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'हीट वेव' से अधिक उसकी बढ़ती 'फ्रीक्वेंसी' है चिंता का विषय, इतिहास से सबक लेकर बढ़ानी होगी पर्यावरण-संरक्षण की गति

पिछले कुछ वर्षों की अगर आप हालत देखें, आंकड़ों पर गौर करें तो अमेरिका हो, यूरोप हो या फिर भारत हो, हीट वेव की बारंबारता काफी बढ़ी है. अभी अगर हाल के मामलों पर गौर करें तो मार्च 2023 में भारत में ‘हीट वेव’ की काफी समस्या देखने को मिली थी. बिल्कुल जुलाई की बात करें तो अमेरिका और यूरोप इससे जूझ रहे हैं. अभी यूरोप का जो सिचुएशन है, वह बेसिकली यह एक तरह से अल-नीनो इयर है. साइक्लोन के बारे में हम जानते हैं कि जब भी चक्रवात आता है तो ठंड आती है या बारिश होती है, तूफान आता है, बाढ़ आती है. अभी यूरोप के ऊपर जिस तरह का वातावरण बना है, वह एंटी-साइक्लोन का है. ऐसे वातावरण में क्या होता है? होता यह है कि सूरज से जो ताप धरती के वातावरण में आता है, वह यहीं कैद होकर रह जा रहा है, बाहर नहीं निकल पा रहा है, और इसी वजह से धरती का टेंपरेचर यानी तापमान बढ़ रहा है. एक तरह से जो डोम जैसा स्ट्रक्चर बन गया है, धरती के ऊपर, वह जब शिफ्ट होगा तो धीरे-धीरे तापमान भी कम होगा.

समझिए, क्या है हीट वेव?

क्लाइमेट चेंज है, एयर-पॉल्यूशन है और ऐसे कई और भी कारण हैं, जिनकी वजह से हीट-वेव की स्थितियां बनने लगी हैं. ‘हीट वेव’ को अगर हम स्टैंडर्ड तरीके से नापना चाहें तो गरमी होने पर अगर आप पेड़ वगैरह की छांव में अगर 15-20 मिनट रुक लेते हैं, आपको आराम मिलता है, वहीं अगर हीट वेव की हालत होगी तो आप यहां पांच मिनट से अधिक रह नहीं पाएंगे. एवरेज टेंपरेचर के हिसाब से देखें अगर तो 30 साल के आंकड़ों से अधिक अगर तापमान रह रहा है, तो वह भी हीट वेव की स्थिति कही जा सकती है. वैसे मैदानी क्षेत्र में तापमान अगर 40 डिग्री या अधिक हो, पहाड़ी इलाकों में 30 या अधिक हो तो लू या हीट वेव चलने लगती है. तटीय क्षेत्रों में यह सीमा 37 डिग्री तक की मानी जाती है.

हीट वेव के कई कारण

हीट वेव का कोई एक कारण नहीं कह सकते हैं. हां, बिलाशक यह कह सकते हैं कि कई सारे कारणों की वजह से यह होता है. अगर एनवायरनमेंट के हिसाब से देखें, तो यह कोई नयी और अनूठी बात भी नहीं है. इतिहास में पहले भी हीट वेव आए हैं. हां, इसकी बारंबरता यानी फ्रीक्वेंसी, जैसे बढ़ रही है, वह चिंताजनक है. जैसे, यूरोप में पिछले साल भी हुआ था, इस साल भी हुआ है. इसका कोई एक कारण तो खोजना मुश्किल है, हां ये बिल्कुल ठीक है कि मनुष्य जाति काफी हद तक जिम्मेदार है इसके लिए. जैसे, हम कहते हैं क्लाइमेट चेंज हो रहा है, या एयर पॉल्यूशन हो, वॉटर पॉल्यूशन हो, इन सबसे हीट जेनरेट हो रहा है और वह हमारे ही वातावरण में फंसा रह जाता है, इस वजह से ही गर्मी बढ रही है. ओजोन के लेवल में स्पाइक होना, डस्क की वजह से, क्लाइमेट चेंज की वजह से और अन्य कई कारणों से भी हीटवेव भी होता है.इसके परिणाम यह हुए हैं कि हमारी उत्पादकता घटती है, हमारी कार्यक्षमता घटती है और हम जल्दी थकने लगते हैं. हां, हमने जिस तरह से प्राकृतिक संसाधनों को यूज या एक्सप्लाइट किया है, उससे भी दिक्कत हो रही है. हम लोगों के कामों की वजह से पृथ्वी के मोड ऑफ सर्कुलेशन पर भी प्रभाव पड़ा है, उसकी वजह से ही सारा ताप जो है, वह हमारे वातावरण में ही रह जा रहा है, यही सबसे बड़ी समस्या है.

भारत पर भी पड़ेगा खासा प्रभाव

हीट वेव की वजह से भारत पर खासा प्रभाव पड़ेगा. 2030 तक जो हमारा SDG (सतत् विकास लक्ष्य) है, हीट वेव की वजह से हम उसमें खासे पीछे रहेंगे. हमें पता है कि एसडीजी में हमारे कई गोल्स हैं, जैसे- वायु प्रदूषण कम करना है, लोगों को पानी मुहैया कराना है, स्वास्थ्य पर ध्यान देना है. अगर हीट वेव की समस्या इसी तरह से बनती रही तो हम लोग कई फ्रंट पर पीछे रह जाएंगे. अगर अगले 10-20 सालों का हीट की वजह से आकलन देखें तो भारत के ऊपर कम से कम 2.8 परसेंट जीडीपी की कॉस्ट इसकी लागत होगी यानी भारत कम से कम इतना हीट वेव की वजह से खो देगा. बातें एक लंबे समय से चल रही हैं, पर्यावरण और प्रकृति को लेकर. शुरुआत के कुछ सालों में जो भी समिट हुए, उसमें विचार निकले और लोगों ने कहा कि वे फलाने तरीके से काम करेंगे. 2015 में अमेरिका ने एक ऐसे ही समिट से शुरुआत में वॉक आउट भी किया, फिर बाद में शामिल भी हुए. पिछले 8-10 साल में हालांकि काफी प्रगति हुई है और हमने काफी अच्छा काम किया. हां, कुछ विकसित देश हैं, जो अपने एमिशन-लेवल (उत्सर्जन-स्तर) को कम करने को तैयार नहीं है. भारत को भी अगर पिछले 10 वर्षों से देखें तो भारत अपने लक्ष्यों को लेकर काफी गंभीर है. पहले के मुकाबले काफी आक्रामक और तेज तरीके से काम हो रहा है. जो विकसित देश हैं, उनकी भूमिका काफी हद तक नकारात्मक रही है, लेकिन हां, पिछले 10 साल से काफी सुधार के काम हुए हैं. अब इसका प्रभाव कितने वर्षों में दिखेगा, यह तो सोचने या विचार करने का विषय है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.]

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