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ठाकरे परिवार के लिए आखिर इतना अहम क्यों बन गया है मुंबई का शिवाजी मैदान?

मुंबई का ऐतिहासिक शिवाजी मैदान दशहरा रैली को लेकर शिव सेना के दो गुटों के बीच अब राजनीति का नया अखाड़ा बन गया है. उद्धव ठाकरे की अगुवाई वाली शिवसेना गुट की धमकी के बाद अब यह मसला कुछ ज्यादा नाजुक होता दिख रहा है.

ठाकरे गुट वाली शिवसेना ने साफ कह दिया है कि वह पार्टी की वार्षिक दशहरा रैली शिवाजी पार्क मैदान में ही करेगी, चाहे बृहन्मुंबई नगर निगम (बीएमसी) अपनी मंजूरी दे या नहीं. जबकि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के गुट वाली शिव सेना भी उसी दिन इसी मैदान पर रैली करने पर अड़ी है. गेंद अब बीएमसी के पाले में है लेकिन मामला इतना पेचीदा है कि इस पर फैसला लेना इतना आसान भी नहीं है क्योंकि जो भी फैसला होगा, वह दूसरे गुट को नामंजूर होगा. इसलिये 5 अक्टूबर यानी दशहरे वाले दिन मुंबई में कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने की आशंका भी जताई जा रही है. 

दरअसल, उद्धव ठाकरे गुट के लिए शिवाजी मैदान का राजनीतिक महत्व होने के साथ ही भावनात्मक जुड़ाव भी है. शिवसेना अपनी स्थापना के समय से ही इस मैदान में दशहरा रैली कर रही है और सेना प्रमुख दिवंगत बाल ठाकरे ने अनेकों बार यहीं से अपने शिव सैनिकों को संबोधित करने में नई हुंकार भरी है. दशहरा रैली के मंच से ही बाल ठाकरे ने अपने पोते आदित्य ठाकरे को साल 2010 में राजनीति में लॉन्च किया था. तब सेना सुप्रीमो ने अपने पोते को तलवार भेंट करते हुए शिवसैनिकों से आदित्य की देखभाल करने का आग्रह भी किया था. 

नवंबर 2012 में जब बाल ठाकरे की मृत्यु हुई, तो उनका अंतिम संस्कार शिवाजी पार्क में उसी स्थान पर किया गया,  जहां उनकी दशहरा रैली का मंच बनाया जाता था.  अब उनका स्मारक मैदान के पश्चिमी दिशा वाले एक हिस्से में है. जबकि पूर्व दिशा में, उनकी दिवंगत पत्नी मीनाताई ठाकरे की एक प्रतिमा स्थापित है,  जिन्हें शिवसैनिक मां साहेब कहते हैं.

साल 2019 में जब उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने,  तो उन्होंने शपथ ग्रहण के लिए शिवाजी पार्क को ही चुना था. लिहाज़ा ठाकरे परिवार के लिए ये मैदान न सिर्फ शिव सेना के सियासी सफ़र का सबसे बड़ा गवाह रहा है, बल्कि यहां की मिट्टी से भी परिवार का एक अलग तरह का भावनात्मक जुड़ाव है. 

बाल ठाकरे के निधन के बाद उनके बेटे उद्धव ठाकरे  ने दशहरा रैली की परंपरा को जारी रखा लेकिन इस बार एकनाथ शिंदे गुट ने इस पर अपना दावा ठोककर अड़ंगा डालने की कोशिश की है. लेकिन उद्धव ठाकरे भी अपनी जिद पर अड़े हुए हैं और उनके तेवरों से लगता नहीं कि वे पीछे हटने वाले हैं. 

मुंबई के पूर्व महापौर मिलिंद वैद्य के नेतृत्व में शिवसेना नेताओं के एक प्रतिनिधिमंडल ने मंगलवार को नगर निकाय के अधिकारियों से मुलाकात कर रैली आयोजित करने की अनुमति देने के लिए उनके आवेदन की स्थिति के बारे में पूछताछ की.  उन्होंने कहा कि हमें अनुमति मिले या नहीं,  हम शिवाजी पार्क में एकत्र होंगे.  प्रशासन को या तो हमें अनुमति देनी चाहिए या मना कर देना चाहिए.  हम (शिवाजी पार्क में रैली करने के लिए) अपने फैसले पर बहुत दृढ़ हैं.  

उन्होंने साफ़ लहजे में कह दिया है कि, "अगर हमें कोई जवाब नहीं मिला, तो बालासाहेब की शिवसेना कार्यकर्ता दशहरा रैली के लिए शिवाजी पार्क में इकट्ठा होकर ही रहेंगे. " हालांकि बीएमसी ने फिलहाल इस मुद्दे पर कोई फैसला नहीं लिया है.

दोनों गुटों ने एक विकल्प के तौर पर बांद्रा कुर्ला कॉम्प्लेक्स (बीकेसी) के एमएमआरडीए मैदान में भी रैली करने की अनुमति के लिए आवेदन किया है. वैसे पिछले हफ्ते शिंदे गुट को बीकेसी में रैली करने की मंजूरी मिली गई है, इसलिये बीएमसी को अब उद्धव ठाकरे गुट को शिवाजी मैदान में रैली की अनुमति देने में कोई एतराज नहीं होना चाहिए. 

लेकिन मुंबई के सियासी गलियारों में चर्चा है कि मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे गुट के लिए अब ये नाक की लड़ाई का सवाल बन गया है और वह किसी भी सूरत में नहीं चाहता कि ठाकरे गुट को यहां रैली करने की इजाजत मिले. इसके लिए राज्य सरकार के एक पुराने आदेश को सियासी हथियार बनाया जा रहा है. 

बता दें कि महाराष्ट्र सरकार के 20 जनवरी 2016 को जारी किए गए एक शासनादेश के अनुसार शिवाजी पार्क को बीएमसी साल में 45 दिनों के लिए विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए दे सकती है. मजे की बात ये है कि इस शासनादेश में रावण दहन की अनुमति तो है, लेकिन दशहरा रैली का कोई जिक्र नहीं है. इसलिये अब देखना ये है कि नाक की इस लड़ाई में आख़िर जीत किसकी होती है?

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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