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डल्लेवाल को बचाने पूरे देश में एकजुट किसान संगठन, आंदोलन को खत्म करने की चाबी केन्द्र के पास

पिछले दो-तीन वर्षों से किसान और उनका आंदोलन इस देश की राजनीति के केंद्र में है. एक बार पहले भी तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसान सड़क पर उतरे थे और लगभग साल भर के आंदोलन के बाद सरकार ने किसानों से समझौता कर लिया था, तीनों कृषि कानून बिल वापस ले लिए गए थे. आज फिर किसान सड़कों पर है. बातचीत के कई दौर के बाद भी हल नहीं निकला है. आज जब हम बात कर रहे हैं, तब पूरे देश में संयुक्त किसान मोर्चा हज़ारों जगह पर प्रदर्शन कर रहा है. किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल का आमरण अनशन का 29वां दिन हैं.

पूरे देश में हो रहे हैं प्रदर्शन

हम उनकी जान को बचाने के लिए पूरे देश में जगह-जगह इकट्ठे हो रहे हैं. राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को संयुक्त किसान मोर्चा की तरफ से ज्ञापन सौंप रहे हैं और उनसे यह कह रहे हैं कि वह तत्काल प्रधानमंत्री से कहें कि वे देश के किसान संगठनों से तत्काल बातचीत करें, ताकि न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की कानूनी गारंटी और कर्जा मुक्ति जैसी जो मांगे हैं, उनको मान कर कोई हल निकल सके. यह ज्ञापन पूरे देश में हजारों जगहों पर सौंपा जा रहा हैं. यह एक बात है. दूसरी बात ये है कि आज का दिन इसलिए महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि सरकार अचानक जैसे कोरोना काल का लाभ उठाते हुए तीन कृषि विरोधी कानून, उसी तरीके से सरकार अचानक 25 नवंबर को सरकार एक राष्ट्रीय कृषि बाजार नीति लेकर आई हैं. इसका उद्देश्य भी वही है, जो तीन कृषि कानूनों का था. 

मतलब यह कि सरकार का उद्देश्य है- नंबर एक किसानों की जमीन को अडानी-अंबानी जैसे कॉरपोरेट्स को कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग के नाम पर सौंपना. नंबर दो, पूरे कृषि बाजार के ऊपर अडानी-अंबानी जैसों का वर्चस्व कायम कराने के लिए उनकी मदद करना. इसीलिए आज पूरे देश के अंदर यह जो ड्राफ्ट आया है, उसे जलाने का काम पूरे देश में चल रहा है. संयुक्त किसान मोर्चा से जुड़े 550 किसान संगठन ज्ञापन भी देंगे- राष्ट्रपति माननीय द्रौपदी मुर्मू के नाम से और साथ में यह ड्राफ्ट को जलाने का काम भी करेंगे.

कारण ये है कि 25 तारीख के बाद केवल 15 दिन उन्होंने ड्राफ्ट में सुझाव के लिए दिए हैं. उसके बाद जो उनकी मंशा है वो ये कि केंद्र सरकार से कर नहीं पाए तो राज्य सरकारों से उसको फाइनल करवा कर और राज्य सरकारों के ही माध्यम से राष्ट्रीय कृषि बाजार नीति के ड्राफ्ट को लागू करवा दिया जाए. मतलब पीछे के दरवाजे से किसानों के साथ में जो समझौता 09 दिसंबर 2021 को हुआ था, उसके खिलाफ जाकर सरकार ये राष्ट्रीय कृषि बाजार नीति लेकर आयी है. इसको लेकर देशभर के अंदर विरोध हो रहा है.  

किसानों के साथ हुआ धोखा

ये ओपिनियन लिखे जाने के वक्त मैं बैतूल जिले में हूं, जहां के मुलताई में फायरिंग हुई थी. यहां 24 किसान शहीद हुए थे. आज उसी को याद करने का दिन है. आज के दिन बैतूल में 3,700 से 4,200 रुपये यहां पर सोयाबीन बिक रही है, जबकि पांच साल पहले सोयाबीन 7,000 रुपये क्विंटल तक बिकी थी. यही हालात पूरे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र के हैं. जहां-जहां पर सोयाबीन का उत्पादन होता हैं, उन तमाम जगहों के हैं. सवाल ये है कि जो रेट हमको 5-7 साल पहले मिल रहा था, वह भी रेट आप देने का काम नहीं कर रहे हैं. जबकि शिवराज सिंह के कार्यकाल में मंदसौर के किसानों की हत्या हुई, अब वो ये कहें कि वह तो न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) दे रहे थे और दे रहे हैं.

यह भी आपको मालूम है कि पंजाब जैसी जगह जहां पर गेहूं और चावल के एक-एक दाने की खरीद होती थी, इस बार वहां पर खरीद नहीं हो पाई, क्योंकि पहले से जो माल गोदाम में पड़ा हुआ था, उस माल को सरकार ने, भारतीय खाद्य निगम (FCI) ने उठाने का काम नहीं किया.

यानी, पूरा का पूरा एक षड्यंत्र चल रहा है, मंडी व्यवस्था को ठप करने की कोशिश है. FCI को बंद करना हैं, राशन की दुकानों को बंद करना हैं, गैस कूपन दे कर के और इस देश के अंदर बाजार व्यवस्था लागू करनी हैं, तो यह सरकार जो है किसान विरोधी सरकार है. इसीलिए संयुक्त किसान मोर्चा इसका विरोध कर रहा है. किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल इसका विरोध आमरण अनशन से कर रहे हैं. 

किसानों की रणनीति, न्याय मिलने तक संघर्ष

किसानों की रणनीति तो ये है कि देश के किसानों को एकजुट किया जाए, गोलबंद किया जाए और अपनी मांगों को मनवाया जाए. 380 दिन हम ने आंदोलन किया, 750 किसानों की शहादत दी. आपको मालूम है कि शंभू बॉर्डर, खनौरी बॉर्डर पर क्या हाल थे, यहां पर भी फायरिंग हुई. उसमें एक नौजवान शहीद हो गया. हमलोग तो लड़ेंगे और अपना हक लेने का काम करेंगे, क्योंकि सरकार अगर 14 लाख करोड़ रुपए कॉर्पोरेट को दे सकती है. छूट के तौर पर उनका कर्ज माफ कर सकती है, राइट ऑफ कर सकती है.

नॉन परफॉर्मिंग असेट के अंदर उसको बता सकती है, फिर किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) क्यों नहीं दे सकती? कहा जाता है कि MSP में सरकार का पैसा खर्च होगा. फोकट में नहीं होना है यह काम. बाजार के अंदर समान तो बिकता ही है. कुल मिलाकर हमारा कहना यह है कि जैसे आप रेट तय कर लेते हो, आप जैसे इंडस्ट्रियल प्रोडक्ट्स का करते हो, तो हम यह चाहते हैं कि कृषि के प्रोडक्ट्स के लिए भी ऐसा ही काम होना चाहिए. 

किसानों का 380 दिन आंदोलन चला तब भी हम बात को तैयार थे. नरेन्द्र सिंह तोमर से कई राउंड बातचीत हुई थी, लेकिन वह ऑथराइज ही नहीं थे. हम इस बात का स्वागत करते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सीधे उनके पास चले आएं. कोर्ट ने तो कमिटी बना दी. दुखद बात यह है कि इतने दिनों का संसद सत्र निकल गया, विपक्ष किसानों की बात उठाना चाहता था, लेकिन सरकार तैयार ही नहीं थी. हमने तो जुलाई-अगस्त में भी देश के नव-निर्वाचित सांसदों को ज्ञापन दिया था. प्रधानमंत्री ने हमें समय ही नहीं दिया. 

सरकार तत्काल बातचीत करे वरना अगर जगजीत सिंह डल्लेवाल को अगर कुछ भी हुआ तो उसकी जिम्मेदारी सरकार की होगी. उनकी जान बचाने की चाबी तो सरकार की शीर्ष पदों पर बैठे लोगों के पास ही है. किसान संगठन बातचीत के लिए तैयार हैं और हमेशा ही रहेंगे. 

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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