने का निर्देश दिया जाए.
करीब दर्जन भर संगठनों की तरफ से जारी सामूहिक बयान में कहा गया है, “हम मांग करते हैं कि न्याय व्यवस्था में महिलाओं के विश्वास को बहाल किया जाए. हम इन 11 दोषियों की सजा माफ करने के फैसले को तत्काल वापस लेने और उन्हें सुनाई गई उम्र कैद की सजा पूरी करने के लिए जेल भेजने की मांग करते हैं.” 

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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