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भारत में बीथोवन की कल्पना करना

आम तौर पर यह माना जाता है कि वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक के लिए भारत में कोई स्वागत योग्य जमीन इसलिए उपलब्ध नहीं हो सकी कि इसके अपने “शास्त्रीय संगीत” की परंपराएं अथाह गहरी हैं.

यह लुडविग वान बीथोवन की 250वीं जयंती का महीना है. सामान्य दिनों में जर्मनी, ऑस्ट्रिया और यूरोप के बाहर की दुनिया का एक बड़ा हिस्सा भी जश्न में डूबा होता, जैसा कि संगीत जगत के कुछ हिस्सों में बीथोवन की ही तरह प्रतिष्ठित ऑपेरा संगीतकार ज्यूसेपे वेरदी ने उल्लेख किया है- “बीथोवन के नाम के आगे हम सभी को श्रद्धा से सिर झुकाना चाहिए.“ हालांकि, भारत में कोरोना वायरस महामारी की अनुपस्थिति में भी कोई हलचल मचने वाली नहीं थी. बीथोवन का नाम भारतीयों ने खूब सुन रखा है और इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक को पसंद करने वालों की एक बड़ी संख्या भारत में मौजूद है. यहां तक कि आज से लगभग 50 साल पहले भारत सरकार ने बीथोवन के सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया था. लेकिन यह एक असंदिग्ध तथ्य है कि पिछले दशकों के दौरान वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक पर पकड़ मजबूत करने वाले चीन, कोरिया और जापान की तरह भारत में इस तरह के संगीत का कभी कोई बहुत बड़ा दायरा नहीं रहा. कुछ साल पहले जर्मन वॉयलिन वादक विक्टोरिया एलिजाबेथ कौंज़नर ने लिखा था- “सियोल फिल्हार्मोनिक में शोस्ताकोविच की सिंफनी नं. 11 के एलिआहू इनबाल द्वारा किए गए संचालन ने दर्शकों के बीच ठीक उसी तरह का उन्माद पैदा किया था, जैसा कि हम फीफा वर्ल्ड चैम्पियनशिप में कोई गोल दागने के बाद देखते हैं.“ भारत में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती. यह भी स्पष्ट कर दूं कि रूस, जर्मनी, यूरोप और यूनाइटेड स्टेट्स में भी इस तरह का प्रतिसाद मिलना संभव नहीं है.

आम तौर पर यह माना जाता है कि वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक के लिए भारत में कोई स्वागत योग्य जमीन इसलिए उपलब्ध नहीं हो सकी कि इसके अपने “शास्त्रीय संगीत” की परंपराएं अथाह गहरी हैं. इस तर्क का दूसरा सिरा कहता है कि भारतीय संगीत से जुड़ी रुचियों और आस्वाद पर, कम से कम उत्तर और मध्य भारत में, हिंदी फिल्म संगीत का पूर्ण दबदबा दिखाई देता है. हमें सिर्फ इस विचार तक सीमित होने की जरूरत नहीं है कि वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक ही क्यों, बल्कि कहना चाहिए कि श्रोताओं से उच्च स्तर की अपेक्षा करने वाले शोस्ताकोविच, अर्नॉल्ड शोएनबर्ग या ऑलीवर मेसियाएन के संगीत की तुलना में विवाल्डी या मोज़ार्ट का कर्णप्रिय और सुखद लगने वाला संगीत भी भारत की उर्वर धरा में अपनी जड़ें नहीं जमा सका. इसके बावजूद, जैसा कि भारत में भी प्रायः होता है, बीथोवन का नाम बिना चूके एक ऐसे नाम के साथ जोड़ा जाता है, जिसका जिक्र अपरिहार्य रूप से लगभग हर बातचीत में आता है, और वह नाम है- मोहनदास करमचंद गांधी. यह वैसी ही बेमेल जोड़ी है, जैसी कि आम तौर पर आप किसी अन्य जोड़ी के बारे में सोच सकते हैं, सिवाय इसके कि इस जोड़ी का मिलान इस रूप में किया जाए कि गांधी और बीथोवन दोनों ‘दुनिया की ऐतिहासिक शख्सियत’ थे. सीधे शब्दों में कहा जाए तो दोनों ‘दिग्गज’ थे- लेकिन इस तर्क के अनुसार तो उनकी जोड़ी कई अन्य दिग्गजों के साथ भी बनाई जा सकती है, इनमें असाधारण रूप से कद्दावर अनेक महिला और पुरुष शामिल हो जाएंगे. इस आधार पर कि वे मनुष्यता के मामलों में अपने असाधारण स्थान से नीचे नहीं उतरेंगे, कम से कम आम राय में दोनों को एक साथ लाने में मुश्किल यह है कि बीथोवन एक ‘कलाकार’ थे, जिन्होंने राजनीतिक और रोजमर्रा के जीवन में प्रवेश करने वाला संगीत रचा, जबकि गांधी मूलतः राजनीतिक जीवन में डूबे हुए थे.

बीथोवन के बारे में ऐसी राय पहली नजर में ही नहीं ठहर सकती, जैसा कि संगीत के सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक इतिहास के विद्यार्थी भी अच्छे से जानते हैं. इस महान संगीतकार के जीवनीकार नेपोलियन जैसे दिग्गज के साथ उनके बिगड़े रिश्तों की कहानी याद दिलाना कभी नहीं भूलते. बीथोवन ने इस महान लिबरेटर को अपनी थर्ड सिंफनी समर्पित करने का इरादा बना लिया था. लेकिन इरोइका (“हीरोइक”) सिंफनी का औपचारिक प्रदर्शन होने के पूर्व ही नेपोलियन ने खुद को फ्रांस का सम्राट घोषित कर दिया. इस विश्वासघात से खफा होकर अपने ही अंदाज के क्रांतिकारी डेमोक्रैट बीथोवन ने मुख पृष्ठ से नेपोलियन का नाम काट दिया. जैसा कि उन्होंने अपने एक दोस्त से कहा था, “तो वह भी किसी सामान्य आदमी से ज्यादा कुछ नहीं है. अब वह तमाम मानवाधिकारों को कुचलेगा और सिर्फ अपनी महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति करने में जुट जाएगा. वह खुद को हर व्यक्ति के ऊपर रखेगा और एक आततायी तानाशाह बन बैठेगा.“ यह भी कि बीथोवन के संगीत में सुनी जाने वाली राजनीतिक अनुगूंज अमल में लाई जा रही राजनीति के मुकाबले कुछ भी नहीं है. इसको ईस्टेबन बुच ने अद्भुत निपुणता और प्रशंसनीय विद्वता के साथ उद्घाटित किया है, जिनके मुताबिक बीथोवन की नाइंथ सिंफनी को हर किस्म की रंगत वाली राजनीतिक विचारधारा ने भुला दिया है अथवा उपेक्षित कर दिया है, और इन लोगों में रोमांसवादियों व आदर्शवादियों से लेकर नाजी तथा दक्षिण अफ्रीका और पूर्ववर्ती रोडेशिया में रंगभेद के पैरोकार तक शामिल हैं.

लेकिन गांधी का क्या, जिन पर अन्य बातों के अलावा, नीरद चौधरी और वी.एस. नायपॉल जैसे लोगों ने कला के प्रति पूरी तरह से उदासीन होने के आरोप लगाए हैं? आम तौर पर यह राय बनी हुई है कि गांधी के नेतृत्व, जिसे भारत में हम ‘स्वतंत्रता संघर्ष’ कहते हैं, रचनात्मक कार्यक्रम के प्रति उनकी कड़ी मेहनत वाली व्यापक और कठोर प्रतिबद्धता तथा अन्य बेशुमार मुद्दों पर उनका ध्यान- जिनमें समाज सुधार, भारतीय गांवों की दशा, अस्पृश्यता उन्मूलन, हिंदू-मुस्लिम का सवाल आदि शामिल हैं- के चलते उनके पास काव्य, संगीत, पेंटिंग और सिनेमा जैसे उभरते कलारूपों के लिए कोई समय ही नहीं बचा था. हालांकि उनके कई आलोचक दावे के साथ कहते हैं कि यह एक सारहीन, बल्कि उनकी कमजोरियों और खामियों को छुपाने और क्षमा करने वाली राय है. उनकी नजर में गांधी के पास कोई सौंदर्यबोधात्मक संवेदनशीलता नहीं थी और कला तथा अन्य चीजों की कोई भूख भी उनके मन में नहीं थी, बल्कि वह इन चीजों को तुच्छ मानते थे. गांधी को नरसी मेहता के ‘वैष्णव जन तो तेणे कहिए’ जैसे भजन बेहद पसंद थे, यह जानते हुए भी उनके घाघ आलोचकों का मानना है कि ‘चरखा के संगीत’ को बहुत बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया गया है. दूसरी तरफ, जैसे-जैसे नस्ल, जाति और लिंग के बारे में गांधी के कुछ विचारों को लेकर हमले तेज हो रहे हैं, कई विद्वान इस राय के करीब आते जा रहे हैं कि गांधी कला के साथ पूर्णतः संबद्ध थे और उनके मन में एक विशिष्ट सौंदर्यबोध मौजूद था. अध्येता सिंथिया स्नॉडग्रास द्वारा 2007 में पेश किए शोध-प्रबंध ‘द साउंड्स ऑफ सत्याग्रह’ के बाद गांधी के संगीत प्रेम को लेकर हर संदेह दूर हो जाना चाहिए. इसके अलावा तथ्य यह भी है कि बीथोवन का संगीत, जैसा कि अनेक जीवनीकारों ने उल्लेख भी किया है, गांधी को हिला कर रख देता था.

इस सिलसिले में मीराबेन की कहानी अक्सर भुला दी जाती है. इसमें कोई शक नहीं कि यह बीथोवन ही थे, जो बेहद कुलीन परिवार की मैडेलिन स्लेड को गांधी तक ले गए थे. मेडेलिन बीथोवन को पूजती थीं और 1920 के मध्य एक दिन वह रोम्या रोलां से मिलने गईं. रोम्या रोलां एक प्रसिद्ध व प्रतिष्ठित फ्रांसीसी उपन्यासकार, नाटककार और निबंधकार थे, साथ ही वह बीथोवन के प्रख्यात अध्येता भी थे. मेडेलिन को रोलां एक ऐसे व्यक्ति लगे, जो ईश्वरीय शक्ति से उनका साक्षात्कार करा सकता है. रोलां ने उनको सलाह दी कि अगर वह किसी ऐसे गुणवान पुरुष की तलाश में भटक रही हैं, जिस पर वह अपनी श्रद्धा और भक्ति न्यौछावर कर सकती हैं, तो उन्हें एक दुबले-पतले भारतीय जीवित व्यक्ति के बारे में सोचना चाहिए, जिन्हें ‘महात्मा’ कहा जाता है. रोलां को सब पता था. यद्यपि उन्होंने 1929-30 के दौरान रामकृष्ण और विवेकानंद की जीवनियां लिखी थीं, लेकिन इसके काफी पहले 1924 में ही उन्होंने गांधी पर एक पुस्तक लिख दी थी, जिसमें गांधी को उन्होंने ‘अनंत के साथ एकाकार हो जाने वाले व्यक्ति’ के रूप में वर्णित किया था. रोलां मेडेलिन से यह कहते प्रतीत हो रहे थे कि जब विश्व का महानतम जीवित व्यक्ति अपने चरखे के संगीत से आपको उतनी ही चकाचौंध में डाल सकता है, जितना कि आपके पूज्य संगीतकार का वॉयलिन आपको बहा ले जाता है, तो फिर महानता को समझने के लिए मृतकों का सहारा क्यों लिया जाए! एक अंग्रेज नौ-सेनापति की बेटी ने करीब दो दशकों तक मोहनदास गांधी की सहचारिका के रूप में किस प्रकार से अपनी जवानी के अधिकांश तनावयुक्त दिन बिताए, वह एक उतार-चढ़ाव भरी एक ऐसी दास्तान है, जिसके सामने कोई भी फिक्शन फीका पड़ जाएगा. सन्‌ 1960 में प्रकाशित मीराबेन की आत्मकथा ‘द स्पिरिट्स पिलग्रिमेज’ सब कुछ कह देती है, लेकिन गांधी से उनकी पहली मुलाकात का वर्णन बेशकीमती है: “मैं जैसे ही (कमरे में) दाखिल हुई, एक हल्के गेंहुएं रंग की आकृति उठ खड़ी हुई और मेरी ओर बढ़ी. मुझे एक रोशनी के आभास के अलावा और किसी चीज का भान ही नहीं रह गया था. मैं अपने घुटनों के बल बैठ गई. किन्हीं हाथों ने मुझे बड़ी नरमी से खड़ा किया और एक आवाज गूंजी: ‘तुम मेरी बेटी बनोगी... जी हां, यह महात्मा गांधी थे और मैं वहां रम गई.“ गांधी की हत्या के एक दशक बाद ही मीराबेन ने भारत छोड़ा और वियेनावुड्स रहने चली गईं, जहां उन्होंने अपनी शेष जिंदगी के बीस साल निर्वाह किए- बीथोवन की पगडंडियों पर चलते हुए, उनकी पैस्टोरल सिंफनी (नं. 6) को सुनते हुए और ‘द स्पिरिट ऑफ बीथोवन’ पुस्तक पर काम करते हुए उन्होंने अपने दिन बिताए, जो उनकी मृत्यु के वक्त अधूरी ही पड़ी थी.

बीथोवन को भारत से जोड़ने वाली उत्कृष्ट कड़ियों को एक ज्यादा जटिल दृष्टि से देखने की गुंजाइश अब भी है. और बदले में यह आगम और शगुन विचारना चाहिए कि अनंत के साथ संवाद स्थापित करने में भारतीय रुचि की सुदीर्घ परंपरा का नया चरण क्या और कैसा होगा. 18वीं सदी के आखिरी और 19वीं सदी के आरंभिक चरण के दौरान जर्मन सोच में भारत की एक बड़ी महत्वपूर्ण जगह थी. महाकवि गेटे, दार्शनिक शॉपेनहावर, दार्शनिक-कवि-भारतविद्‌-भाषाशास्त्री फ्रेडरिक श्लेगल और संस्कृतज्ञ ऑगस्ट विल्हेम श्लेगल जैसे बुद्धिजीवियों के नाम अक्सर सामने आते थे. इस सिलसिले में बीथोवन का उल्लेख यदा-कदा ही होता है, लेकिन उनकी 1812-1818 के बीच लिखी गई ‘टैगेबुख’ यानी नोटबुक यह संकेत देती है कि भारत में उनकी दिलचस्पी चलताऊ नहीं थी, और शायद अपने साथियों जितनी ही गहरी जिज्ञासा वह भारत को लेकर रखते थे. जैसा कि उस टैगेबुख के अध्ययन से पता चला है, अब यह स्पष्ट है कि बीथोवन कालिदास की शकुंतला से गहरे परिचित थे, जिसका गेटे ने स्तुतिगान किया है. यह जर्मनी के सिर चढ़ कर बोलता था. यही लोकप्रियता चार्ल्स विलकिंस के द्वारा किए गए ‘भगवद्गीता’ के अंग्रेजी अनुवाद, सर विलियम जोंस की रचनाओं और 1791 में आई विलियम रॉबर्ट्ससन की पुस्तक ‘एन हिस्टॉरिकल डिस्क्वीजीशन कंसर्निंग द एनसिएंट हैड ऑफ इंडिया’ की भी थी. विलकिंस की अनूदित भगवद्गीता में वारेन हेस्टिंग्ज द्वारा जोड़ी गई प्रस्तावना उल्लेखनीय है, क्योंकि इससे पहले सत्ताधारी वर्ग के किसी प्रभावशाली सदस्य ने अपने उपनिवेश से संबंधित किसी पुस्तक की भूमिका नहीं लिखी थी. इस बहरे संगीतकार ने अंधे होमर से भी प्रेरणा ली थी. ‘इलियड’(22:303-5) से उदाहरण दे रहा हूं:

“लेट मी नॉट सिंक इंटू द डस्ट अनरजिस्टिंग एंड इनग्लोरियस, बट फर्स्ट एकॉम्प्लिश ग्रेट थिंग्स, ऑफ व्हिच फ्यूचर जनरेशंस टू शैल हियर!”

ताज्जुब की बात है कि बीथोवन की नोटबुक में ‘इलियड’ का यह उद्धरण गीता के उस अंश से पहले दर्ज है, जिसे उन्होंने अपनी मूल शिक्षा बना लिया था: अपने जीवन को निष्क्रियता में न बिताएं. विनियोग पर निर्भर रहें, अपना कर्तव्य निभाएं, फल की चिंता न करें, और घटित को समभाव से देखें, चाहे उसका अंत अच्छाई में हो या बुराई में; इस तरह की साम्यता को ही योग कहा जाता है, जो कुछ भी आध्यात्मिक है उस पर ध्यान दें.

सन्‌ 1818 में नोटबुक की आखिरी प्रविष्टि दर्ज करने के कुछ सालों बाद बीथोवन ने ऐसा गजब का काम किया, जिसे उचित ही उनकी महानतम संगीत रचनाएं माना जाता है. ये संभवतः वेस्टर्न क्लासिक म्यूजिक के पूरे खजाने की सर्वोत्कृष्ट रचनाएं हैं. बाद के तार चतुर्थकों (क्रमांक 12 से 16 और ग्रॉस फ्यूज) को अपने दौर में संदेह की दृष्टि से देखा जाता था, उनको लगभग अबूझ और भ्रमित संगीत रचना माना जाता था. बीथोवन के समकालीन संगीतकार फ्रैंज शूबर्ट इकलौते व्यक्ति थे, जो मानते थे कि बाद के तार चतुर्थक संभवतः मानवीय अस्तित्व के अंदर अनिर्वचनीय और वर्णनातीत चीज की अभिव्यक्ति तथा किसी ज्ञानातीत चीज की खोज में आत्मा की छटपटाहट हैं. अपनी मृत्यु से ठीक पहले ‘सी’ लघु (ओपस 13) में तार चतुर्थक क्रमांक 14 को आखिरी बार सुनने के बाद शूबर्ट ने चिल्ला कर कहा था, “इसके बाद अब हमारे लिए रचने को क्या बाकी रह गया है.“ बीथोवन की मृत्यु के कई साल बाद यह राय बदलने लगी थी, लेकिन जो चीज बरबस ध्यान खींचती है, वह यह है कि संगीत विज्ञानी इस बात पर विचार करने के अनिच्छुक रहे हैं कि बीथोवन की सोच के ढांचे में मुक्ति, जिसे बौद्ध लोग निर्वाण और हिंदू मोक्ष कहते हैं, की विषादपूर्ण लालसा के लिए कोई जगह बनाने में भारतीय दर्शन किस तरह का योगदान दे सकता था. उपनिषदों और शंकराचार्य के बाद बीथोवन ने हमें ‘अद्वैत’ का संगीत प्रदान किया है.

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