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'भारत जोड़ो यात्रा' से अपनी सियासी जमीन मजबूत कर पायेगी क्या कांग्रेस?

इसमें कोई शक नहीं कि कांग्रेस इस देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी है, जिसकी स्थापना देश को आज़ादी मिलने से बहुत पहले ही यानी ब्रिटिश राज में 28 दिसंबर 1885 को हुई थी. इसके संस्थापकों में तीन लोगों की भूमिका थी, जिसमें सबसे अहम थे ए. ओ. ह्यूम,जो उस वक्त थियोसोफिकल सोसाइटी के प्रमुख सदस्य थे. उनके साथ दादा भाई नौरोजी और दिनेश वाचा ने इस पार्टी को खड़ा करने में अपना अहम योगदान दिया था. 

सच ये भी है कि देश को आज़ादी मिलने के बाद सबसे ज्यादा वक्त तक कांग्रेस ने ही राज किया है. पुरानी कहावत है कि सत्ता में रहने का स्वाद आपको सड़क की हकीकत से बहुत दूर ले जाता है और दरबार छिन जाने के बाद ही ये अहसास होता है कि जनता से आखिर कैसे जुड़ा जाये.

केंद्र की सत्ता से हटने के आठ साल बाद कांग्रेस को पहली बार ये अहसास हुआ है कि सरकार की नीतियों की मुख़ालफत करने के लिये सड़क पर उतरने के सिवा कोई और चारा नहीं है. आज यानी बुधवार को राहुल गांधी की अगुवाई में कांग्रेस 'भारत जोड़ो' यात्रा शुरू कर रही है. कांग्रेस का कहना है कि इस यात्रा का मकसद देश में प्रेम और भाईचारे को फैलाना है, इसलिए इसका नाम 'भारत जोड़ो यात्रा' रखा गया है क्योंकि  यह यात्रा एकता की शक्ति दिखाने, कदम से कदम मिलाने और सपनों का भारत बनाने के लिए है. 
हालांकि सियासी गलियारों में कांग्रेस की इस यात्रा को 2024 के लोकसभा चुनाव से भी जोड़कर देखा जा रहा है. कहा जा रहा है कि कांग्रेस इसके जरिये अपने सोए हुए काडर को जगाते हुए पार्टी में एक नई जान फूंकना चाहती है. 

इससे पहले दिल्ली के रामलीला मैदान में महंगाई के खिलाफ हल्ला बोल रैली करके कांग्रेस ने मोदी सरकार पर हमला बोलते हुए अपनी ताकत दिखाने की नुमाइश भी की थी. कन्याकुमारी से शुरू होकर देश के विभिन्न हिस्सों से गुजरते हुए 3500 किलोमीटर का सफर तय करने वाली इस यात्रा से कांग्रेस अपनी सियासी जमीन मजबूत करने में किस हद तक कामयाब होगी, ये तो हम भी नहीं जानते. लेकिन मुख्य विपक्षी दल होने के नाते उसका पहला फर्ज यही बनता है कि वो आम जनता से जुड़ी तकलीफों को जानने-समझने के लिए पहले उनके बीच जाये और फिर सरकार पर सवालों की बौछार करे.

लोकतंत्र में विरोध की आवाज होना तो बेहद जरूरी है, वरना जनता तो तानाशाही और लोकतंत्र के बीच का फर्क ही भूल जाएगी. इसलिये बरसों पहले समाजवादी नेता डॉ. राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि," जिस दिन सड़क खामोश हो जायेगी, उस दिन संसद आवारा हो जायेगी." उनकी इस बात पर गहराई से गौर करें, तो लगता है कि वे एक सांसद-नेता होने के अलावा काबिल दूरदृष्टा भी थे. बेशक पीएम मोदी सबसे लोकप्रिय नेता हैं लेकिन उनकी सरकार के खिलाफ जनहित से जुड़ी समस्याओं के मुद्दे उठाना और उसके लिए जनता के बीच जाना, विपक्ष का भी हक है और सत्तारूढ़ पार्टी ये जुमला देकर उस जवाबदेही से बच नहीं सकती कि "ये भारत जोड़ो नहीं, बल्कि परिवार बचाओ यात्रा है."

हालांकि कांग्रेस ने दावा किया है कि पिछले कुछ सालों में देश के भीतर नफरत का जो माहौल बना दिया गया है, उसके लिए ही यह यात्रा लोगों को एक करने के लिए की जा रही है. जब यह यात्रा होगी, तो इतिहास लिखा जाएगा. कन्याकुमारी से शुरू हो रही इस यात्रा को लेकर लेकर कांग्रेस ने कई स्लोगन भी जारी किए हैं. मसलन,- 'आओ एकजुट होकर भारत जोड़ें, लोकतंत्र विरोधी ताकतों की कमर तोड़ें'- "नफरत और हिंसा के खिलाफ भारत बोलेगा, अब हर देशवासी एकजुट होकर भारत को जोड़ेगा.

दरअसल, कन्याकुमारी से श्रीनगर तक की 3,570 किलोमीटर लंबी ये यात्रा लगभग पांच महीनों में 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों को कवर करेगी और इसके जरिये कांग्रेस महंगाई, भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिक नफ़रत फैलाने जैसे मुद्दों को उठाते हुए अपनी पार्टी के कार्यकर्ताओं में भी नई जान फूंकने का काम करेगी. नहीं जानते कि इस पूरी कवायद से कांग्रेस को 2024 के लोकसभा चुनावों में कितना फायदा मिलेगा लेकिन एक स्वस्थ लोकतंत्र की मजबूती के लिए अच्छी बात ये है कि विपक्ष को अपनी जिम्मेदारी का इतना तो अहसास हुआ कि वह सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर हुआ.

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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