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BLOG: रोमिला थापर प्रकरण और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों पर हमला

जेएनयू जैसे संस्थान को राजनीति से मुक्त करने की मांग करना सही नहीं है. जेएनयू जैसे संस्थान पर जिस तरह का सकंट आज है वैसा पहले कभी नहीं रहा है. और प्रोफेसर थापर के साथ जो हो रहा है वह भी चिंताजनक हैं.

जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के प्रशासन द्वारा कुछ दिन पहले प्रोफेसर रोमिला थापर से उनका सीवी मांगा गया है. प्रशासन के इस कदम पर काफी नाराजगी भी देखने को मिली. प्रोफेसर थापर 25 साल से प्रोफेसर इमेरिटा हैं और जेएनयू प्रशासन सीवी के जरिए देखना चाहता है कि उन्हें मिला हुआ मानद दर्जा बना रहना चाहिए या नहीं. जेएनयू अपनी स्थापना के बाद से ही देश की नामी यूनिवर्सिटी रही और प्रोफेसर थापर ने भी सोशल साइंस में अपने काम से एक अलग पहचान बनाई है. प्रोफेसर थापर 1970 से 1991 तक जेएनयू में ही प्राचीन भारतीय इतिहास की प्रोफ़ेसर रही हैं. विश्व भर में प्रोफेसर थापर की पहचान इंसेंट हिस्ट्री पर किए गए काम के लिए है. इसके अलावा भारत प्रोफेसर थापर को भारत में बुद्धिजीवी के तौर पर भी जाना जाता है.

यूनिवर्सिटी की इमेरिटा प्रोफेसर के तौर पर थापर को कोई सैलेरी नहीं मिलती है. हालांकि हो सकता है कि प्रोफेसर थापर को इस उपाधि से थोड़ा फायदा मिलता हो, लेकिन यूनिवर्सिटी को उनका नाम जुड़ा होने की वजह से ज्यादा बड़ी पहचान मिलती है. आम तौर पर प्रोफेसर इमेरिटा का दर्जा देने के बाद उनका मूल्यांकन नहीं किया जाता है. जेएनयू प्रशासन ने मूल्यांकन के पीछे अमेरिका की यूनिवर्सिटीज में भी ऐसी प्रक्रिया होने का दावा किया है जो कि गलत है. यह सबके सामने है कि पिछले 5 साल में प्रोफेसर थापर हिंदू राष्ट्रवाद की आलोचना करती रही हैं और उनसे इसी का बदला लेने के लिए सीवी मांगा जा रहा है. वहीं अपने बताव में जेएनयू प्रशासन कह रहा है कि उनसे 10 और इमेरिटा प्रोफेसर्स से सीवी मांगे हैं. जेएनयू प्रशासन इसे बदले की कार्रवाई के तौर पर नहीं दिखाना चाह रहा है, लेकिन इस कदम में कहीं ना कहीं बदले की भावना की झलक दिखाई देती है.

प्रोफेसर थापर के लिए आगे आना जरूरी नहीं है. प्रोफेसर थापर के विचारों पर मतभेद हो सकते हैं, पर जेएनयू प्रशासन का रवैया सही नहीं है, क्योंकि यूनिवर्सिटी ने काफी बेहतर दिन देखे हैं. पिछले कुछ सालों में जेएनयू में ओहदे में गिरावट देखने को मिली है. इस गिरावट की एक वजह प्रशासन में उन लोगों को भर्ती किया जाना है जिन्हें एक यूनिवर्सिटी का निर्माण कैसे होता है और उसकी जिंदगी में क्या भूमिका होती है वह मालूम नहीं है. जेएनयू के वीसी ने दो साल पहले स्टूडेंट्स के बीच देश भक्ति जगाने के लिए कैंपस में आर्मी टैंक लगाने जैसी बात तक कह दी थी. टीचर्स उन स्टूडेंट्स को निशाना बना रहे हैं जिनका रवैया गलत नीतियों की आलोचना करना रहा है और उन्हें चिन्हित करके अटेंडेस के लिए बाध्य भी किया जा रहा है.

जेएनयू जैसे संस्थान को राजनीति से मुक्त करने की मांग करना सही नहीं है. जेएनयू जैसे संस्थान पर जिस तरह का सकंट आज है वैसा पहले कभी नहीं रहा है. और प्रोफेसर थापर के साथ जो हो रहा है वह भी चिंताजनक हैं. लेकिन इससे भी ज्यादा चिंता करने वाली बात यह है कि मौजूदा सरकार ने बौद्धिक विरोध को दूर करने के लिए यूनिवर्सिटी को इस तरह से निशाना बना रही है. ऐसे में जब किसी भी क्षेत्र से जुड़े हुए लोगों ने अभिव्यक्ति की आजादी पर खतरा महसूस किया है और आलोचनात्मक रवैया रखने वाले पत्रकारों को भी ट्रोल का शिकार होना पड़ा है, तब क्या कोई ये सवाल कर सकता है कि यूनिवर्सिटी के साथ ऐसा क्यों किया जा रहा है?

नाजी जर्मनी में प्रोपेगेंडा के रेच मंत्री जोसेफ गोएबल्स ने कहा था कि ''जब मैं कल्चर शब्द सुनता हूं तो अपनी बंदूक की तरफ बढ़ता हूं.'' वर्तमान में यूनिवर्सिटी में जो बुद्धिजीवि हैं उनकी हालत काफी कमजोर है. जेएनयू जैसे संस्थान को देश विरोधी संस्थान के तौर पर दिखाकर उस पर हमला किया जा रहा है. इसमें भी कोई हैरानी की बात नहीं है कि देश के ज्यादातर संस्थानों में ऐसे लोग भरे हुए हैं जिनका रवैया पूरी तरह से नौकरशाही वाला है और इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की ट्रेनिंग में मनावतावादी मूल्यों की कमी देखने को मिलती है. उन लोगों में ऐसे रवैये की झलक देखने की मिलती है जिसमें एजुकेशन को सिर्फ नौकरी पाने का रास्ता समझा जाता है. ऐसे व्यक्ति सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोचते हैं और उन्हें सामाजिक प्रक्रिया में योगदान देने वाली सोच से कोई मतलब नहीं है. यह सिर्फ भारतीय यूनिवर्सिटी के कर्मचारी नहीं हैं जो कि संस्थान के होने का मतलब क्या है वह नहीं समझते, बल्कि प्रशासन में ऐसे लोग भी हैं जो अपने मतलब की राजनीति के लिए कुछ भी करने को तैयार हो जाते हैं.

कोई इसकी गहराई में जा सकता है कि पिछली सरकारों ने क्या किया है, लेकिन वर्तमान में भारत सरकार का रवैया यूनिवर्सिटी को प्रभावित करने वाला है. भारत के दो बड़ी यूनिवर्सिटी जेएनयू और दिल्ली यूनिवर्सिटी की आजादी पर सीधे तौर पर हमला बोला जा रहा है. यूनिवर्सिटी हमेशा ही अंसतोष जाहिर करने की जगह रही हैं और सरकार इस बात से अनजान नहीं है. रोमिला थापर और तीन साल पहले कन्हैया कुमार, उमर खालिद और अनिर्बान पर किए गए हमलों के बारे में पता लगाना जरूरी है. जेएनयू प्रशासन भले ही खोलकर कभी ना कहे कि भारतीय इतिहास के विषय में मुख्य योगदान देने वाली रोमिला थापर को भी वो एंटी-नेशनल के तौर पर ही देखता है. इससे ज्यादा बुरा और क्या हो सकता है? यूनिवर्सिटी के साथ ऐसा खिलवाड़ और उन्हें निजीकरण के रास्ते पर ले जाने के लिए तैयार करने जैसा है. स्वदेशी को लेकर जो शोर मचाया जा रहा है वह भी कहीं ना कहीं पूंजिपतियों के अपने फायदे के लिए और सरकार को उनका साथ देना जरूरी नहीं है? खैर वो एक दूसरी कहानी है.

विनय लाल UCLA में इतिहास के प्रोफेसर के रूप में कार्यरत हैं. साथ ही वो लेखक, ब्लॉगर और साहित्यिक आलोचक भी हैं. 

वेबसाइटः http://www.history.ucla.edu/faculty/vinay-lal

यूट्यूब चैनलः https://www.youtube.com/user/dillichalo ब्लॉगः https://vinaylal.wordpress.com/

(नोट- उपरोक्त दिए गए विचार व आंकड़े लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं. ये जरूरी नहीं कि एबीपी न्यूज ग्रुप सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.)

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