नीतीश कुमार का मातृ शक्ति वंदन अभियान अभी से ही असर दिखा रहा है, बढ़ सकती है बिहार में भाजपा की मुश्किलें

पूरा भारत जिस वक्त मातृ शक्ति वंदन में व्यस्त था, ठीक उसी वक्त बिहार में एक नया इतिहास रचा जा रहा था. एक साथ सवा लाख से अधिक शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया ठीक दुर्गा पूजा के बीच जारी थी. इसमें भी तकरीबन आधी संख्या महिलाओं की. बिहार के हर जिला में स्थित डायट या किसी ऐसे ही केंद्र पर रोजाना सैकड़ों की संख्या में लड़कियां, महिलाएं शिक्षक भर्ती के लिए काउंसिलिंग लाइन में खड़ी दिख रही थी. सब के चेहरे पर अद्भुत खुशी, उत्साह, आत्मसंतोष, गर्व की भावना. बहरहाल, यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि मोदी जी का मातृ शक्ति वंदन क़ानून (विधायिका में महिला आरक्षण) जब असर दिखाएगा तब दिखाएगा लेकिन नीतीश कुमार के मातृ शक्ति वंदन अभियान ने गजब असर दिखाया और वह भी ऐन मातृ शक्ति वंदन उत्सव के दौरान ही दिखाया.
आधी आबादी, पूरी हिस्सेदारी
इसे एक उदाहरण से समझते हैं. पूर्वी चंपारण बिहार का दूसरा सबसे बड़ा जनसंख्या वाला जिला है. संजय कुमार, पूर्वी चंपारण के जिला शिक्षा पदाधिकारी है. इन पंक्तियों के लेखक से बातचीत में संजय कुमार कहते हैं कि पूर्वी चंपारण में शिक्षकों का कुल आवंटन 4239 है, जिसमें से तकरीबन 45 फीसदी संख्या महिलाओं की है. कमाल की बात यह है कि इन महिलाओं में अविवाहित, विवाहित, गर्भवती महिलाएं, अन्य राज्यों मसलन यूपी, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, झारखंड से आने वाली महिलाएं भी शामिल हैं और ये सब काउंसिलिंग के लिए सेंटर्स तक पहुँच रही थी. जाहिर हैं, उन्हें कुछ दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा होगा, फिर भी नौकरी पाने की खुशी के आगे ये समस्याएँ छोटी पड़ती जा रही थी. संजय कुमार के मुताबिक़, अकेले पूर्वी चंपारण केंद्र पर उत्तर प्रदेश से कम से कम 100 लड़कियां काउंसिलिंग के लिए आ चुकी थी. बहरहाल, एक जिले के इस आकडे को आप चाहे तो पूरे बिहार के लिए भी लागू कर सकते है. इसकी वजह यह है कि बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने सरकारी नौकरी में महिलाओं को अभी सीधा 35 फीसदी आरक्षण सुविधा दिया हुआ है. इस नीति का असर सिपाही भर्ती में भी दिखा था, जिसके बाद आज बिहार पुलिस में महिला सिपाहियों का प्रतिनिधित्व (संख्या/अनुपात) देश में सर्वाधिक है.
नीतीश नीति का असर?
हालांकि, यह कहना कि सिर्फ आरक्षण ही वह वजह है जिसके कारण बिहार में सरकारी नौकरियों में महिलाओं की संख्या बढ़ी है, महिला शक्ति को कम आंकना होगा. नीतीश कुमार ने किसी एक नीति या योजना के जरिये महिलाओं को सशक्त बनाने का काम नहीं किया बल्कि उनका यह प्रयास बहुआयामी हैं. मसलन, सरकारी स्कूलों में बालिकाओं को साइकिल-ड्रेस आदि बांटने की जब शुरुआत हुई थी तब इस पर किसी का विशेष ध्यान नहीं गया था. लेकिन, नीतीश कुमार की ये नीतियाँ दूरगामी परिणाम वाली साबित हुई हैं. बिहार में पिछले 18 सालों के दौरान, जिस तरह से सभी वर्गों की महिलाओं को पंचायती राज संस्था (50 फीसदी आरक्षण) से ले कर शिक्षक, नर्सेज आदि जैसी सरकारी नौकरियों में भागीदारी हासिल हुई हैं, उससे एक किस्म की सामाजिक क्रान्ति (भले अभी वह दिख न रही हो) भी हुई है. आमतौर पर एक सामंती और पितृसत्तात्मक समाज माना जाने वाला बिहार आज बहुत हद तक बदल चुका है. मानसिकता में एक महीन बदलाव आपको दिखेगा, बशर्ते आप देखना चाहे. अन्यथा, 20-25 साल पहले किसी सामान्य जाति के घर की महिला का अकेले घर से निकल कर 40-50 किलोमीटर दूर जा कर नौकरी कर पाना संभव नहीं था. न समाज वैसा था, न सरकार वैसी थी. लेकिन अब वक्त बदला है, समाज बदला है और इसमें सरकार की नीतियों ने निश्चित तौर पर कैटलिस्ट (उत्प्रेरक) का काम किया है, जो इस वक्त के परिणाम में भी बढ़ती महिला हिस्सेदारी के तौर पर दिख रहा है. जिला शिक्षा पदाधिकारी संजय कुमार भी मानते हैं कि सरकार की नीतियों का असर इस बार के परिणाम पर दिख रहा है. वह कहते हैं, आज महिलाएं आत्मनिर्भर बनने को ले कर काफी गंभीर है और अन्य राज्यों या जिलों से भी आ कर, कष्ट झेलते हुए भी ये महिलाएं अपनी भागीदारी सुनिश्चित करना चाह रही है. जाहिर है, आगे मिलने वाली आर्थिक आजादी, आत्मगौरव के बोध से आगे आज की ये छोटी-मोटी दिक्कतें कुछ भी नहीं है.
ईडब्लूएस: कास्ट सर्वे से क्या डर?
बिहार की मौजूदा शिक्षक भर्ती प्रक्रिया के एनालिसिस से एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया है, जिसे हाल ही में जारी कास्ट सर्वे (जाति जनगणना) से अगर जोड़ कर देखा जाए तो मामला और स्पष्ट होगा. ईडब्लूएस कोटे के तहत सीधे 10 फीसदी शिक्षकों का चयन किया गया. तकरीब 12 हजार से अधिक. इसके अलावा, जनरल कैटेगरी में भी ठीकठाक संख्या में सामान्य श्रेणी के उम्मीदवारों का चयन (रैंडम जानकारी के आधार पर, पुष्ट डाटा अभी आना है) हुआ है. फिर अन्य राज्यों के 14 हजार जिन उम्मीदवारों का सेलेक्शन हुआ है, उनका सेलेक्शन भी जनरल कैटेगरी में ही हुआ है. इस हिसाब से अगर आप देखेंगे तो जनसंख्या के अनुपात में सामान्य श्रेणी का प्रतिनिधित्व कहीं से भी कम नहीं बल्कि कुछ ज्यादा ही माना जाएगा. अब सवाल है कि यह कैसे संभव हुआ? ऐसा इसलिए कि यह श्रेणी शिक्षा पाने, प्रोफेशनल डिग्री पाने आदि के मामले में पहले से आगे रहा है. हालांकि, अन्य समाज भी अब धीरे-धीर जागरूक हो रहा है, उसकी भी हिस्सेदारी अब बढ़ती जा रही है आगे और बढ़ेगी और बढ़नी भी चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में सामाजिक संतुलन न हो तो वह समाज कभी भी लंबे समय तक समरसता के साथ टिक नहीं पाएगा. तो बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा जारी शिक्षक परिणाम को इस नजरिये से भी देखा जाए कि समा के किसी भी एक वर्ग को किसी अभी अन्य वर्ग से न डरने की जरूरत है, न डराने की जरूरत है.
बहरहाल, नीतीश कुमार ने यह भलीभांति साबित कर दिया है कि बिहार इस वक्त मातृ शक्ति वंदन अभियान का ब्रांड एंबेसडर बन चुका है. मोदी जी के विधायिका में महिला आरक्षण क़ानून को अभी प्रभाव में ही आने में कुछ साल लगेंगे लेकिन नीतीश कुमार का मातृ शक्ति वंदन अभियान बिहार में धूम मचा रहा है या यह भी कह सकते है कि जिस तरह से देश के अन्य राज्यों के 14 हजार पुरुषों-महिलाओं को भी बिहार में नौकरी पाने का अवसर नीतीश कुमार ने दिया है, उससे उनका “मातृ शक्ति वंदन” मॉडल न सिर्फ राष्ट्रव्यापी बन गया है बल्कि मोदी मॉडल से कहीं आगे निकल चुका है.
[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ़ लेखक ही ज़िम्मेदार हैं.]






























