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एक विचारधारा के बाद अब एक ही शख्स की हुकूमत वाला देश बन गया है चीन

चीन दुनिया का इकलौता ऐसा देश बन गया है जहां कि एक विचारधारा और एक पार्टी के बाद अब एक ही शख्स की हुकूमत चलेगी. लगातार तीसरी बार मुल्क की कमान संभालने वाले शी जिनपिंग मरते दम तक राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे. वह अब पहले से अधिक ताकतवर हो गए हैं, जिसे भारत और अमेरिका समेत अन्य देशों के लिए खतरनाक संकेत माना जा रहा है. कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि उनका कद अब शायद चीन के महान नेता देंग शियाओपिंग से भी बड़ा हो चुका है. हालांकि अपनी नियुक्ति से पहले ही कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना यानी सीपीसी की बैठक से उन्होंने अपने कई प्रतिद्वंदियों को बाहर का रास्ता दिखाकर ये जता दिया है कि वे अब पहले से ज्यादा सख्त तेवर अपनाने वाले हैं. 

पिछले सवा दो साल से भारत और चीन के रिश्तों में जो खटास आई है, उसके चलते ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिनपिंग के तीसरी बार महासचिव चुने जाने पर उन्हें बधाई नहीं दी है, जिसे चीन के सियासी गलियारों में अच्छा संकेत नहीं माना जा रहा है. हालांकि पांच साल पहले पीएम मोदी ने शी जिनपिंग को दूसरी बार कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव चुने जाने पर बधाई दी थी. उधर, अमेरिका ने भी चीन की सैन्य ताकत को देखते हुए नरम रुख अपनाने की नीति पर ही आगे बढ़ने का फैसला किया है. अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने साफ कर दिया है कि वह चीन से संघर्ष करके अपने रिश्ते खराब नहीं करना चाहते हैं.

हालांकि वह यूक्रेन में रूस के हमले को लेकर नेतृत्व करना जारी रखेगा, लेकिन जिनपिंग की तीसरी ताजपोशी पर मोदी की खामोशी को चीन में सही नहीं माना जा रहा है. अंतरराष्ट्रीय राजनीति के प्रोफ़ेसर हुआंग युनसोंग ने एक विदेशी मीडिया को दिए इंटरव्यू में कहा है कि, "राष्ट्रपति शी के फिर से चुने जाने पर पीएम मोदी की चुप्पी ने खतरनाक संकेत दिया है. यह आगे दोनों देशों के बीच विवादों और टकराव को उजागर करता है और हमारे आपसी हितों की संभावनाओं को काफी कमजोर करता है. सच कहा जाये, तो पीएम मोदी की चुप्पी दोनों देशों के बीच मतभेदों को दूर करने और हल करने में कोई अच्छी भूमिका नहीं निभाती है."
 
एक अहम सवाल ये भी है कि शी जिनपिंग की इस बढ़ती हुई ताकत का भारत की सेहत पर क्या फर्क पड़ेगा? इस पर अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषकों की मिली जुली राय है. कुछ चीनी पत्रकारों के मुताबिक "इसमें कोई शक नहीं कि शी जिनपिंग अगले साल तक चीन के आधुनिक इतिहास के सबसे मजबूत नेता बन जाएंगे. सत्ता पर उनका पूर्ण नियंत्रण हो जाएगा. इसलिए यही लगता है कि वह भारत सहित तमाम पड़ोसी देशों के साथ सीमा विवाद सहित अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक सख्त रुख दिखाएंगे."

कुछ विश्लेषक मानते हैं कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में चीनी सरकार भारत के प्रति अपनी नीति की निरंतरता और स्थिरता बनाए रखेगी और वे द्विपक्षीय संबंधों को लगातार महत्व देते रहेंगे. हालांकि चीनी मामलों के विशेषज्ञ डॉक्टर फैसल अहमद कहते हैं कि राष्ट्रपति शी के फिर से चुने जाने से भारत-चीन के आर्थिक संबंध बेहतर होंगे और द्विपक्षीय व्यापार में भी वृद्धि होना तय है. हालांकि एक तथ्य ये भी है कि जून 2020 में गलवान घाटी से दोनों पक्षों के बीच जो विवाद उपजा था, उसके बावजूद व्यापार में कोई कमी नहीं आई है.

साल 2021 में दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय व्यापार 125 अरब डॉलर से अधिक था, जो कि साल 2020 की तुलना में करीब 40 अरब डॉलर ज़्यादा था. वैसे अगला साल दोनों देशों के रिश्तों को सुधारने के लिहाज से बेहद अहम है. संघाई की अध्यक्षता भारत के पास है. अगले साल सितंबर में भारत को शंघाई कॉरपोरेशन आर्गेनाइजेशन यानी एससीओ का शिखर सम्मेलन कराना है और हर बार की तरह चीन के राष्ट्रपति भी इसमें नियमित रूप से भाग लेंगे.

इस कारण विश्लेषक ये मान रहे हैं कि यही एक बड़ा अवसर होगा जिसके पहले दोनों देशों में रिश्ते सुधरने लगेंगे. ऐसा माना जा रहा है कि भारत अगले साल के शिखर सम्मेलन के लिए जब एससीओ की अध्यक्षता ग्रहण करेगा तो शी जिनपिंग के प्रति भारत मैत्रीपूर्ण संकेत दिखाने का प्रयास करेगा. गौरतलब है कि दोनों देश 'ब्रिक्स' के सदस्य भी हैं, लिहाजा एशिया की दो बड़ी ताकतों का आपस में मेलजोल बढ़ाना सिर्फ मजबूरी नहीं बल्कि जरूरत भी है.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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