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BLOG: पीएम नरेंद्र मोदी का दुश्मन नंबर वन कौन है?

चुनाव जीतना सिर्फ साइंस नहीं है बल्कि आर्ट्स भी है. चुनाव जीतना सिर्फ अर्थमेटिक्स नहीं बल्कि केमिस्ट्री भी है. चुनावी कुश्ती सिर्फ शारीरिक मजबूती से नहीं बल्कि दांव से भी जीता जाता है. चुनाव जीतना सिर्फ रैली की भीड़ नहीं बल्कि दिमागी खेल भी होता है. उत्तर प्रदेश में राजनीतिक पारा दिनोंदिन गरमाता जा रहा है और सभी पार्टियां चुनाव जीतने के लिए एड़ी चोटी मेहनत कर रही है लेकिन जीत उसी की होगी जिसका दांवपेंच बेहतर होगा. चुनावी कुश्ती में मजबूत नेता, ठोस मुद्दे, मजबूत संगठन से ज्यादा महत्वपूर्ण होता है चुनाबी धोबिया पाठ यानि रणनीति.रणनीति ऐसी होती है कमजोर पार्टी, कमजोर नेतृत्व को भी मजबूत कर देती है. ऐसा ही हो रहा है इस बार उत्तर प्रदेश के चुनाव में.

एक तरफ निर्णायक नेता मोदी के साथ बीजेपी की पूरी फौज खड़ी है तो दूसरी तरफ अखिलेश यादव-राहुल गांधी हैं जो नरेन्द्र मोदी की पूरी फौज को चुनौती दे रहें है. भले इस चुनावी दंगल का चेहरा अखिलेश यादव और राहुल गांधी हैं लेकिन इस चेहरे के पीछे प्रशांत किशोर की रणनीति है वहीं प्रशांत किशोर जिन्होंने नरेन्द्र मोदी को गुजरात विधानसभा 2012 और लोकसभा 2014 में जिताने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की थी. चाय पर चर्चा, थ्री डी होलोग्राम और अच्छे दिन आनेवाले हैं के नारे प्रशांत किशोर के दिमाग की उपज थी. क्या हुआ 2014 में बीजेपी की शानदार जीत के बाद प्रशांत किशोर ने मोदी को अलविदा कह दिया.

कहा जा रहा है कि प्रशांत किशोर नरेन्द्र मोदी के काफी करीब थे और उनकी पहुंच नरेन्द्र मोदी के ऑफिस में सीधे थी लेकिन जैसे ही अमितशाह बीजेपी अध्यक्ष बने प्रशांत किशोर का कद छोटा होता चला गया. अमित शाह प्रशांत किशोर को सिर्फ एक वेंडर की तरह समझने लगे और मोदी से मिलने में भी प्रशांत किशोर को दिक्कतें आने लगी. यही वजह थी कि प्रशांत किशोर ने मोदी से दूरी बनाने का फैसला किया. जिसने बीजेपी को जिताने का बीड़ा उठाया था उसी शख्स ने बीजेपी को हराने का बीड़ा उठा लिया. जाहिर है कि इसमें प्रशांत किशोर की महत्वाकांक्षा भी हो सकती है.

प्रशांत किशोर जब से बीजेपी से अलग हुए तभी से बीजेपी की हार भी शुरू हो गई. जहां जहां बीजेपी को जीतने की पूरी उम्मीद थी वहां पर प्रशांत किशोर ने अपनी चाणक्यनीति के तहत बीजेपी को पटखने का काम शुरू कर दिया. दिल्ली विधानसभा के पहले लग रहा था कि बीजेपी बड़ी आसानी से ये चुनाव जीत जाएगी आखिरकार बीजेपी जीतती बाजी हार गई.प्रशांत किशोर खुले तौर पर केजरीवाल के रणनीतिकार नहीं थे लेकिन परोक्ष रूप से प्रशांत किशोर केजरीवाल के लिए काम कर रहे थे. दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार और केजरीवाल की खास केमिस्ट्री दिख रही थी उस समय प्रशांत किशोर नीतीश कुमार से जुड़ चुके थे. दिल्ली में बीजेपी की करारी हार के बाद बिहार में महाभारत शुर हो गया जाहिर है कि लोकसभा चुनाव में शानदार जीत के बाद बीजेपी का हौंसला सातवें आसमान पर था लेकिन रणनीति और दांवपेंच के खेल में बीजेपी के सबसे चुनावी रणनीतिकार अमित शाह के सामने प्रशांत किशोर खड़े हो गये.

प्रशांत किशोर को मालूम था कि चुनावी अखाड़े पर मजबूत बीजेपी के साथ अकेले नीतीश कुमार पहलवानी दिखाएंगें तो राजनीति रूप से पैर-हाथ टूट जाएंगें. प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार की कमजोरी को राजनीति मजबूती देने की कोशिश की. बिहार में नीतीश कुमार पहले से ही चेहरा थे लेकिन सिर्फ चेहरा से चुनावी नैय्या पार करना मुश्किल था इसीलिए प्रशांत किशोर ने नीतीश कुमार को बीजेपी के खिलाफ जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस का महागठबंधन बनाने के लिए मजबूर किया. नीतीश की जीत के लिए प्रशांत किशोर ने जमकर मेहनत की और उन्हीं का नारा था बिहार में बहार हो नीतिशे कुमार हो, बिहार बनाम बाहरी का नारा दिया यही नहीं उम्मीदवार के सेलेक्शन से लेकर गांव गांव तक नीतीश कुमार के विकास को मुद्दे को उजागर किया. आखिरकार बिहार में बीजेपी की करारी हार हुई और जीत दिलाने का हीरो बने प्रशांत किशोर.

उत्तर प्रदेश में भी किशोर के निशाने पर बीजेपी

बिहार में बीजेपी की हार के बाद प्रशांत किशोर उत्तर प्रदेश में भी बीजेपी को हराने का बीड़ा उठाया है. वो ऐसी पार्टी के रणनीतिकार बन गये जिस पार्टी का न तो यूपी में वजूद बची थी और देश में कोई उम्मीद की किरण दिख रही थी. कांग्रेस के संगठन को मजबूत करने के लिए पहले शीला दीक्षित को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करवाया फिर राहुल से राज्यभर खाट सभा करवाई लेकिन प्रशांत किशोर कांग्रेस में जान नहीं फूंक पाए. उन्हें लगने लगा कि राहुल की हार से उनकी प्रतिष्ठा पर सवाल उठने लगेगा और इसबार उनकी रणनीतिकार का चेहरा बेनकाब हो जाएगा लेकिन वो हारे नहीं बल्कि अपनी रणनीति पर अडिग रहे. सपा से गठबंधन को लेकर राहुल गांधी उतने उत्साहित नहीं थे जितने प्रशांत किशोर. प्रशांत किशोर सपा-कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर खुद अखिलेश के पास जा पहुंचे और आखिरकार दोनों पार्टियां के बीच गठबंधन हो गया. जाहिर है कि काम के बावजूद अखिलेश को अपनी जीत पर भऱोसा नहीं था तो कांग्रेस की बात ही नहीं.

रणनीति ये कहती है कि जब आप सामने वालों के सामने कमजोर हैं तो सीधे लड़ने की बजाय दांव का सहारा लेना चाहिए. प्रशांत किशोर ने वही किया जिसकी उम्मीद न तो अखिलेश को थी और न ही राहुल को. मोदी के चेहरे के सामने दो चेहरे को साथ लाकर बड़ा चेहरा और बड़ा गठबंधन बना दिया. सबसे बड़ी बात ये है कि बीजेपी ने भी नहीं सोचा होगा कि प्रशांत किशोर ये दांव खेल सकता है. गठबंधन के बाद भी प्रशांत किशोर कोई रिस्क नहीं लेना चाहते हैं यही वजह है कि अखिलेश यादव-राहुल गांधी की साझा रैली, साझा रोड शो करवा रहे हैं बल्कि ऐसे नारे को बुलंद करवा रहें हैं जो आम लोगों की जुबान बन जाए मसलन काम बोलता है, यूपी को ये साथ पसंद है, अपने लड़के बनाम बाहरी मोदी. जाहिर है कि यूपी चुनाव में सपा और कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है. अगर इस गठबंधन की जीत होती होती है तो फिर से साबित हो जाएगा कि देश में जीत दिलाने वाले प्रशांत किशोर बेताज बादशाह हैं.

उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद प्रशांत किशोर का अगला निशाना गुजरात विधानसभा और लोकसभा 2019 का हो सकता है. जाहिर है कि मोदी और बीजेपी टीम को सोचने के लिए जरूरत पड़ सकती है क्यों प्रशांत किशोर का वार रूम बीजेपी के वाररूम पर भारी पड़ रहा है.

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