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ब्लॉग: कुंठित इमरान खान को कुछ नहीं सूझ रहा है

पाकिस्तान के पीएम इमरान खान भारत के बढ़ते रसूख के आगे बेचारे नजर आ रहे हैं। उन्हें अब समझ नहीं आ रहा है कि कश्मीर मसले पर आग वे क्या करें

आज का मुद्दा बेहद खास है...क्योंकि आज बात भारत के बढ़ते रसूख की...इस रसूख के आगे बौने साबित होते पाकिस्तान की है। फौज, आईएसआई, आतंकवाद, कश्मीर पर जिस तरह से बारी-बारी इमरान खान गलतियों को कबूल कर रहे हैं...उसने दो चीजें बड़ी साफ कर दी हैं...एक तो ये कि पाकिस्तान को देखने का नजरिया दुनिया को बदलना होगा। दूसरा ये कि इमरान भारत और पीएम मोदी की साख से फ्रस्टेट हो चुके हैं...यानी कुंठित हो गए हैं...बारूद की जिस खेती से पाकिस्तान का मुस्तकबिल लिखा जा रहा था...वो अब उसके गले की फांस बन गया है और इमरान का कबूलनामा उसी बेचैनी का बड़ा सबूत है। कश्मीर का मुद्दा संयुक्त राष्ट्र में उठाने को चूक मानने वाले इमरान की हैसियत मोदी के सामने ही नहीं बल्कि खुद अपने ही मुल्क में क्या है...ये समझना बहुत मुश्किल नहीं है...कश्मीर पर पाक के दावों का दम तो निकल ही चुका है...आतंकवाद के मसले पर भी वो दुनिया में अलग-थलग पड़ चुका है...ट्रंप के इस्लामिक आतंकवाद को लेकर दिए बयान के बाद तो इस्मालिक देशों ने भी पाकिस्तान से दूरी बनानी शुरू कर दी है...ये सारी घटनाएं उसी दौर में हो रही हैं...जब इमरान और मोदी दोनों संयुक्त राष्ट्र की बैठक में शिरकत करने पहुंचे हैं...और भारत के साथ मोदी के कद के आगे इमरान खुद को बौना महसूस कर रहे हैं।

दरअसल जम्मू-कश्मीर के मसले पर पूरी दुनिया में मुंह की खाने के बाद इमरान खान ने ये कबूल कर लिया है कि उनकी हार हुई है। इमरान खान ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कबूल किया कि

उनका मिशन कश्मीर का अभियान नाकाम साबित हुआ है...जम्मू-कश्मीर को लेकर भारत पर दबाव बढ़ाने की मुहिम को कामयाबी नहीं मिली...इस मसले को लेकर कई देशों ने उम्मीद के विपरीत प्रतिक्रियाएं दी हैं.. यही वजह है कि इमरान अंतरराष्ट्रीय समुदाय का समर्थन न मिलने से निराश हैं...इमरान ने दावा किया परमाणु संपन्न देशों के बीच तनाव को भी नजरअंदाज किया गया।

इमरान किस कदर कुंठित हो चुके हैं। इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि...वो अपने झूठ को लेकर खुद अपने मुल्क में बेनकाब होते जा रहे हैं...और उन्हें बेनकाब करने वाले भी उनके मुल्क के ही पत्रकार हैं।

इमरान ने जम्मू-कश्मीर के मसले पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में 58 सदस्य देशों के समर्थन का दावा किया था। इमरान के इस झूठ का खुलासा पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार हामिद मीर ने अपनी रिपोर्ट में किया...जिसमें उन्होंने ऐसे किसी समर्थन को सिरे से नकार दिया । हामिद ने ये भी साफ किया कि समर्थन न होने की वजह से पाकिस्तान UNHCR में अपना प्रस्ताव तयशुदा वक्त पर पेश नहीं कर सका । पाकिस्तान ये प्रस्ताव 19 सितंबर को पेश करने वाला था । इस प्रस्ताव के समर्थन के लिए 47 में से 16 देशों के समर्थन की जरूरत थी । बावजूद इसके दावा पेश न कर पाना बताता है कि पाकिस्तान 16 देशों की मंजूरी भी नहीं जुटा पाया ।

इमरान की हताशा और निराशा की वजह एक नहीं बल्कि कई सारी हैं...मुल्क के अंदरूनी हालात, दिन प्रतिदिन बढ़ता कर्ज का बोझ, आतंकी तंजीमों की तादाद, फौज का बढ़ता दबाव और अंतरराष्ट्रीय संगठनों की तरफ से पाकिस्तान की गिरती साख...ये सब जिम्मेदार हैं...ये बात अलग है कि पाकिस्तान फिर भी खुद को भारत के साथ होड़ में बनाए रखने के लिए हर जिल्लत उठाने को तैयार है...अब तो एफएटीएफ भी उसे ब्लैकलिस्ट करने की तैयारी कर चुका है।

सच तो ये है कि पाकिस्तान आतंकी ढांचे पर काबू पाने में नाकाम रहा है..और टेरिर फंडिंग को भी नहीं रोक पाया है...इतना ही नहीं पाकिस्तान ने FATF के 27 प्वाइंट के टारगेट को भी पूरा नहीं किया है...इसमें से केवल 6 प्वाइंट्स पर ही वो खरा उतर सका है...दरअसल 2018 में एफएटीएफ ने पाकिस्तान को ग्रे सूची में डाल दिया था...और अब उस पर ब्लैक लिस्ट होने का खतरा मंडरा रहा है...अगर पाकिस्तान ब्लैकलिस्ट होता है...तो उसकी मुश्किलें बढ़ना तय है...ऐसे में पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मदद नहीं मिल पाएगी...इस मसले पर अगले महीने एफएटीएफ की बैठक होनी है...और बैठक में पाकिस्तान को लेकर बड़ा फैसला हो सकता है..क्योंकि यूएन की तरफ से घोषित 100 आतंकियों में से पाकिस्तान केवल 5 आतंकी ही खोज सका है।

भारत के अंदरूनी मसले को दुनिया में भुनाने चले और मुंह की खाने के बाद इमरान के इस कबूलनामे और मुश्किलों के बीच कई सवाल खड़े हैं। इन मौकों पर रामधारी सिंह दिनकर की पक्तियां...जिसमें उन्होंने कहा है कि

सहनशीलता, क्षमा, दया को तभी पूजता जग है बल का दर्प चमकता उसके पीछे जब जगमग है।

हिंदुस्तान की बढ़ती साख का आइना दिखाती ये बात, पाकिस्तान शायद ही समझ आए । पाकिस्तान को तो ये भी समझ नहीं है । आतंक, फरेब, और मजहबी नफरत की बुनियाद पर मुल्क की तरक्की के मंसूबे उसी पर भारी पड़े हैं । वहीं हिंदुस्तान न केवल अपने तमाम अंदरूनी मसलों का हल ढूंढने में कामयाब रहा है, बल्कि अपनी कूटनीति कामयाबी की बदौलत न केवल सभी के लिए स्वीकार्य हुआ है, उन्हें अपने हक में झुकने के लिए मजबूर किया है ।

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