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ब्लॉग: गठबंधन जीत की गारंटी नहीं! जानिए- यूपी में है किसका पलड़ा भारी?

विधानसभा चुनाव तो पांच राज्यों में हो रहे हैं लेकिन देश की नजर उत्तर प्रदेश पर टिकी हुई है. जाहिर है कि राजनीतिक दृष्टिकोण से उत्तरप्रदेश देश का भाग्य विधाता है और इस सूबे की राजनीति कब किस करवट लेगी कहना आसान नहीं है. भले चुनावी महारथी सूबे की राजनीति की हर धड़कन के एहसास का दावा करते हैं लेकिन अक्सर चौकानेवाले नतीजे महारथी समेत नेतओं की धड़कने बढ़ा देते हैं.

कभी नतीजे त्रिशंकु हो जाते हैं तो कभी जनता के फैसले एक पार्टी के समर्थन में सरपट दौड़ती है. ये भी जगजाहिर है कि राजनीति में 1 प्लस 1 कभी 2 नहीं होते हैं, कभी 1, कभी 11 और कभी जीरो भी हो सकते हैं.

क्या गठबंधन की जीत होगी?

डंके की चोट पर कहा जा रहा है कि समाजवादी और कांग्रेस पार्टी के गठबंधन की वजह से अखिलेश की जीत पक्की हो गई है. ये भी मृगमरीचिका जैसी वाली बात है. यूपी में किसका पलड़ा भारी है. इसे समझने से पहले यूपी की राजनीति का पुराना इतिहास टटोल लेते हैं.

साल 1990 में केंद्र की वीपी सिंह की सरकार से बीजेपी ने समर्थन वापस ले लिया था जिसकी वजह से वीपी सिंह को प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा और यूपी में भी जनता दल का दो फाड़ हो गया था. 1991 में यूपी में हुए विधानसभा चुनाव में मुलायम सिंह यादव दोबारा सत्ता नहीं देख पाए थे जबकि उस दौरान मंडल की राजनीति चरम पर थी और 1990 में अयोध्या में कार सेवा के दौरान मुलायम सिंह के शासनकाल में कार सेवक पर गोली चली थी जिसमें 16 कार सेवक की मौत हुई थी. मुलायम एक तरफ आरक्षण आंदोलन की वजह से ओबीसी के मसीहा हो गये थे तो दूसरी तरफ कार सेवक पर चली गोली से मुस्लिम में हीरो हो गय़े थे. मुलायम अभी तक उस घटना का जिक्र करके मुस्लिम में अपनी अहमियत साबित करते रहते हैं लेकिन इसके बावजूद 1991 में हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी की शानदार जीत हुई थी.

maya-mulayam

1992 में विवादित रामजन्म भूमि-बाबरी मस्जिद के ढहाने के बाद उत्तरप्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था और ऐसा लग रहा था कि बीजेपी के समर्थन में हवा चल रही है लेकिन अगले साल हुए विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता से दूर हो गई वहीं सबसे बड़े गठबंधन को बहुमत नहीं मिला.

सूबे की राजनीति की दो बड़ी पार्टी बीएसपी और समाजवादी पार्टी और दो बड़ी हस्ती मायावती और मुलायम सिंह के बीच चुनावी गठबंधन हुआ था. न तो बीजेपी को बहुमत मिला और न ही गठबंधन को. माया-मुलायम के गठबंधन के बावजूद बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी होकर उभरी लेकिन बहुमत से दूर थी. हालांकि जोड़तोड़ राजनीति की वजह से सरकार मायावती और मुलायम की ही बनी थी.

यही नहीं 1996 में भी बीएसपी और कांग्रेस के बीच गठबंधन हुआ था लेकिन उस समय भी ये गठबंधन बीजेपी से काफी पीछे छूट गई थी. ये जरूरी नहीं है कि गठबंधन हो गया तो जीत पक्की हो गई. बड़े मुद्दे और बड़े गठबंधन के बावजूद आप बहुमत से दूर हो सकते हैं और छोटे मुद्दे से भी स्पष्ट बहुमत हासिल किया जा सकता है. 2007 में मायावती और 2012 में अखिलेश यादव को स्पष्ट बहुमत मिला.

यूपी में किसकी बनेगी सरकार?

अब उत्तरप्रदेश में क्या होगा? समाजवादी और कांग्रेस पार्टी के बीच गठबंधन के बाद अखिलेश यादव दावा कर रहे हैं कि गठबंधन 403 सीटों में से 300 सीटें हासिल करेगा वहीं मायावती और बीजेपी भी बहुमत मिलने का दावा कर रही हैं.

चुनाव जीतने के मापदंड

चुनाव जीतने के लिए कई मुद्दे होते हैं लेकिन 5 ऐसे मापदंड होते हैं जिससे पता किया जा सकता है कि किसका पलड़ा भारी है. ये पांच मापदंड हैं निर्णायक नेता, गठबंधन, विकास, भ्रष्ट्राचार-कानून व्यवस्था और केन्द्र की राजनीति का असर.

modi

सबसे पहले बात करते हैं निर्णायक नेता की. हाल के चुनाव में देखा गया है कि निर्णायक नेता जीत की मुख्य वजहें होती हैं. जैसे केन्द्र में नरेन्द्र मोदी निर्णायक नेता हैं उसी तरह राज्यों में नीतीश कुमार, ममता बनर्जी, अरविंद केजरीवाल, नवीन पटनायक भी निर्णायक नेता हैं. निर्णायक नेता की वजह से लोकसभा में नरेन्द्र मोदी की जीत हुई थीं. उसी तरह दिल्ली में अरविंद केजरीवाल, बिहार में नीतीश कुमार और पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की जीत विधानसभा चुनाव में हुई थी लेकिन इसी केजरीवाल और नीतीश कुमार की हार लोकसभा चुनाव में हुई थी यानि लोकसभा और विधानसभा के चुनाव अलग होते हैं और निर्णायक नेता भी अलग-अलग.

उत्तरप्रदेश में सपा और सरकार का चेहरा अखिलेश यादव हैं उसी तरह बीएसपी का चेहरा मायावती हैं यानि दोनों अपनी-अपनी पार्टी के निर्णायक नेता हैं. लेकिन दोनों को टक्कर देने के लिए बीजेपी के पास राज्यस्तर पर कोई चेहरा नहीं है. अगर है भी तो उन्हें उभरने नहीं दिया गया. बीजेपी मोदी के चेहरे पर ही विधानसभा का चुनाव लड़ना चाहती है. राज्य में विपक्षी पाटियां बीजेपी से पूछ रही हैं कौन सीएम का चेहरा है. ये भी जगजाहिर है कि मोदी पीएम होते हुए राज्य के सीएम नहीं बन सकते हैं. बीजेपी को लगता है कि मोदी के चेहरे पर ही पार्टी महाराष्ट्र, हरियाणा, झारखंड और जम्मू कश्मीर में चुनाव जीती है तो यूपी में भी चुनाव जीत सकती है लेकिन ये फॉर्मूला बिहार और दिल्ली में पूरी तरह फेल हो चुका है. बीजेपी की जब जीत हुई थी वो बात साल 2014 की थी वो भी चुनाव कांग्रेस के खिलाफ था. 2014 के बाद देश की राजनीति की दशा और दिशा बदल गई है. जनता मोदी के वायदे का हिसाब मांग रही है लेकिन चुनावी जुमले कहकर टाला जा रहा है. यही वजह है जहां राज्य में मजबूत चेहरे हैं वहां बीजेपी मोदी के नाम पर गोते लगा रही है.

असम में बीजेपी की जीत इसीलिए हुई क्योंकि राज्य में 15 साल से कांग्रेस सत्ता में थी. कांग्रेस 2014 से लगातार हर बड़े राज्यों में चुनाव हारती आ रही है दूसरी तरफ बीजेपी का गठबंधन भी था.

अब ये भी साफ हो गया है कि बीजेपी मोदी के नाम पर हर राज्य का चुनाव नहीं जीत सकती है. दूसरी बड़ी बात ये है गठबंधन की राजनीति का बोलबाला जारी है. जिस पार्टी का जितना बड़ा गठबंधन उसका पलड़ा उतना ही भारी होता है.

2004 में इंडिया शाइनिंग के बाद भी अटल बिहारी वाजपेयी चुनाव हार गये थे. वजह थी एनडीए के मुकाबले यूपीए का बड़ा गठबंधन. वहीं 2009 में भी यूपीए की जीत में गठबंधन का अहम रोल बना रहा जबकि 2014 के चुनाव में मोदी के समर्थन में करीब 26 पार्टियां थी जबकि यूपीए का कुनबा पूरा बिखड़ चुका था. इसके अलावा देश की अर्थव्यवस्था का बुरा हाल था वहीं भ्रष्ट्राचार से सरकार की चूलें हिल गईं थीं. अखिलेश पार्टी का चेहरा होने के बाद भी मोदी के सामने डरे और सहमे थे वहीं राहुल भले कांग्रेस का चेहरा हैं लेकिन देश का चेहरा नहीं बन पाये. मोदी को टक्कर देने के लिए और अखिलेश अपनी जीत को पक्की करने के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन किया. इस वजह से दोनों पार्टियों का आत्मविश्वास काफी बढ़ गया है. गठबंधन और बीजेपी के पास मुख्यमंत्री का चेहरा नहीं होने की वजह से अखिलेश को इसका फायदा मिल सकता है.

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तीसरी बात होती कि विकास का मुद्दा.  विकास ऐसी चीज होती है जिसका कोई किनारा नहीं होता है. विकास करके भी चुनाव हार सकते हैं और विकास न करके भी चुनाव जीत सकते हैं. मसलन शीला दीक्षित के नेतृत्व में दिल्ली, पृथ्वीराज चव्हाण के नेतृत्व में महाराष्ट्र और भूपिंदर हुड्डा के नेतृत्व में कांग्रेस हरियाणा में हार चुकी है चूंकि केन्द्र सरकार के खिलाफ लोगों को गुस्सा था. जिसका खामियाजा विकास करने वाले मुख्यमंत्रियों पर पड़ा. वैसे रोजगार की बात छोड़ दें तो अखिलेश राज में विकास की लकीरें दिख रही है जैसे सड़कें अच्छी हो रही हैं. फ्लाईओवर भी बन रहे हैं. एक्सप्रेस वे बन गये हैं और बन रहे हैं. पहले के मुकाबले बिजली की स्थिति ठीक हो रही है. मेट्रो का भी काम भी चल रहा है वहीं लैपटॉप देने का काम किया.

अखिलेश यादव मोदी पर आरोप लगा रहे है कि उनके शासनकाल का काम दिख रहा है जबकि मोदी सरकार के काम नहीं दिख रहे हैं. वही मोदी सरकार के पास नोटबंदी, गरीबों को गैस देने, जनधन योजना, सस्ते होम लोन और गर्भवती महिलाओं को मदद देने की बात है.

अखिलेश शासनकाल में कानून व्यवस्था की समस्या रही है जबकि अखिलेश यादव पर अभी तक कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं लगे हैं. वहीं बीजेपी ने राम मंदिर का कार्ड खेलने में कोई कोताही नहीं बरत रही है. ऐसा प्रतीत हो रहा है कि असली टक्कर अखिलेश यादव और बीजेपी के बीच हो सकती है.

धर्मेन्द्र कुमार सिंह, चुनाव विश्लेषक और ब्रांड मोदी का तिलिस्म के लेखक हैं. इनसे ट्विटर पर जुड़ने के लिए @dharmendra135 पर क्लिक करें. फेसबुक पर जुड़ने के लिए इसपर क्लिक करें. https://www.facebook.com/dharmendra.singh.98434

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