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ऐसा प्यार कैसा प्यार, जैसा तैसा वैसा प्यार जो कर सकता है बीमार!

फ़रवरी का महीना मतलब गुनगुनी धूप और प्रकृति पर बासंती सौंदर्य का खुमार, साथ में वैलेंटाइन डे का आगमन! वैलेंटाइन डे या प्रेमदिवस वैसे तो पश्चिमी सभ्यता का त्यौहार है मगर विश्व के पूर्वी हिस्सों में भी अब इसकी पैठ गहराती जा रही है. चीन में यह दिन 'नाइट्स ऑफ सेवेन्स' और जापान व कोरिया में इस पर्व को 'वाइटडे' के नाम से जाना जाता है. भारत भी इससे अछूता नहीं है. कुछ दशकों से भारत में भी यह दिन पर्व के रूप में ही मनाया जाने लगा है. हालांकि पिछले कुछ सालों में इसका दायरा शहरी क्षेत्रों के अलावा ग्रामीण इलाकों में भी बढ़ा है. आशंकाओं, अंदेशाओं, आरोप-प्रत्यारोप, संस्कृति क्षरण– संरक्षण के बीच यह दिन खूब सुर्ख़ियों में रहता है.

वैलेंटाइन डे के असल मायने

वैसे तो इसकी शुरुआत संत वैलेंटाइन के शहादत से हुई थी परंतु आज हम इस पर्व का वास्तविक मायना भूल गए हैं. रोम में तीसरी सदी में सैनिकों और अधिकारियों के विवाह पर पाबंदी था. इस तानाशाही के पीछे यह मानसिकता थी कि विवाह पुरुषों का ध्यान, धैर्य, शक्ति और पुरुषार्थ को कम करता है. संत ने इसकी खिलाफत की और विवाह को प्रोत्साहन दी. वैलेंटाइन का मानना था कि स्त्री –पुरुष के बीच विवाह सम्बन्ध मजबूती देता है साथ ही सामाजिक ढाँचे के सुचारू रूप के लिए विवाह आवश्यक है. स्त्री-पुरुष के स्वतंत्र संबंधों की बजाय सामाजिक बंधन में बाँधने की विचारधारा संत के लिए कालमुखी बनी और उन्हें 14 फ़रवरी को मृत्युदंड दिया गया. अगर हम इसके वास्तविक स्वरुप को समझे तो यह शहादत विवाह के बहाने प्रेम की सुदृढ़ता को स्थापित करने के लिए दिया गया था. मगर शायद आज यह उत्सव अपने मूल से इतर स्त्री –पुरुष के सामाजिक बंधन मुक्त स्वरुप की ओर अग्रसित हो गया है.


ऐसा प्यार कैसा प्यार, जैसा तैसा वैसा प्यार जो कर सकता है बीमार!

सांसारिक बंधनों का आधार प्रेम है. स्त्री–पुरुष के बीच का प्रेम एक ऐसा बंधन है जो तन्मयता, समर्पण और तारम्यता स्थापित होने पर अलौकिक हो जाता है. इसमें दिखावे की जरुरत नहीं है. परंतु मानवीय स्वभाव प्रशंसा और दुलार ढूंढ़ता है. आज के भौतिक युग में हमारे लिए संवेदनाओं की महत्ता कम होती जा रही है. विशेषकर शहरी इलाकों में स्वयं को स्थापित करने के चक्कर में हम कहीं न कहीं रिश्तों को पीछे छोड़ते चले जा रहे हैं. एकल परिवारों में जहाँ पति–पत्नी दोनों जॉब में हैं वहाँ तो इतना समयाभाव है कि मानवीय सम्बन्ध और एहसास भी आपा–धापी की बलि चढ़ रहे हैं. ऐसे में वैलेंटाइन डे के दिन जीवनसाथी या प्रेमी– प्रेमिका को ‘विशेष’ जताने में कोई बुराई नहीं है. बशर्ते यह दिखावे और आधुनिकता के ढोंग और से परे हो. ‘जताना मात्र’ प्रेम नहीं मगर कभी–कभी ‘प्रेम जताना’ भी जरुरी होता है. आपसी रिश्तों में प्रगाढ़ता आती है, एक नयापन का अनुभव होता है. रोजमर्रा के नियमित दैनिंदनी से अलग हट कर कुछ अलग करना हमेशा नई ऊर्जा और स्फूर्ति देता है.

इस जमाने में, प्रेम के नाम पर...

मगर आधुनिक युग में संवेदानों और प्रेम की नवीन परिभाषा को स्वार्थ की चाशनी में डुबोकर परोस दिया जा रहा है. प्रेमी–युगल का आधुनिकता के नाम पर अश्लीलता सही नहीं है. बाज़ारवाद के बहाव में बह जाना भी गलत है. दूसरी ओर धर्म–संस्कृति के रक्षा के नाम पर फतवे ज़ारी करना, लात-घूंसे–डंडे बरसाना और गालियां देना भी सरासर गलत है. प्रेम के नाम पर छलावा, धोखा, हिंसा, दबाव और यहाँ तक कि धर्म परिवर्तन और हत्या तक को कर गुजरना कुछ भी हो सकता है, प्रेम तो कदापि नहीं!

हाल में ही पिछले साल अक्टूबर महीने में बरेली फास्ट ट्रैक कोर्ट ने धोखे से नाम और पहचान बदलकर हिन्दू लड़की से विवाह, बार-बार बलात्कार, अश्लील विडिओ वायरल करने की धमकी देकर इस्लाम अपनाने के दबाव पर सख्त टिप्पणी करते हुए इसे लव जिहाद की संज्ञा दी थी और प्रेम के नाम पर ऐसे धोखा धड़ी में विदेशी फंडिंग होने तक की बात कहने से गुरेज़ नहीं किया था. पागलपन को प्रेम के स्वरूप का नाम देकर अस्तित्व तक बदल देने की बात के अलावा ऐसे कई मामले अब रोज ही अखबारों के सुर्खियां बन रहें जहां पति-पत्नी ‘नये नवेले तथाकथित प्रेम’ के चक्कर में एक- दूजे की हत्या तक कर दे रहे हैं. अभी 6 वर्ष पहले दिल्ली का एक मामला खूब सुर्खियों में था जब एक मां ने अपनी 6 साल की बेटी को इसलिए मार दिया क्योंकि उसने उसे अपने प्रेमी के साथ देख लिए था. बीते वर्षों 14 फ़रवरी को जब पूरी दुनिया वैलेंटाइन डे के जश्न में था, माहौल में प्रेम और उल्लास घुला था, उस समय कुछ लोग ऐसे भी थे जिन पर प्रेम के नाम पर ऐसा पागलपन और जुनून सवार था| गाज़ियाबाद में भरे बाज़ार में शाम 5 बजे एक सनकी आशिक ने शादी-शुदा लड़की पर फरसे से 12 वार किए| लड़की की शादी अभी बीते अप्रैल में ही हुई थी और वो मायके परीक्षा देने आई थी| लड़का कुछ दिनों से लड़की के पीछे पड़ा था और बात सिर्फ छेड़-छाड़ तक सीमित नहीं थी| उसने कई बार लड़की को जान से मारने की धमकी भी दी थी जिसकी शिकायत लड़की ने थाने में की थी| मगर गिरफ्तारी के कुछ दिनों बाद ही लड़का रिहा हो गया था.

प्यार के नाम पर हत्या! 

ऐसी ही एक घटना राजस्थान से भी सुनने को मिली थी जहां मॉल में घुसकर एक सनकी ने लड़की पर तेज़ाब फेंक दिया.लड़की ने निकाह के लिए मना किया था और लोगों के अनुसार दोनों पहले से शादी-शुदा भी थे. यहां भीड़ ने स्तब्धता नहीं दिखाई और आरोपी को वही धर दबोचा और लड़की की जान बच गई|

अगर किसी ने प्रेम संबंधों से इंकार किया या कोई कई वजहों से मौजूदा संबंधों से बाहर निकलना चाहता है तो इसे अपने अहं पर चोट के तौर पर क्यों लिया जाना चाहिए? दरअसल, प्रेम को जीने के एक तरीके के रूप में नहीं बल्कि उद्देश्य के रूप में देखा जाने लगा है जिसे साधा न गया तो जीवन अर्थहीन होने लग रहा है. प्रेम में असफलता या एकतरफा प्रेम युवाओं की समझने-विचारने की शक्ति को पूरी तरह क्षीण करती दिखाई दे रही है. प्रेमी या तो आत्महत्या कर ले रहे हैं या सामने वाले को ऐसी चोट पहुंचा दे रहे हैं जिससे उनकी इहलीला समाप्त हो जा रही है या आजीवन असाध्य दर्द और घाव के साथ जीने को विवश हो जा रहे हैं .

ईश्वर की सबसे अनुपम रचना मानव और मानव का सबसे उत्तम भाव प्रेम! प्रेम जो सदियों से इंसान को परिवार, समाज और रिश्तों में बांधते आ रहा है| यह ऐसा समर्पण है जिसमें इंसान अपने स्वार्थ और अहं की आहुति देकर रिश्ते और संबंधों को सींचता है| प्रेम त्याग और समर्पण का दूसरा नाम है. इसे अपने मतलब के हिसाब से जीना अनुचित ही नहीं असमाजिक भी है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.] 

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