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BLOG: देश का गरीब मतदाता पहले भी ठन-ठन गोपाल था, अब भी है

सत्तारूढ़ पार्टी और विपक्ष का दिल गरीबों के लिए धड़क रहा है. चुनावी वादों का पिटारा देश के बीस फीसद गरीब-गुरबा के लिए खोल दिया गया है. कांग्रेस के घोषणापत्र में मतदाताओं को लुभाने के लिए न्यूनतम आय योजना का झुनझुना तो है ही, किसान बजट का सपना भी है. जो किसान कर्ज से दबे हुए हैं, उन्हें भरोसा दिलाया गया है कि अगर जीते तो जबरन कर्ज वसूली नहीं की जाएगी. दूसरी तरफ एनडीए सरकार दो महीने पहले अंतरिम बजट में छोटे और सीमांत किसानों से लुभावने वादे कर चुकी है. पीएम किसान योजना के तहत दो हेक्टेयर से कम जमीन वाले किसानों को हर साल छह हजार रुपए देने का वादा है. ऐसे रूपक अक्सर चुनावों के समय सजाए जाते हैं- कभी दक्षिण में चुनावों से पहले तीन रुपए किलो चावल और चार ग्राम मंगलसूत्र देने का रूपक सजाया जाता था. अब रूपकों का रूप बदल चुका है. हां, यह सभी जानते हैं कि देश के गरीब मतदाताओं को न सत्तर साल की, न पिछले पांच सालों की सरकारी नीतियों से कोई बहुत फायदा हुआ है. वह ठन-ठन गोपाल था, अब भी वैसा ही है.

हमारे देश की दो तिहाई आबादी अब भी गांवों में बसती है और उसका मुख्य पेशा कृषि है. जाहिर सी बात है, इसीलिए देश की कृषि नीति सबसे महत्वपूर्ण है और इसी पर आबादी का एक बड़ा हिस्सा निर्भर करता है. लेकिन पिछले कई वर्षों के दौरान इस दिशा में सबसे कम ध्यान दिया गया है. सरकारी आंकड़े कहते हैं कि 1991 से भारतीय अर्थव्यवस्था अगर 6.8 प्रतिशत की रफ्तार से आगे बढ़ी है तो कृषि जीडीपी की वृद्धि दर सिर्फ 3.15 प्रतिशत है. इसका असर सीधे-सीधे किसानों पर पड़ा है. खेती मुनाफे का पेशा नहीं है. अन्न उगाने वाले, भूखे पेट रहने को विवश हुए हैं. झारखंड के युवा कवि अनुज लुगुन की कविता में हम पहाड़ों, नदियों और गांवों को शहर जाते देखते हैं. यही गांव जब शहरों में बसते हैं तो देश की बीस फीसद गरीब आबादी बनती है. आज अगर राजनीतिक दलों के चुनावी वादों में इसी तबके के टारगेट किया जा रहा है तो हम मानकर चल रहे हैं कि हम इस तबके के लिए सालों-साल कुछ नहीं कर पाए.

अगर पिछले चुनावी वादों का वादाखिलाफी न की गई होती तो भुखमरी और कुपोषण यूं मुंह बाए न खड़े होते. ग्लोबल पावर्टी इंडेक्स में भारत की ऐसी हालत न होती. पिछले साल यूएनडीपी ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण IVके आधार परभारत में गरीबों की हालत पर अपनी रिपोर्ट जारी की थी. उसमें कहा गया था कि 36.4 करोड़ भारतीय लोग अब भी स्वास्थ्य, पोषण, शिक्षा और सैनिटेशन के लिहाज से बहुत अधिक अभावग्रस्त हैं. गरीबी में जीवन जीने वाले आधे लोग 18 वर्ष से कम उम्र के हैं. भारत में 10 वर्ष से कम उम्र के 15.6 करोड़ बच्चे अत्यंत गरीब हैं, यानी हर चार में से एक बच्चा. रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि देश के लगभग सभी राज्यों में गरीबी का सबसे बड़ा संकेतक पोषण की कमी है. परिवार के किसी भी सदस्य का कम से कम छह वर्ष तक की स्कूली शिक्षा न हासिल कर पाना, दूसरा बड़ा संकेतक है. पीने का साफ पानी उपलब्ध न होना और शिशु मृत्य सबसे बाद में आते हैं.

पीठे ठोंकने के लिए अक्सर देश की आर्थिक तरक्की की तरफ ध्यान खींचा जाता है. भारत में कारोबार करना कितना आसान हुआ है, इसके लिए ईज़ ऑफ डूइंग बिजनेस की रैंकिंग का हवाला दिया जाता है. तब भुखमरी के आंकड़ों से नजर फेर ली जाती है. बेशक राजनीति के भरे पेट इस तकलीफ को समझ नहीं पाते. चुनावी वादों को नीतियों में बदलने में कब पांच साल निकल जाते हैं और फिर नए वादे करने का समय आ जाता है.

सिर्फ ऐलान कभी कारगर साबित नहीं होते. लोक-लुभावने ऐलान. चूंकि इसके लिए नीतियों में बदलाव की जरूरत नहीं पड़ती. नीतियां बदलने के लिए ठोस कदम उठाने पड़ते हैं. इसके लिए किसके पास समय है? इसीलिए रुपए-पैसे देने का वादा कर दीजिए. जो वोटर अब तक बैंक खातों में पंद्रह लाख के लतीफों का लुत्फ उठा रहे है, इन डायरेक्ट बेनेफिट ट्रांसफर यानी डीबीटी से खुश हो जाएंगे. यह बात अलग है पीडीएस सिस्टम में डीबीटी की पोल पट्टी पहले ही खुल चुकी है. जिन औरतों के खातों में सबसिडी ट्रांसफर होती है, उन्हें अक्सर इसका फायदा नहीं मिलता. फिर नकद हस्तांतरण बाजार की कीमतों से तालमेल नहीं बैठा पाते जोकि अक्सर उछाल लेता रहता है. राइट टू फूड जैसा अभियान चलाने वाली एक्टिविस्ट और एकैडेमिक दीपा सिन्हा का कहना है कि चाहे वृद्धावस्था पेंशन हो या स्कॉलरशिप्स, कैश बेनेफिट्स के बारे में सोचने पर महंगाई को कभी ध्यान में नहीं रखा जाता.

हर्ष मंदर जैसे एक्टिविस्ट्स तो कैश ट्रांसफर्स पर ही सवाल खड़ा करते हैं. चूंकि बैंकों की उपलब्धता भी एक समस्या है. गांवों में राशन की दुकान तो मिल जाएगी लेकिन बैंक मिलना अब भी एक बड़ी दिक्कत है. वहां तक जाने में समय भी लगता है और आने-जाने का खर्चा भी. 2015 में डीबीटी के पायलट प्रॉजेक्ट के दौरान चंडीगढ़, पुद्दूचेरी और दादरा एवं नगर हवेली में एक स्टडी की गई थी. इस स्टडी को अब्दुल लतीफ जमील पावर्टी एक्शन लैब ने किया था. इसमें कहा गया था कि कैश ट्रांसफर हासिल करने के लिए बैंक जाने और उनसे सामान खरीदने के लिए बाजार जाने में लोगों को ज्यादा खर्चा करना पड़ता है, बजाय इसके कि वे राशन की दुकानों से सामान खरीद लाएं.

चुनावी वादों से कुछ और सवाल भी खड़े होते हैं- इससे सरकारी खजाने पर कितना बोझ आएगा और लाभार्थियों को कैसे पहचाना जाएगा? हमारे यहां लोगों की आय की फुल-प्रूफ लिस्ट और जमीन के रिकॉर्ड्स कहां हैं? इसीलिए वादे करने वाले भी जानते हैं कि वादाखिलाफी की कोई सजा नहीं होती. मतदाताओं की स्मृति पांच साल बाद धुंधली हो जाती है, तब तक नए वादे और सपने तैयार कर लिए जाते हैं. क्या लोकसभा में अपने प्रतिनिधियों को चुनते समय हम सालों पहले की स्मृतियों पर पड़ी धूल को साफ करेंगे या नए सपनों के भुलावों में पड़ जाएंगे?

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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