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BLOG: राष्ट्रवाद बनाम जातिवाद की लड़ाई में बौने हुए मूल मुददे

प्रधानमंत्री की रैलियों में भी अब न तो उज्जवला की बात होती है और न ही मुद्रा योजना की. नोटबंदी का तो जिक्र तक नहीं होता. यहां तक कि स्वच्छता अभियान को भी एक आध वाक्य में ही निपटा दिया जाता है

पिछले दस दिनों में चुनाव बदल सा गया है. जहां-जहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला हो रहा है वहां-वहां यह बदलाव ज्यादा नजर आ रहा है. राष्ट्रवाद पर बीजेपी पूरी तरह से फोकस हो चुकी है. प्रधानमंत्री की रैलियों में भी अब न तो उज्जवला की बात होती है और न ही मुद्रा योजना की. नोटबंदी का तो जिक्र तक नहीं होता. यहां तक कि स्वच्छता अभियान को भी एक आध वाक्य में ही निपटा दिया जाता है. प्रचार में जोर पाकिस्तान, परमाणु बम, आंतकवाद, मसूद अजहर पर दिया जा रहा है. प्रधानमंत्री की तरफ से फिर सर्जीकल स्ट्राइक को जोर शोर से उठाया जाने लगा है. यहां तक कि कांग्रेस को भी मोदी ने उनकी पिच पर आने को मजबूर कर दिया है. कांग्रेस अपने समय की सर्जीकल स्ट्राइक को गिनाने लगी है. न्याय की बात कम करने लगी है. कांग्रेस को जहां किसान के दर्द और नौजवानों की नौकरी पर जोर देना चाहिये था वह कभी राफेल के पीछे भागती है तो कभी अपने समय की सर्जीकल स्ट्राइक गिनाने लगती है. कुल मिलाकर पूरा चुनाव राष्ट्रवाद बनाम जातिवाद हो गया है. क्षेत्रीय दलों के राज्यों में जरुर राष्ट्रवाद क्षेत्रीय दलों के क्षत्रपों के व्यक्तिगत करिशमें के आगे दबा दबा सा नजर आता है लेकिन राजस्थान जैसे राज्यों में राष्ट्रवाद उभार पर है जहां कांग्रेस से ही बीजेपी को भिड़ना है.

इस बार के चुनाव में विपक्ष का सबसे बड़ा नारा रहा है चौकीदार चोर है. कांग्रेस के राहुल गांधी ने इसे उठाया और यह नारा ममता बनर्जी की रैलियों तक में लग रहा है. बीजेपी ने पहले इस नारे की उपेक्षा की लेकिन जब उसे लगा कि नारा जनता के बीच चला गया है तो मोदी अमित शाह की जोड़ी ने मैं भी चौकीदार तू भी चौकीदार सारा देश चौकीदार के गाने गाने शुरु कर दिए. यह उसी तरह था जिस तरह पाकिस्तान के बालाकोट में घुसकर मारना. कांग्रेस की पिच पर मोदी खुद को चौकीदार बताते हुए लाव लश्कर के साथ उतर पड़े. बीजेपी ने इसके साथ ही रुके नहीं झुके नहीं का नारा भी काम में लेना चाहा लेकिन यह जुबान पर नहीं चढ़ा. अलबत्ता आएगा तो मोदी ही का नारा खुद मोदी ने अपनी रैलियों में बुलंद करना शुरु किया जो काम करता नजर आ रहा है. पिछले साल राजस्थान,छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनावों में हार के बाद भले ही कांग्रेस ने किसानों नौजवानों के मुद्दे को जिताउ मुद्दे के रुप में लिया हो लेकिन बीजेपी ने इसे गंभीरतापूर्वक लिया. अब रोजगार तो रातोंरात खड़े नहीं किये जा सकते थे लिहाजा किसानों को छह हजार रुपये साल के देने की शुरुआत दो दो हजार की किश्त के रुप में की. बीजेपी जानती थी कि इससे भी काम चलने वाला नहीं है.

तो अंत में राष्ट्रवाद को ही भुनाने जा रही है बीजेपी. प्रधानमंत्री के प्रचार में पाकिस्तान, परमाणु बम का जिक्र ज्यादा हो रहा है. पानी का कम. यह बात बाड़मेर, जोधपुर जैसे इलाकों में ज्यादा शिद्दत से महसूस की गयी जहां पानी बड़ा मुददा है. राष्ट्रवाद काम भी कर रहा है. अब राष्ट्रवाद जातिवाद को कितना और किस हद तक तोड़ पाएगा यह कहना मुश्किल है लेकिन बहुत सी सीटों पर जातिवाद के गणित में पिछड़ती बीजेपी राष्ट्रवाद की धमक और मोदी नाम की कैमेस्ट्री से गेम में आती दिख रही है. लेकिन यहां एक पेंच है. आमतौर पर जो लोग मोदी को वोट देने की बात कर रहे हैं उनमें से ज्यादातर ऐसे हैं जो पिछली बार भी मोदी को वोट दे चुके हैं. बहुत कम ऐसे लोग मिलते हैं जो पिछली बार मोदी को वोट देने और इस बार नहीं देने की बात करते हैं . ऐसे लोग तो और भी कम मिलते हैं जिन्होंने पिछली बार मोदी को वोट नहीं दिया था और इस बार देने का इरादा रखते हैं. लेकिन एक बात हैरान करती है. जहां जहां कांग्रेस और बीजेपी के बीच सीधा मुकाबला है वहां अगर लोग उनकी लोकसभा सीट पर कांग्रेस की जीत की बात करते हैं तो साथ में यह भी जोड़ देते हैं कि यहां भले ही कांग्रेस हो लेकिन दिल्ली में तो मोदी ही जीतेगा . यानि कांग्रेस को वोट देने वालों को भी कांग्रेस देश में जीतती नजर नहीं आ रही है. जिस तरह बीजेपी के समर्थक मोदी मोदी करते हैं उस तरह कांग्रेस समर्थक राहुल राहुल नहीं करते . एक अन्य बात देखने को मिली कि महिलाओं में मोदी को लेकर ज्यादा जोश नजर आता है. गांव में जिनको प्रधानमंत्री आवास योजना में घर मिला वह महिलाएं जवाब देने से पहले घर को निहारती हैं और फिर मोदी मोदी कह हल्के से मुस्करा देती हैं .

जो लोग मोदी को वोट देने की बात करते हैं उनके एक जैसे तर्क हैं. एक, मोदी ने पाकिस्तान को सबक सिखाया. दो, पांच साल काम करने के कम होते हैं फिर मौका मिलना चाहिए . तीन, कांग्रेस से तो अच्छा काम कर ही रहे हैं. चार, दुनिया में देश का मान बढ़ाया है. पांच, मोदी सरकार चली गयी तो पाकिस्तान हावी हो जाएगा. छह, विकास किया है. यह ऐसे लोग हैं जो मोदी के खिलाफ एक शब्द नहीं सुनते और तर्क कुतर्क तक पर उतर आते हैं. अगर ठेठ गांव देहात की बात करें तो लोग गैस देने मकान देने की बात करते हैं लेकिन हैरानी की बात है कि आयुष्मान योजना का कोई जिक्र नहीं करता. गैस कनेक्शन में भी सिलेंडर महंगा होने के कारण रिफिल की समस्या आम समस्या है. मुद्रा योजना की बात करें तो लोग कहते हैं कि बैंक बाबू कर्ज देने में बहुत आनाकानी करते हैं. वैसे बहुतों ने मुद्रा योजना का नाम ही नहीं सुना है. स्वच्छता अभियान के तहत गांव गांव में शौचालय बने तो दिखते हैं लेकिन लोग 12 हजार रुपये के एवज में तीन चार हजार रुपये रिश्वत में देने की बात करते हैं. घटिया सामग्री का इस्तेमाल होने की बात करते हैं.

किसान साफ साफ नाराज दिखता है. अपनी राज्य सरकार से भी और मोदी सरकार से भी. फसल का दाम सही नहीं मिलता , लागत तक नहीं निकल पाती, फसल बीमा योजना में धोखा है, कर्ज माफी छलावा है, साल के छह हजार रुपये नाकाफी हैं. अगर आप किसानों को मोदीजी के 2022 तक किसानों की आय दुगुना करने के वायदे के याद दिलाओ तो आमतौर पर किसान हंस पड़ते हैं. आमतौर पर जवाब होता है कि मोदी दिल्ली में रहते हैं उनको क्या पता कि कैसे खेती की जाती है. आवारा गाय बैल सांड से भी किसान परेशान और लाचार नजर आते हैं. लेकिन तमाम परेशानियों के बावजूद किसानों का एक हिस्सा फिर से मोदी की बात करता है. यह वो किसान है जो मोदी के राष्ट्रवाद से प्रभावित हैं. इसी तरह बेरोजगार नौजवान गुस्से में दिखता है. मोदी को वोट नहीं देने की बात भी करता है. ऐसे नौजवानों में राष्ट्रवाद कम ही नजर आता है. यह बीजेपी के लिए खतरे की घंटी हो सकता है.

पांच राज्यों में जितना देखा जितने लोगों से बात हुई उसके आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना बहुत मुश्किल है. जहां जातिगत समीकरण हावी हैं वहां राष्ट्रवाद काम नहीं कर रहा है. जहां मुस्लिम तीस फीसद या उससे ज्यादा है और बंटवारा नहीं हो रहा है वहां वहां भी राष्ट्रवाद काम करता दिख नहीं रहा है. अब कितनी सीटें राष्ट्रवाद के खाते में जाएंगी कितनी जातिवाद के खाते में और फंसी हुई सीटों में से ज्यादा जीतने वाला कौन सा दल होगा.इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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