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पिछले 43 बरस से हमें चैन की नींद नसीब कराने वाले जनरल खुद मौत की नींद सो गए!

सेना की वर्दी पहने हर सैनिक का सपना अपने देश के लिए कुर्बान होने का ही होता है क्योंकि ऐसी शहादत का गौरव किसी आम नागरिक को नहीं मिल पाता. लेकिन कोई हादसा उस शहादत लेकर आये, तो वो सिर्फ सेना को नहीं बल्कि पूरे देश को और भी ग़मज़दा कर देती है. महज पौने 21 बरस में सेना में सेकंड लेफ्टिनेंट में भर्ती होकर उसकी कमान संभालने वाले जनरल बिपिन रावत इस असामयिक मौत के साथ सेना की गौरवशाली विरासत तो छोड़ गए लेकिन इतिहास की ऐसी नई इबारत भी लिख गए जिनके सियाह पन्नों को पढ़कर आने वाली पीढ़ियां उन्हें कभी भुला नहीं पायेगी. ऐसे हवाई हादसे में अपनी जान गंवाने वाले रावत देश के पहले व चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ व पूर्व सेनाध्यक्ष हैं लेकिन अपनी जीवनसंगिनी के साथ इस सफर पर जाने वाले वे दुनिया के शायद इकलौते शीर्ष सैन्य अफसर हैं.उनकी दोनों बेटियों को ये तो अहसास था ही एक दिन उनके पिता को देश के लिए कुर्बान होना है लेकिन कुदरत की इस नियति को वे भी नहीं जानती थीं कि पिता के साथ उनकी मां को भी ऐसे दर्दनाक हादसे में कभी अपनी कुर्बानी देनी पड़ेगी. लिहाज़ा,उनके हेलीकाप्टर के क्रेश होने की वजह चाहे जो भी रही हो,उसे जानने की बेचैनी सिर्फ हमें ही नहीं बल्कि दुनिया के कई मुल्कों के सेना प्रमुखों को भी है.

देश के 27वें आर्मी चीफ रहे जनरल बिपिन रावत को ऊंचाई वाले इलाकों में लड़ने और काउंटर इंसर्जेंसी यानी जवाबी कार्रवाई का विशेषज्ञ माना जाता था. उन्होंने सेना में तो अपनी इमेज कठोर फैसले लेने वाले मुखिया की बनाई थी लेकिन विभिन्न विषयों पर जिस तरह से मीडिया में उन्होंने बयान दिए, उससे आम जनता के बीच उनकी छवि एक मुखर व बेख़ौफ सेना प्रमुख की बनाई. आमतौर पर उनसे पहले के सेना प्रमुख जनता से जुड़े मसलों पर अपनी राय सार्वजनिक करने से बचा करते थे लेकिन जनरल रावत ने इस मिथ को तोड़ा और देश की जनता ने भी मोटे तौर पर उनकी इस भूमिका की जमकर तारीफ ही की. हालांकि, सियासी दलों ने उनके बयानों पर विवाद भी खड़ा किया लेकिन उन्होंने इसे कोई तूल नहीं दिया.

दरअसल, रावत एक जांबाज़-लड़ाकू जनरल होने के साथ ही आतंकवाद का समर्थन करने वालों के खिलाफ अपनी बात कहने से भी कभी कोई परहेज नहीं करते थे. इसलिये विपक्षी दलों को ये रास नहीं आता था और वे उन पर निशाना साधते थे कि अगर उन्हें राजनीति ही करनी है तो वे आर्मी चीफ के पद से इस्तीफा देकर राजनीति में ही क्यों न कूद जाते हैं.

साल 2017 में जनरल रावत ने कश्मीर के पत्थरबाजों पर जो बयान दिया था, वह काफी सुर्खियों में रहा था. जनरल रावत ने तब कहा था कि ,"काश ये लोग हम पर पत्थर की जगह गोलीबारी कर रहे होते तो मैं ज्यादा खुश होता. तब मैं वो कर पाता, जो मैं करना चाहता हूं." उन्होंने कहा था कि हम एक दोस्ताना आर्मी हैं लेकिन जब हमें कानून एवं व्यवस्था बनाने के लिए बुलाया जाता है, तो लोगों को हमसे डरना चाहिए.

हालांकि, उसी साल एक कश्मीरी पत्थरबाज युवक को अपनी आर्मी जीप के आगे बांधने वाले मेजर लितुल गोगोई को तब जनरल रावत ने प्रशस्ति पत्र देकर उसकी तारीफ की थी. जीप के आगे शख्स को बांधकर घाटी में घुमाने की उस घटना का मानवाधिकार संगठनों और घाटी के लोगों ने कड़ा विरोध किया था.

उसी तरह से जब देश में नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को लेकर विरोध-प्रदर्शन चल रहे थे, तब हुई हिंसा को लेकर भी जनरल रावत का दिया बयान विवादों में रहा था. उस वक्त उन्होंने कहा था, ''लीडर वह नहीं है, जो लोगों को भटकाने का काम करता है. हमने देखा है कि बड़ी संख्या में यूनिवर्सिटी और कॉलेज के छात्र आगजनी और हिंसक प्रदर्शन के लिए भीड़ का हिस्सा बन रहे हैं. इस भीड़ को एक नेतृत्व प्रदान किया जा रहा है लेकिन असल मायने में यह लीडरशिप नहीं है. इसमें कई प्रकार की चीजें चाहिए. जब आप आगे बढ़ते हैं, तो हर कोई आपका अनुसरण करता है. यह इतना आसान नहीं है. यह सरल प्रतीत होता है, लेकिन यह एक बहुत ही जटिल घटना है. असल में लीडर वह है जो आपको सही दिशा में आगे ले जाता है.'' उनके इस बयान पर विपक्ष ने जमकर हमला किया था.

उत्तराखंड के पौड़ी जिले में जन्मे रावत के पिता लक्ष्मण सिंह रावत भी सेना में लेफ्टिनेंट जनरल के पद से रिटायर हुए थे. उनका परिवार कई पीढ़ियों से सेना को अपनी सेवाएं देता आया है. बिपिन रावत, सेंट एडवर्ड स्कूल, शिमला, और राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, खडकसला के छात्र थे. उन्हें 20 साल और नौ महीने की उम्र में दिसंबर 1978 को भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून से गोरखा राइफल्स की पांचवीं बटालियन में नियुक्त किया गया था. आईएमए में रहते हुए उन्हें 'स्वॉर्ड ऑफ़ ऑनर 'से सम्मानित किया गया था.

बिपिन रावत की पत्नी मधूलिका रावत आर्मी वेलफेयर से जुड़ी हुईं थीं. वो आर्मी वुमन वेलफेयर एसोसिएशन की अध्यक्ष भी थीं. अपनी जिंदगी के 43 बरस सेना में रहते हुए हमें हर रात चैन की नींद नसीब कराने वाले जनरल रावत देश के 137 करोड़ लोग आपको बारंबार सेल्यूट करके अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं.

नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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