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नए बजट से पहले जगी उत्सुकता, लेकिन वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के सामने रहेंगी बड़ी चुनौतियां

नया बजट 1 फरवरी को पेश किया जा रहा है. हर साल जब नया बजट आता है तो देश के लोगों की उत्सुकता बजट की तरफ रहती है. लेकिन सवाल ये है कि नए साल में आप बजट से उम्मीद तो करते हैं लेकिन लेकिन वो उम्मीद कितनी आपकी पूरी हो पाती है? उम्मीदों पर वो बजट कितना खरा उतरता है? ये महत्वपूर्ण सवाल है और ये महत्वपूर्ण सवाल पिछले साल भी था और इस साल भी है. 

हम यह देख रहे हैं कि ओब्सथेन की 2023 की रिपोर्ट का हवाला दें तो हमें अर्थव्यवस्था की एक प्रवृत्त साफ दिखाई दे रही है कि संपत्ति कुछ लोगों के हाथ में लगातार सिमटी जा रही है. अगर हम ये कहें कि देश की 90% संपत्ति  कुछ लोगों के हाथ में सिमट गई है. किसी भी बजट को देखने का ये पैमाना काफी महत्वपूर्ण है कि एक बजट के बाद से लेकर दूसरे बजट तक की जो पूरी जो यात्रा होती है, उस यात्रा के दौरान समाज के किन वर्गों को क्या हासिल होता है? 

अर्थव्यवस्था का मतलब ये है कि आर्थिक रूप से आप समज में किन को और किन लोगों के लिए आप ऐसी योजनाएं बनाते हैं, ऐसे रास्ते तैयार करते हैं ताकि वो खुद को एक बेहतर स्थिति में महसूस कर सकें.

हम ये देख रहे हैं कि लगातार गरीबी बढ़ती जा रही है. देश में कुछ चंद कॉर्पोरेट घरानों की स्थिति, उनका साम्राज्य मजबूत होता जा रहा है. इस बजट में भी ये जरूर देखा जाएगा कि कॉरपोरेट सेक्टर को किस रूप में लिया जाएगा. चूंकि पैसे आएंगे कहां से?  मान लीजिए कि सरकार के पास जब पैसे आएंगे तभी तो वो पैसे लोगों के बीच में खर्च होंगे. लेकिन वो पैसे सरकार के पास आने की वजह कुछ कॉरपोरेट हाउसों के पास जा रहे हैं, तो फिर वो कैसे खर्च होंगे?

बजट की बड़ी चुनौतियां

उदाहरण के तौर पर आप शिक्षा के बजट को ही देख लीजिए. शिक्षा का बजट लगातार घटता जा रहा है. अगर हम ये देखें कि पूरी जीडीपी का कितना हिस्सा एजुकेशन पर खर्च किया जा रहा है? हम ये मानते हैं कि GDP का 6% तक हिस्सा खर्च होना चाहिए. क्या उसका आधा भी हो पा रहा है? क्या हम यूनिवर्सिटी की हालत देख रहे हैं? हमारा पूरा नॉलेज सिस्टम डिपेंड करता है कि बजट किस तरह का आ रहा है और फिर वो देश में बजट किस तरह के नॉलेज सिस्टम को डेवलप करता है? 

हम ये देख पा रहे हैं कि हमारा पूरा नॉलेज सिस्टम वो नीचे की तरफ गिर रहा है, क्योंकि उसके लिए प्रयाप्त बजट ही नहीं करा पा रहे है. दूसरा है हेल्थ सेक्टर. अस्पतालों की और दवाों हालत जाकर आप खुद देखिए. मरीज का चिकित्सा में खर्च लगातार बढ़ रहा है और वो जा रहा है प्राईवेट सेक्टर को. जो बड़े-बड़े मेडिकल के चेन बन गए है! 

इस तरह से हम में ये पाते हैं कि हेल्थ और एजुकेशन सेक्टर समाज के लिए बुनियादी है. अब हम हेल्थ और एजुकेशन सेक्टर दोनों में सबसे ज्यादा प्रभावित देश का कौन सा वर्ग होगा? समाज का जो सबसे निचला हिस्सा होता है उसमें महिलाएं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) और दलित सारे लोग शामिल होते हैं. उनके भी स्थिति आप देख लीजिए. 

बजट का आवंटन महत्वपूर्ण

एजुकेशन स्टेटस रिपोर्ट जो आई है, उसमें ये देखा जा रहा है कि ड्रॉप आउट बच्चों की संख्या लगातार बढ़ रही है. उसमें अगर हम गौर करें कि समाज समाज का कौन सा हिस्सा बाहर हो रहा है? सोशल सेक्टर में देखेंगे तो लगातार बजट का हिस्सा काम होता चला जा रहा है. अब सोशल सेक्टर में जो बजट का हिस्सा काम होता जा रहा है. इसका सीधा प्रभाव समाज के सबसे ज्यादा जो गरीब स्थिति में जो लोग हैं, उन पर पड़ रहा है. बेरोजगारी लगातार बढ़ रही है. 

दूसरी तरफ हम दावा कर रहे हैं कि देश की अर्थव्यवस्था को दुनिया की पांचवीं अर्थव्यवस्था में शामिल करना है. ये दो कंट्राडिक्ट्री बातें कैसे हैं? देश डेवलपमेंट भी कर रहा हैं और देश में लगातार बेरोजगारी की स्थिति भी बनी हुई है. इसका मतलब ये हुआ कि एक नेरेटिव बना हुआ हैं. देश की अर्थव्यवस्था का मतलब चंद घरनों की अर्थव्यवस्था नहीं होती है. देश की अर्थव्यवस्था का मतलब होता कि सामान्य सिटीजन कितना अपने आप को आर्थिक स्तर पर सशक्त यानी कि वह अपने अपने को कितना ताकतवर महसूस कर रहा है.

मान लीजिए, सामान्य सिटीजन कि थाली से दाल की मात्रा हर साल कम हो रही है, यह हमारा पैमाना है! किसी बजट कि सफलता का अच्छे और खराब होने को मापने का ये एक-एक कारक हो सकता है.

बढ़ती बेरोजगारी से सवाल

लगातार ये देखा जा रहा है कि खाने-पीने की क्षमता कम होती जा रही है. क्षमता कम होने का कारण सीधा है- बजट के जरिए ऐसी अर्थव्यवस्था कि बनावट कर रखी है कि नीचे के लोगों तक वह पैसा पहुंच ही नहीं पा रहा है. 

मनरेगा की स्थिति देख लीजिए. मनरेगा एक अच्छी योजना हम ना भी कहे, लेकिन ये योजना ऐसे समय में आई थी जब लोगों की लोगों के पास रोजगार अवसर बहुत कम होते थे और लोग गांव से शहरों की ओर लगातार पलायन कर रहे थे. शहर पर उनके ज्यादा बोझ भी बढ़ रहा था. लेकिन मनरेगा ने ऐसी स्थिति पैदा की कि लोगों ने गांव में रहकर अपने काम करने के अवसर के रूप में उसे स्वीकार किया.

इससे न सिर्फ उन लोगों की खरीदने की क्षमता बढ़ी, बल्कि बजट एक चेन बनाता है. तो लोगों की क्रयशक्ति बढ़ने के साथ ही चीजों का उत्पादन भी बढ़ा. इसके बाद नए रोजगार का भी सृजन हुआ. कहने का तात्पर्य ये है कि बजट के जरिए हम एक ऐसे चक्र का निर्माण करते हैं जिससे कि समाज किस दिशा में जा रहा है, ये बजट से बिल्कुल साफ दिखता है.

[नोट- उपरोक्त दिए गए विचार लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. यह ज़रूरी नहीं है कि एबीपी न्यूज़ ग्रुप इससे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही ज़िम्मेदार है.]

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