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'ऑफ द कैमरा' के बहाने दिग्विजय से 'ऑफ द रिकार्ड' चर्चा

मौका था भोपाल में मेरी किताब 'ऑफ द कैमरा- टीवी के अनसुने किस्से' के अंग्रेजी संस्करण के विमोचन का और मंच पर थे हर वक्त मीडिया की सुर्खियों में रहने वाले दिग्विजय सिंह यानी की मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री, राज्यसभा सांसद और कांग्रेस कार्यसमिति के सदस्य जो सबके सामने कह रहे थे कि उनका न्यूज सेंस थोडा कमजोर है, उनकी न्यूज की समझ उनकी पत्नी यानी की अमृता से कम है. इस पर मैंने कहा कि ये जवाब कुछ जमा नहीं, क्योंकि कांग्रेस के किसी भी नेता से ज्यादा मीडिया में तो आप छाये रहते हैं, ऐसा क्यों? इस पर दिग्विजय सिंह चहक उठे. वह बोले, 'देखिये जो राजनीति के चाणक्य कहे जाते हैं द्वारका प्रसाद मिश्र, मैं उनका चेला हूं. वैसे उनके असली शिष्य अर्जुन सिंह कहे जाते हैं, मगर मुझे वो बहुत स्नेह करते थे और मुझसे कहते दिग्विजय सिंह छपते रहा करो अच्छा या बुरा छपते रहो. तो यही मैंने सीखा है.' इस स्वीकारोक्ति के बाद सिवाय ठहाका मारने के कुछ रह नहीं जाता. हाल में बैठे सारे लोग दिग्विजय सिंह के साथ हंस पड़े. 

छपना हो तो कला सीखिए 

बात किताब 'ऑफ द कैमरा' की होनी थी, मगर जब अनुभवी नेता सामने बैठा हो तो फिर काहे की किताब? बात 'ऑफ द रिकार्ड' बातों की होने लगी. मंच पर मेरे साथ संगत कर रहे थे रशीद किदवई, जिनके पास कांग्रेस के नेताओं के ढेरों किस्से हैं, और जिनको वो अपने अंदाज में सुनाते हैं तो वक्त का पता नहीं चलता. दिग्विजय से उन्होंने पूछा कि आप पत्रकारों से 'ऑफ द रिकार्ड' बात करने में झिझकते नहीं, ऐसा क्यों? इतनी सारी तकनीक आने के बाद भी आप बदले नहीं. दिग्विजय मुस्कुराकर बोले देखो बहुत सारे पत्रकारों के सामने क्या 'ऑफ द रिकार्ड', सब 'ऑन रिकॉर्ड' होता है. मगर यदि मुझे कुछ छपवाना है तो किसी पत्रकार को बुलाकर बोल देता हूं ये खबर 'ऑफ द रिकार्ड' है और तुमको ही बता रहा हूं, फिर थोडे दिनों बाद मैं देखता हूं कि वो 'ऑफ द रिकार्ड' भी 'ऑन द रिकॉर्ड' हो जाता है. एक बार फिर सामने बैठे मेरे मित्र पत्रकार हंस पड़े. 

 
 

खुद को मानते हैं एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन

दिग्विजय सिंह ने कहा "हमारे प्रधानमंत्री थे मनमोहन सिंह. उनके प्रेस सचिव थे संजय बारू, जिन्होंने उन पर ही किताब लिख दी 'एक्सीडेंटल प्राइम मिनिस्टर' वैसे ही वह 'एक्सीडेंटल पॉलिटिशियन' हूं. बहुत कुछ सोच कर राजनीति में नहीं आया, हां जो सामने आया अच्छे से करता गया". मेरी इस किताब में दो किस्से 2020 की सरकार गिरने के भी हैं. मैं पूछ बैठा कि उन्होंने राज्यसभा में ज्योतिरादित्य सिंधिया की तारीफ में -वाह महाराज वाह- कहा था, ऐसा क्यों? दिग्विजय मुस्कुराये, बोले "हमारे महाराज हर काम बहुत ईमानदारी से करते हैं. जब कांग्रेस में थे तो कांग्रेस के पक्ष में ईमानदारी से बोलते थे, मगर जब बीजेपी में गये तो वहां भी उसी ईमानदारी से बात करने लगे. अपने मंत्री के कार्यकाल की भी आलोचना उसी ईमानदारी से करने लगे. 1977 में पहली बार विधायक बनने वाले दिग्विजय सिंह 1993 से 2003 तक मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं, उनकी खासियत अपने विरोधियों से भी अच्छे संबंध रखने की रही है.

बीजेपी नेता विक्रम वर्मा, सुंदरलाल पटवा और बाबूलाल गौर से उनकी खूब पटती रही. जब ये जिक्र छेड़ा तो बताया कि जब वो सुंदरलाल पटवा के खिलाफ मानहानि का मुकदमा लड रहे थे तो एक दिन उनके वकील ने देखा कि कोर्ट से आने के बाद वह पटवा जी के घर उनके साथ बैठकर दाल-बाफले खा रहा था. बस फिर क्या था, वकील साहब नाराज हो गये और समझ नहीं पाये कि ये माजरा क्या है...जो दो व्यक्ति एक-दूसरे के खिलाफ कोर्ट में लड़ रहे हों, वो कैसे एक मेज पर हंस-हंस कर दाल बाफले खा सकते है? मगर वो दौर और था. अब नेताओं में सद्भाव की कमी आ गयी है. पत्रकारों से नेताओं की दूरियों की वजह भी उन्होंने कहा कि विश्वास की नहीं, बौद्धिकता की कमी आई है दोनों तरफ से, इसलिए एक-दूसरे से खुलकर संवाद नहीं करते, जबकि दोनों लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं.

वाकई नेता और पत्रकार का औपचारिक और अनौपचारिक संवाद ही दोनों की जानकारियां बढ़ाता है. यही इस कार्यक्रम का मकसद था जो, दिग्विजय सिंह के साथ तकरीबन एक घंटे की चर्चा में पूरा हुआ. इस चर्चा में दिग्विजय की पत्नी अमृता ने भी उनको लेकर रोचक किस्से सुनाए. क्लब लिटराटी की सीमा रायजादा ने भी इसमें हिस्सा लेकर बातचीत को रोचक बनाये रखा.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.] 

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